स्वतंत्रता राष्ट्रीय नमक हरामी के लिए नहीं है

छद्म धर्म निरपेक्षता से लकवाग्रस्त कांग्रेस और उसके कुछ अन्य समान विचारधारा वाले दलों का मानना है कि राजनीति (वास्तव में राष्टï्रनीति) से भला भगवाधारी संतों का क्या संबंध? राजनीति को यदि हम राष्टï्रनीति के रूप में लें और राजनीति को भी व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म स्वीकार कर लिया जाए तो भी ऐसा संभव नहीं है कि राजनीति या राष्टï्रनीति में किसी संत या साधु का हस्तक्षेप नहीं हो सकता। राष्टï्र मानवतावादी सोच और मानवीय विकास की सर्वोच्चता को पाने की एक अदृश्य भावना का नाम है। इसलिए इस अदृश्य भावना का विकास एक पवित्र हृदयी संत ही कर सकता है। ऐसी पवित्रात्मा ही कर सकती है जिसे किसी वर्ग, सम्प्रदाय, समुदाय अथवा जाति से कोई लेना देना ना हो। ऐसी पवित्रात्मा जब भगवाधारी होकर संसार के कल्याण के लिए कार्य करती है तो उस देहधारी को लोग महर्षि कहकर सम्मानित और पूजित करते हैं, और जब ऐसी पुण्यात्मा धवल वस्त्रों में रहकर राजनीति का परिष्कार करती है तो उस समय लोग उसे राजर्षि कहकर अभिनंदित और वंदित करते हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ऋषि शब्द दोनों जगह लगा है। राजनेता राजर्षि होता है। राजर्षि के विचारों में व कार्यों में, जब मनसा, वाचा, कर्मणा साम्य पैदा हो जाता है, परिपक्वता आ जाती है, जब उनका जीवन अध्यात्म और भौतिकवाद का संगम बन जाता है तो उस समय वह महर्षि बन जाता है।
आज भारत की राजनीति में राजर्षियों का और महर्षियों का अकाल पड़ रहा है। इसलिए देश में राजनीति का पतन हो रहा है। गरिमाहीन, आचरण हीन, मनसा, वाचा कर्मणा असंगत व्यवहार करने वाले लोग धनबल और गनबल से संसद या विधानमंडलों में जा रहे हैं। इसलिए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सांसदों के खिलाफ बोलना पड़ रहा है। संसद की गरिमा तो सबके लिए मान्य है, उस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। लेकिन संसद में जाने वाले लोगों की गरिमा पर सवाल उठ रहा है। जिनके लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने कोई योग्यता निर्धारित नही की। यदि की है तो केवल इतनी कि वह इतनी आयु का हो, भारत का निवासी हो, पगाल दीवालिया या कोढ़ी ना हो, सजायाफ्ता अभियुक्त ना हो। हमारी योग्यता को इतने तक सीमित करना योग्यता का उपहास उड़ाना है। इसे योग्यता नहीं कहा जा सकता। यह तो उसके प्रति अनिवार्य शर्तें हैं। योग्यता तो ये है कि वह इतनी शिक्षा प्राप्त हो, भारत के प्रति भक्तिभाव रखता हो, इसकी भाषा, भूषा, परंपरा, संस्कृति, धर्म इतिहास और पूर्वजों को अपना मानता हो, उनके प्रति निष्ठावान हो और उनके विकास एवं विस्तार के लिए वचनबद्घ हो। मानवता उसका धर्म हो और मानवता के विकास के लिए सदा संघर्षशील रहा हो, जिसने किसी दल के लिए नहीं अपितु मानवतावादी कार्यों के लिए अभी तक कहीं न कहीं कोई न कोई सर्वोत्कृष्टï कार्य किया हो। इत्यादि। दुख की बात यह है कि भारतीय संविधान ने ऐसी कोई भी योग्यता हमारे सांसदों के लिए निर्धारित नहीं की। आज जब इन्हें कोई संत या सामाजिक कार्यकर्ता कहीं से भी खड़ा होकर ये बताता है कि तुम नंगे हो, कपड़े पहन लो। तो ये उल्टा चिल्लाते हैं कि तुम कौन होते हो, हमें नंगा कहने या देखने वाले? तुम्हारा काम हमारे नंगेपन को देखने का नहीं है, तुम्हारा काम भजन कीर्तन कराना, समाज में जाकर फावड़े, कुदाल से श्रमदान कराना और करना है, खबरदार जो हमारी तरफ देखा। इतिहास के गद्दारों ने इतिहास के साथ ज्यादती की। उन्होंने संतों का आजादी की लड़ाई में दिया गया योगदान यूं भुला दिया कि जैसे उन्होंने कुछ भी नहीं किया हो। यदि इतिहास में साफ-साफ लिख जाता कि 1857 की क्रांति को फेेलाने में सन्यासियों ने राजनीतिक लोगों से अधिक सराहनीय भूमिका निभाई थी, तो देश की वर्तमान पीढ़ी को इतिहास का सच मालूम पड़ जाता। पूरे देश में क्रांति की आग फेेलाने के लिए तब साधुओं ने रोटी और कपड़ा को साथ लेकर एक मौन आवाहन किया था। रोटी का एक ग्रास लेने का अर्थ था कि हम भी क्रांति के ध्वजवाहक हैं और समय आने पर तन-मन-धन से देश की सेवा के लिए कूद पड़ेंगे। कमल उस क्रांति का प्रतीक था। जहां रोटी खत्म हो जाती थी वहीं उस गांव के लोग सामूहिक रूप से रोटी बनवाते और रोटी लेकर संत आगे बढ़ जाते। अंत में 1857 में मेरठ में एक खलासी साधु ने एक ब्राहमण सैनिक से उसका लोटा पानी पीने के लिए मांग लिया, जिस पर उसने कहा कि नहीं मैं अपना लोटा तुम्हें नहीं दूंगा। क्योंकि यह तुम्हारे हाथों में जाकर अपवित्र हो जाएगा। तब सही समय पर और सही मर्म पर साधु ने चोट की, और कहा कि अंग्रेज लोग तुम्हें जो कारतूस देते हैं उनमें गाय और सुअर की चर्बी लगी होती है, जिन्हें तुम मुंह से खोलते हो? तब तुम्हारा धर्म भ्रष्टï नही होता? साधु की बात बन गयी। उस सैनिक को बात लग गयी और उसने अपनी पलटन में जाकर वह बात कही…..1857 की क्रांति का विस्फोट फलित हुआ। महर्षि दयानंद भी मौनी बाबा के रूप में उस समय सैनिकों से मिल रहे थे। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने रानी झांसी को भी कुछ आर्थिक मदद की थी राष्टï्रनीति के उद्घार के लिए जो कांग्रेसी आज भगवा रंग को राजनीति से दूर रहने की सलाह दे रहे हैं, वो तनिक कांग्रेस के इतिहास लेखक डा. पट्टाभिसीतारमैया का कांग्रेस का वृहद इतिहास के प्रथम खण्ड को पलटें। उन्हें लिखा मिलेगा-मि. ह्यूम जिन्होंने कांग्रेस स्थापित की, एक ऐसी महत्वपूर्ण रिपोर्ट पा गये, जो पूरी सात जिल्दों में लिखी गयी थी। इस रिपोर्ट में भारत के उन अनेक संतों महंतों, मठाधीशों, वैरागियों, धर्मगुरूओं और उनके शिष्यों के बीच हुए उस पत्र व्यवहार का ब्यौरा औरर तमाम पत्रावली थी जां पूरे हिंदुस्तान में गदर (क्रांति) चलाने के उद्देश्य से लिखी भेजी गयी थी। भगवा क्रांति का पोषक और शांति का उपासक है। वह क्रांति कर सकता है तो वह शांति का फल चखने का भी पात्र है। क्योंकि राष्टï्र उसकी सांसों की गरमाहट से निर्मित होता है। उसका एक-एक सांस राष्टï्र के लिए होता है, वह नि:स्वार्थ होता है और राष्टï्र को भी सदा ही नि:स्वार्थी लोगों की ही आवश्यकता होती है। इस राष्टï्र का कण कण अपने उन महान क्रांतिकारी संतों और नेताओं के प्रति समर्पित है, जिनके पुरूषार्थ से राष्टï्र आजाद हुआ। आज की शिक्षा प्रणाली में हमें आमूल चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है, ताकि राजमर्मज्ञ और राष्टï्र निर्माता राजर्षियों का निर्माण हो सके। क्योंकि ऐसे लोग ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को उचित दिशा दे सकेंगे। लाला हरदयाल के ये शब्द कितने प्रेरक हैं :-
यदि एक हिंदू सनातन धर्म छोडक़र आर्य समाजी बन जाए, या देव समाज छोडक़र राधास्वामी बन जाए या सिख बन जाए तो राष्टï्रीय राज्य मर्मज्ञ की दृष्टिï से कोई हानि नहंी, क्योंकि हिंदू राष्टï्र में इन सभी सम्प्रदायों की पूर्ण स्वतंत्रता है। परंतु यदि कोई कपूत विजयादशमी का त्यौहार ना मनाएं या गुरू गोविंद सिंह की निंदा करे…..तो वह राष्टï्रीय राज्य की जड़ों को कमजोर करता है और राष्टï्र की जड़ काटता है। ऐसे मनुष्य के लिए स्वतंत्रता और सहिष्णुता नहीं है। स्वतंत्रता मजहबी विचारों के लिए है, राष्टï्रीय नमक हरामी के लिए नहीं।
कांग्रेस नमक हरामों के खिलाफ अपनी भड़ास निकाले, मुंह खोले तो अच्छा लगेगा। राष्टï्र जागरण करना कोई अपराध नहीं है, राष्टï्र की जड़ खोदना अपराध है।

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