…यूं तय हो गयी थी 15 अगस्त की तारीख

14 व 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि समय 12 बजे वह घड़ी थी जिसने भारत को युगांतरकारी परिवर्तन की ओर बढ़ा दिया था। पुराने से नये में प्रवेश करा दिया था। यही वो क्षण थे, जिसके लिए हमने सैकड़ों वर्ष तक संघर्ष किया था। आज वह संघर्ष अपने लक्ष्य पर पहुंच गया था। किंतु यह भी सच है कि यह लक्ष्य विभाजन की उस पीड़ा के साथ हमें मिला जिसके कारण न केवल लाखों निरपराध लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े अपितु भारत मां का दुखद विभाजन भी हमें झेलना पड़ा। इस प्रकार स्वतंत्रता की इतनी बड़ी प्रसन्नता दुख के इस महासागर में विलीन सी हो गयी थी। स्वयं पंडित नेहरू ने जो उस समय कहा था, वह हमारी इसी बात की साक्षी देता है-आज हम जो यहां मिल रहे हैं इस मिलन को स्वयं हमने बरसों पहले तय कर लिया था। हमारी वह प्रतिज्ञा (26 जनवरी 1929 को लाहौर में रावी नदी के किनारे रात्रि 12 बजे नेहरू जी और उनके साथियों ने पूर्ण स्वाधीनता की जो शपथ ली थी, उसी की ओर उनका संकेत था) आज पूरी हो रही है। यह सच है कि सपना ज्यों का त्यों साकार नही हो रहा, लेकिन फिर भी अधिकांश सपना तो साकार हो ही गया है। आज ज्यों ही आधी रात की टंकार होगी जब दुनिया सो रही होगी भारत जागेगा और जागते ही आजाद हो जाएगा। इतिहास में ऐसे क्षण कभी कभी ही आते हैं जब केवल एक कदम से पूरा युग समाप्त हो जाए और बरसों से दबे पड़े किसी देश की आत्मा एकाएक सोते से जाग पड़े। सारा देश विभाजन की पीड़ा को किसी प्रकार छिपाकर एक कदम आगे बढऩे के क्षणों का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उधर एक व्यक्ति भी था जो कुछ दूसरी ही बात सोच रहा था। वह था लार्ड माउंटबेटन महारानी विक्टोरिया का प्रपौत्र जिसे नियति ने भारत का वायसराय बनाकर यहां भेज दिया था और वह नही चाहता था कि 1858 में महारानी विक्टोरिया ने जिस यूनियन जैक को भारत के दिल्ली स्थित लालकिले पर इस देश पर सदियों तक राज करने का सपना लेकर फहराया था, उसे मात्र 90 वर्ष पश्चात ही उसके हाथों से उतारा जाए। उन्होंने लैरी कालिंस और दॉमिनिक लैपियर से बाद में एक साक्षात्कार में बड़ी रोचक बातें भारत की आजादी के विषय में बतायी थीं। जिसे लेखकद्वय ने अपनी पुस्तक माउंटबेटन और भारत का विभाजन में अक्षरश: लिखा है। लेखकगण को माउंटबेटन ने उस रात की मन:स्थिति इस प्रकार बयान की थी-14 अगस्त की रात, बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे। मैं अपना सारा काम निपटाकर खाली बैठा अपने आपसे कह रहा था, और कुछ ही मिनटों के लिए मैं संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूं दुनिया में कोई दूसरा नही जो मानवता के पांचवें भाग की जिंदगी और मौत का मालिक हो। जब वायसराय से पूछा गया कि वह अपने अंतिम क्षणों का उपयोग किस प्रकार करना चाहते थे तो उन्होंने बताया कि 1947 में जब वायरास बनकर मैं आया तो पल्लनपुर के नवाब मुझसे मिलने आये। सर जॉर्ज एबेल ने एक चिट भिजवाई जिस पर लिखा था पल्लनपुर के नवाब अपनी बेगम को हिज हाईनैस की उपाधि दिलवाने की बात अवश्य कहेंगे, लंदन के राज्य सचिव ने मना कर दिया है, इसलिए आप यह काम नही कर सकते। मैं सोचने लगा कि इस सत्त्ता का आखिरी उपयोग क्या हो? मैं पल्लनपुर की बेगम को हिज हाईनेस बना दूंगा। मैंने तय किया। माउंटबेटन ने अपनी सत्ता का आखिरी उपयोग इसी काम के लिए किया। उन्होंने पल्लनपुर के नवाब के लिए लिखा बधाई हो उपस्थित लोगों के सामने हम आपकी बेगम को हिज हाईनेस का ओहदा अदा करते हैं। उस पर हस्ताक्षर करके नवाब के रेजिडेंट को भिजवा दिया गया। जिसे पढ़कर नवाब और उनकी बेगम को असीम प्रसन्नता हुई। जब माउंटबेटन से भारत को स्वतंत्र करने के लिए 15 अगस्त की ही तारीख तय करने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा बस यों ही तारीख चुन ली। मैं यह दिखा देने पर दृढ़ संकल्प था कि सब कुछ मेरे नियंत्रण में है। जब उन्होंने (कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने) पूछा कि क्या तारीख तय हो गयी? जब मैं जान गया कि जल्दी ही होनी चाहिए। तब तक मैंने इस पर बहुत सोचा विचारा नही था लेकिन तभी सोच लिया कि अगस्त या सितंबर तक यह काम हो जाना चाहिए। फिर मैंने 15 अगस्त तय कर लिया। क्योंकि जापान के आत्म समर्पण की यह दूसरी वर्षगांठ थी। मैं जानता था कि स्वतंत्रता की भी कोई तारीख तो होगी ही। फिर यही सही। मेरे स्टाफ ने अलग अलग तारीखें सुझाई-बाद की तारीखें। जब मैंने उन्हें बताया तो इतने पास की तारीख सुनकर वह घबरा गये। इस प्रकार स्पष्टï हो जाता है कि भारत को स्वतंत्रता मिलने की तारीख को तय करने में कांग्रेस या मुस्लिम लीग की कोई बात नही सुनी गयी। इस कार्य को केवल माउंटबेटन ने अपनी मर्जी से तय किया। कांग्रेस ने कोई वैकल्पिक तारीख भी तय करके नही दी। जिसमें भारतीयता का पुट दीखता जैसे जन्माष्टमी, शरदपूर्णिमा या विजयदशमी आदि। नेहरू जी को सत्ता प्राप्त करने की जल्दी सता रही थी। यही स्थिति जिन्नाह की थी। जिन्नाह को तपेदिक था। वह जानता था कि वह अधिक दिनों का मेहमान नही है। इसलिए वह भी सत्ता के लिए लालायित था। यही कारण था कि उसने माउंटबेटन को दोनों देशों का गवर्नर जनरल बनाने का विरोधा किया और पाकिस्तान में ऐसे समकक्ष पद कोउसने स्वयं ने ही ग्रहण किया। यद्यपि 3 फरवरी 1946 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉर्ड एटली ने ब्रिटेन की पार्लियामेंट में यह घोषणा की थी कि जून 1948 तक वह भारत को छोड़ देंगे। किंतु जून 1948 तक का समय जिन्नाह के पास नही था। उधर नेहरू तो बहुत ही आतुर थे। 11 सितंबर 1948 को जब जिन्नाह संसार से चले गये तो उनकी व्याकुलता संसार को समझ आ गयी। परंतु नेहरू की व्याकुलता आज भी रहस्य बनी हुई है? लॉर्ड एटली की घोषणा के अनुसार यदि अंग्रेज भारत से जून 1948 तक विदा होता तो विभाजन के समय जो नरसंहार हुआ था वह न होता और देश की आबादी का तबादला सहजता से एक योजनाबद्घ ढंग से संपन्न हो जाता परंतु जैसा कि माउंटबेटन ने इस प्रश्न के उत्तर में कि क्या सत्ता के हस्तातंरण में शीघ्रता की गयी? जो कुछ कहा वह स्थिति को स्पष्टï करता है। उन्होंने कहा कि जानता हूं कि मुझ पर जल्दबाजी का आरोप लगाया गया है। डर था कि मैं भारत को जोड़े रख सकूंगा या सब कुछ टूट जाएगा। मैं एक मूर्ख भारत सरकार के साथ बांध दिया गया था। जिसके 15 सदस्य थे। छह मुस्लिम लीग छह कांग्रेस और तीन अन्य। कांग्रेस जो भी चाहती थी उसके पक्ष में 9 और 6 वोट ही पड़ते। ऐसे में शासन कर पाना संभव नही था। क्योंकि मुस्लिम लीग मानती नही थी। मुझको एक विचार सूझा। मैंने सोचा सरकार को तोड़कर दो सरकारें बना दी जाएं। होने वाले भारत और होने वाले पाकिस्तान की सरकारें। इससे हुआ यह है कि ये लोग विभाजन और संपत्ति के बंटवारे के मामलों को लेकर व्यस्त रहने लगे लेकिन कभी कभी गडग़ड़ाहट इतनी तेज हो जाती कि मैं सोचने लगता कि तारीख निश्चित करने में मैंने शीघ्रता तो नही की? वस्तुत: लॉर्ड माउंटबेटन की अपनी विवशताएं थीं। वह अपने पूर्ववर्तियों की कुटिल चालों से फलित जिस बेल को काट रहे थे, वह उनसे इस प्रकार लिपट गयी थी कि उससे वह मुक्त होने की इच्छा रखते हुए भी मुक्त नही हो सकते थे। वह भारत का विभाजन कर देने का मन बनाकर ही भारत आये थे। यह उनका पूर्वाग्रह था। इसीलिए उन्होंने तिथि निश्चित करने में शीघ्रता की और उसका उपरोक्त कारण भी बताया, परंतु फिर भी वह इस बात से मुक्त नही हो सकते कि उनकी जल्दबाजी के कारण मुस्लिम लीग और कांग्रेस सत्ता की तैयारियों में जुट गयी। इन दलों ने और स्वयं लॉर्ड माउंटबेटन ने देश की करोड़ों की आबादी के स्थानांतरण को भेडिय़ों के हाथों सौंप दिया और जनसंख्या के एक महासागर रूपी बांध को अपने अपने प्रयासों के फावड़े से वही से काट दिया जहां से वह अत्यंत संवेदनशील था अर्थात मजहब की जुनूनियत के बिंदु पर से। इस टूटे हुए बांध ने जिस प्रकार तहस नहस मचाया आज वह इतिहास का क्रूर अध्याय है। यदि नेहरू अपनी अचकन को मात्र एक वर्ष के लिए उतारकर रख देते और सरकार पर इस बात का दबाब बनाते कि विभाजन और स्वतंत्रता की अभी कोई शीघ्रता नही है। पहले सारा कार्य सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कर दिया जाए तभी हम आगे बढेंगे, तो तब तक जिन्नाह संसार से चले जाते। उनके बाद मुस्लिम लीग का पाकिस्तान के प्रति अडिय़ल रवैया नरम हो सकता था क्योंकि माउंटबेटन से मुस्लिम लीग की ओर से मिलने वाले वही एक ऐसे नेता थे जो प्रत्येक परिस्थिति में पाकिस्तान बनाना चाहते थे। अन्य कोई नेता इतना पूर्वाग्रह ग्रस्त नही था। अफसोस कि हम नियति को टाल नही सके।

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