गुरू पूर्णिमा पर्व रहस्य*

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Dr DK Garg

भाग 2

इस अलोक में जो धर्मगुरु अपने को गुरु कहकर पूजा करवाते है वो अधर्म है और गलत है। बल्कि अध्यापक -शिक्षक को भी गुरु नहीं कहना चाहिए ,लेकिन वर्तमान में ये परिपाटी चल पड़ी है , उनको ईश्वर के तुल्य मानकर उनकी तस्वीर पूजना , माला पहनाना और ईश्वर का एजेंट मान लेना पाखंड है।
मनुष्य का पहला जन्म माता से होता है,दूसरा जन्म गुरु के द्वारा विद्या देकर किया जाता है।जब हम वेद का स्वाध्याय करते हैं और तदानुकूल आचरण करते है तो हमें ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
शिक्षक : जो स्कूल , कालेज में शुल्क लेकर सांसारिक शिक्षा देते है उनको शिक्षक कहा जाता है।
परमपिता परमेश्वर गुरुओं का भी गुरु है।सद्गुरु, महागुरु, जगतगुरु आदि शब्दों का वैदिक साहित्य में कोई उल्लेख नहीं है। ये बाबाओं ने अपनी सुविधा अनुसार अपने लिए प्रयोग किये है ताकि उनके शिष्य उनकी महिमा मंडन करते रहें।
धर्मगुरु :जो वेद विद्या ,धर्म की शिक्षा देते है उनको धर्म गुरु कह सकता है ,अन्य को धर्म गुरु कहना अधर्म है।
गुरु पूर्णिमा का स्वरूप :
गुरु पूर्णिमा : जैसा की स्पष्ट है की गुरु पूर्णिमा पर्व गुरु के लिए सम्मान देने के लिए समर्पित है। भारत में शिक्षक और धर्म गुरुओ का इस दिन विशेष सम्मान किया जाता है। भारतीय शिक्षाविद् अपने शिक्षकों को धन्यवाद देकर इस दिन को मनाते हैं। कई स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें छात्र अपने शिक्षकों को धन्यवाद देते हैं और पिछले विद्वानों को याद करते हैं। पूर्व छात्र अपने शिक्षकों से मिलते हैं और कृतज्ञता के संकेत के रूप में उपहार प्रस्तुत करते हैं।संक्षेप में, गुरु पूर्णिमा भारतीयों द्वारा शिक्षक दिवस मनाने का एक पारंपरिक तरीका है।
वर्तमान में गुरु पूर्णिमा मनाने का विकृत स्वरूप और विश्लेषण : आजकल इस पर्व को लेकर अनेको पाखंड सुरु हो गए है और हिन्दू समाज में इस दिन तथाकथित गुरु लोगों की लॉटरी लग जाती हैं। सभी तथाकथित गुरुओं के चेले अपने अपने गुरुओं के मठों, आश्रमों, गद्दियों पर पहुँच कर उनके दर्शन करने की हौड़ में लग जाते हैं। खूब दान, मान एकत्र हो जाता हैं। ऐसा लगता हैं की यह दिन गुरुओं ने अपनी प्रतिष्ठा के लिए प्रसिद्द किया हैं। भक्तों को यह विश्वास हैं की इस दिन गुरु के दर्शन करने से उनके जीवन का कल्याण होगा।
गुरु की महिमा में गीत गए जाते है। गुरुडम कि दुकान चलाने वाले कुछ अज्ञानी लोगों ने कबीर के इस दोहे का नाम लेकर यह कहना आरम्भ कर दिया हैं कि ईश्वर से बड़ा गुरु हैं क्यूंकि गुरु ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताता हैं।ईश्वर और मानवीय गुरु में सम्बन्ध को लेकर कबीर दास के दोहे को प्रसिद्द किया जा रहा हैं।
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥
और संस्कृत का ये श्लोक सुनाकर भक्तो को भ्रमित किया जाता है :
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेशरः।
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
इसका उपयोग ये नकली गुरु अपनी महिमामंडल के लिए करते हैं और ब्रह्मा, विष्णु आदि ईश्वर के अनेक नामों से अपनी तुलना कराते हुए फूल कर कुप्पा होते रहते हैं।इसके आगे उनका ध्यान नहीं जाता । वास्तविक अर्थ में इस श्लोक से वेद में स्पष्ट आदेश है कि ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर एवं साक्षात् परमब्रह्म ही गुरु है। उन गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
स्पष्ट है कि गुरु की उपरोक्त कसौटी पर जो खरा उतर जाता है वही गुरु है। अर्थात जिस प्रकार सोने की कसौटी पर खरा उतरनेवाली धातु ही सोना होती है। ठीक उसी प्रकार गुरु की कसौटी पर खरा उतरनेवाला ही गुरु है। वेद के नियमों के अनुसार- ‘‘श्रीब्रह्मा,‘‘ ‘‘श्रीविष्णु‘‘ और ‘‘श्रीमहेश्वर‘ एवं साक्षात् ‘‘परम् ब्रह्म‘‘ ही गुरु हैं। परन्तु इस श्लोक के वैदिक अर्थ इसलिए बदलकर अवैदिक विधि से वर्तमान मानव-मनीषियों ने समझाया है कि शरीरधारी मनुष्य रूपी गुरु ही ब्रह्मा है और यही मनुष्य रूपी गुरु ही विष्णु है एवं मनुष्य रूपी गुरु ही महेश्वर है तथा मनुष्य रूपी गुरु ही साक्षात् परम् ब्रह्म परमेश्वर है। यदि कोई शरीरधारी मनुष्य स्वयं को गुरु के बहाने ही श्रीब्रह्मा, श्रीविष्णु और श्रीमहेश्वर तथा साक्षात् परम् ब्रह्म कहलवाता है तो ‘‘महासरस्वती‘‘ और ‘‘महालक्ष्मी‘‘ एवं ‘‘महाकाली‘‘ का अपमान ही होगा क्योंकि पिता के अलावा अन्य किसी मनुष्य को पिता स्वीकार करते है तब तो जिसे पिता मानेंगे वही माता का पति कहलायेगा।

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