बाबा तुम संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं

बाबा रामदेव ने 2011 की जून में हुए अपने अपमान को इस बार बड़े सही ढंग से धो डाला। देश विदेश की मीडिया ने उनके और अन्ना हजारे के एक दिन के सांकेतिक अनशन को अपना भरपूर समर्थन दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें समर्थन देकर अच्छा ही किया है। यह सच है कि बाबा रामदेव अन्ना हजारे से कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण लेकर आगे चल रहे हैं। अन्ना भ्रष्टाचार पर बोल रहे हैं और जनलोकपाल को ही मानो भारत की वर्तमान दुर्व्यवस्था का एक मात्र हल मानते हैं। जबकि बाबा व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहे हैं। वह शिक्षा में असमानता की स्थिति पर जमकर प्रहार कर रहे हैं।सब्सिडी देने में माहिर हमारे राजनीतिज्ञों ने देश की मूलभूत आवश्यकताओं की ओर से कतई ध्यान हटा लिया है। देश के कुल गांवों की संख्या 6,38,596 है। इनमें से आबाद गांवों की कुल संख्या 593731 है। पूरे देश में इतने गांवों के लिए प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 5,70,000 है। उत्तर प्रदेश के कुल आबाद गांवों की संख्या 97,942 है। जबकि प्राईमरी स्कूलों की संख्या यहाँ 1,19,443 है। इनमें से लगभग 12.50 प्रतिशत शहरों या कस्बों में स्थापित हैं। प्रदेश में 1.75 करोड़ बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। पूरे देश में 27 मिलियन प्राईमरी अध्यापक हैं। परन्तु फिर भी 19 नवम्बर 2007 तक सरकारी आंकडों के अनुसार 21 मिलियन बच्चे प्राईमरी शिक्षा से वंचित थे।
इन आंकड़ो पर यदि दृष्टि डाली जाये तो स्पष्ट होता है कि अभी प्रत्येक गांव के लिये एक प्राईमरी स्कूल की व्यवस्था भी हम नही करा पाये हैं। जबकि देश को आजाद हुए 65 वर्ष हो गये हैं। 21 मिलियन बच्चे प्राईमरी शिक्षा से वंचित हैं, यह भी एक दुःखपूर्ण तथ्य है। यदि ये बच्चे और स्कूल जाने लगंे और जो बच्चे सरकारी प्राईमरी पाठशालाओं में शिक्षा नही ले रहे हैं, बल्कि किसी अन्य निजी संस्थानों में शिक्षा ले रहे हैं, उनकी संख्या भी बहुत बड़ी है, यदि इसमें उन्हें भी सम्मिलित कर लिया जाये तो पता चलेगा कि हमें लगभग जितने स्कूल अब कार्यरत हैं उनसे भी अधिक और चाहिये। यदि हमारे पास संसाधन हों और हम अपनी योजनाओं को वास्तव में ही ग्रामोन्मुखी और गरीबोन्मुखी बनाने वाले हों तो भारत वर्ष में जो करीब 27 मिलियन प्राईमरी अध्यापक कार्यरत हैं, तब हमें इतने ही और अध्यापकों की आवश्यकता पडे़गी। स्पष्ट है कि इससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा। लेकिन शिक्षा का पूरा ताम झाम कुछ लोगों ने खरीद लिया है अतः उसका निजीकरण और व्यापारीकरण हो गया है। सरकार सस्ती शिक्षा के नाम पर शोर मचा रही है और लोग अपने बच्चों को महंगी शिक्षा दिलाकर सरकार की नीतियों का उपहास उड़ा रहे हैं। परम्परागत शिक्षा बेरोजगार पैदा कर रही है और वह अब गरीबों के हिस्से में चली गयी है।बी॰ ए॰ और एम॰ ए॰ की उपाधि लेना आजकल मजाक का कारण बन गया है। परन्तु गरीब के पास इन डिग्रियों को लेने के अलावा कोई उपाय नही है। इस प्रकार शिक्षित बेरोजगार भी गरीबों की आबादी में ही मिलते हैं। उनकी डिग्रियाँ किसी काम की नही रही हैं। यदि देश में प्राईमरी स्कूल भी पूरे कर दिये जायें और 27 लाख मिलियन अध्यापकों की भर्ती कर बी॰ ए॰, बी॰ एड॰ या एम॰ ए॰, बी॰ एड॰ छात्रों को अध्यापक नियुक्त कर दिया जाये तो गरीबों में से शिक्षित बेरोजगारों का कितना भला हो सकता है?पूरे देश में पचास हजार से एक लाख तक की आबादी के कस्बों में भी सरकारी स्कूल (प्राथमिक स्तरीय) एक ही है। जबकि प्राईवेट स्कूल सैंकडों खुल गये हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा दिलाना अथवा सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराना लोग अच्छा नही मानते। जो लोग मजबूरी वश इन सरकारी संस्थानों की शरण में जा भी रहे हैं वहां लोग ऐसे व्यक्तियों को बेचारा मानते हैं। इसलिए लोगों का रूझान सरकारी संस्थानों की बजाय प्राईवेट अस्पतालों तथा प्राईवेट स्कूलों की ओर बढ़ा है। फलस्वरूप ये प्राईवेट स्कूल तथा प्राईवेट अस्पताल चांदी काट रहे हैं। सरकार की स्थिति अब ऐसी नही है कि 50 हजार के कस्बे के लिये 20 प्राथमिक विद्यालय और कम से कम 10 सरकारी अस्पताल खडे कर दें। ऐसी स्थिति में शिक्षा एक समान न रह कर गरीब अमीर की खाई को बढ़ावा दे रही है। इससे समाज में गरीब-अमीर के बीच द्वेष भाव बढ़ता ही जा रहा है। कानून के समक्ष समानता की डींग मारने वाले हम लोगों के लिए कानून के समक्ष समानता तो अब रही ही नही है, समाज में भी और शिक्षा में भी समानता नही रही है। एक वर्ग आगे बढ़ रहा है और उसी के बच्चों का देश की बड़ी नौकरियों पर व बड़े पदों पर एकाधिकार हो गया है। इससे सामाजिक असमानता जैसी विसंगतियाँ दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। पर जब शिक्षा का भी व्यापारीकरण हो जाये तो समान शिक्षा कहां रह जाती है। समान शिक्षा ही समाज में समानता लाती है। आज सामाजिक विषमता इसीलिए है कि देश में शिक्षा पर एक वर्ग का एकाधिकार हो गया है। इसलिये आरक्षण का टुकड़ा डाल डालकर देश के पिछडे़ व दलित समाज को वहां उलझाया जा रहा है और मलाई कोई और चाट रहा है। लड़ाई जातियों के मध्य आरक्षण के नाम पर करा दी गयी है और देश के सम्पन्न वर्ग ने मलाई अपने नाम कर ली है। लड़ाई कभी जातियों के मध्य नही रही। शोषण सदा ही सम्पन्न और समृद्ध व्यक्ति ने विपन्न और दलित व पिछडे़ लोगों का किया है। आज भी जो आगे हैं वो पिछड़ों का या दलितों का शोषण कर रहे हैं। यहाँ तक की सम्पन्न दलित और पिछड़े लोग भी सजातीय दलितों और पिछड़ों का शोषण कर रहे हैं। अतः आज शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। यदि शिक्षा का शुल्क 50 रूपये भी कर दिया जाये तो भी गलत नही होगा। लोग दे देंगे परन्तु लोगों को उसी अनुपात में सुविधाऐं और लाभ भी मिलने चाहियें। शिक्षा और शिक्षक दोनों का शोषण निजी स्कूल वाले लोग कर रहे हैं। श्रम पर पूंजी शासन कर रही है। यह पूंजीवादी व्यवस्था निजी स्कूलों के माध्यम से समाज में एक कोढ बनकर फैल गयी है। सारा देश लहुलुहान है, पर शासक सही चिकित्सा न देकर लोगों को ‘‘सब्सिडी’’ आदि से बहका रहे हैं।
व्यवस्था की दयनीय स्थिति के सन्दर्भ में एक उदाहरण आप और ले सकते हैं। देश में रेलवे मार्गो की कुल लम्बाई 1 लाख 15 हजार किमी॰ के लगभग है। यह देश की विशालता के दृष्टिगत बहुत कम है। 32 लाख वर्ग किमी॰ में फैले देश में अब तक इतनी ही लम्बाई की रेल लाईनें और फैल जानी चाहिये थीं। जितनी रेलें आज हैं उतनी ही और होनी चाहिये थीं। उससे पैट्रोल व डीजल की खपत कम होती, गांव का आदमी आराम से यात्रा कर सकता। सड़कों पर तथा पुलों पर हमें कम खर्च करना पड़ता। इसलिए रेल बजट में पूर्व रेल मंत्री नेे यात्रा किराया बढ़ाकर गलती नही की थी। गरीब 5 रूपये की बजाय दस रूपया भी दे देगा, बस आप उसे सुविधा दो। उसके लिए रेल बढ़ाओं, सीट दो। गरीबों के डिब्बों में जाकर देंखे वहां लोगों की क्या हालत होती है? क्या ही अच्छा हो कि रेल बजट का विरोध करने वाली ममता बैनर्जी एक बार गरीबों के डिब्बे से चलकर कोलकाता से दिल्ली तक का सफर करें तो उन्हें पता चले कि गरीबों को कितनी सुविधाओं की आवश्यकता है? जबकि उसी रेल में अमीर भी यात्रा करते हैं और जिनके लिए कई सुविधाऐं होती हैं। ममता बेनर्जी ने उस रेल बजट का विरोध करके एक तरह से गरीबों को यह अहसास कराया कि वह उनकी हमदर्द हैं। लेकिन वह हमदर्द नही थीं, उन्होंने गरीबों को उसी घिचपिच में यात्रा करने को विवश कर दिया और अन्य रेलें ना दिलाकर उन पर जुल्म किया है। देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आज रेल की व्यवस्था नही है। लेकिन सस्ती राजनीति के सामने जनकल्याण क्या बेचता है? खैर, बात बाबा रामदेव की कर रहे थे वहीं आते हैं। हमारा मानना है कि देश की दुर्व्यव्यवस्था और दुरावस्था पर बाबा रामदेव यदि मुखर हो रहे हैं तो निश्चित रूप से वह समस्या की जड पर प्रहार कर रहे हैं। इसीलिए यदि बाबा के लिए देश का युवा वर्ग ये संकल्प ले रहा है कि ‘बाबा तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं’ तो यह सही समय पर लिया जाने वाला सही संकल्प है।
बाबा राष्ट्र की संकल्प शक्ति को जगाने का वन्दनीय कार्य कर रहे हैं। यह बात समझने की आवश्यकता है कि यदि कल को कोई प्राकृतिक आपदा आ जाये तो देश में किसी भीशहर में इतने अस्पताल नही हैं कि जो उस समय स्थिति का सामना कर सकंे। सवा अरब की आबादी के देश में अच्छे कहे जाने वाले अस्पतालों की संख्या मात्र सैंकड़ों में है। यह व्यवस्था में दोष है। देश के अधिकांश गांव बिजली, सड़क, अस्पताल, विद्यालय, पानी की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है तो यह भी व्यवस्था की कमी है। इस व्यवस्था परिवर्तन के लिये हमारा वर्तमान संविधान लोगों को शान्तिपूर्ण सभा करने का अवसर उपलब्ध कराता है। तथ्यों के आधार पर सत्य को उदघारित करने के लिये यदि बाबा रामदेव दिल्ली में फिर हुंकार भरकर लौटे हैं तो इस एक बाबा ने सिद्ध कर दिया है कि उसके साथ देश के करोड़ों लोग हैं, जो कि व्यवस्था से दुःखी हैं। उसी दुःख को बाबा ने एक अभिव्यक्ति दी है। प्रत्येक दिन का सूर्य जब-जब सुबह जगाता है तो मानो वह सूर्य नही जागता बल्कि एक उम्मीद जागती है और सुबह के नाश्ते के लिये जब हमारे भीतर एक भूख जागती है तो मानो भूख नही जागती बल्कि एक चुनौती जागती है कि अब रोटी का जुगाड़ और कैसे होगा? उम्मीद के साथ चुनौती का चोली दामन का साथ है। बाबा एक उम्मीद बने हैं तो देश की दुरावस्था एक चुनौती बनी है। इस चुनौती को देश की जनता की आवाज में ढ़ालकर बाबा ने सुलझाने की कोशिश की है। निश्चित ही देश की आवाज ने मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की आंखें खोल दी हैं। वह हड़बड़ी में हैं और समझ नही पा रहे हैं कि आन्दोलन के लिये उठती जनता को कैसे काबू किया जाये?
यही स्थिति विपक्ष की है वह भी नही समझ पा रहा है कि क्या किया जाये? इसलिये देश का युवा वर्ग स्वाभाविक रूप से बाबा से कह रहा है कि बाबा तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं।

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