जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र का रक्षक होता है। वह यदि चेत जाए तो संसदीय संस्थाओं का सम्मान लौट सकता है। राजनीति को भ्रष्टाचार और अपराधीकरण से मुक्ति मिलेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा। क्षेत्रीय और जातिगत समीकरणों के नजरिए से पार्टियों ने बाहुबलियों को भी अपना उम्मीदवार बनाने में संकोच नहीं किया है। सजा पाए लोगों को विधायिका में घुसने से कानून ने तो रोक लगा दी है, लेकिन उन्हें कैसे रोका जा सकता है जिनकी छवि आपराधिक है, मुकदमे भी चल रहे हैं, पर किसी मामले में सजा नहीं हुई है। उन्हें रोकने का काम तो मतदाता ही कर सकते हैं।  राजनीति में पतित और भ्रष्ट लोगों के दबदबे के कारण नौकरशाही भी बेलगाम और भ्रष्ट हो गई है। इस सब का खमियाजा अंतत: जनता को ही भुगतना पड़ता है। किसी भी लोकतांत्रिक अनुष्ठान या यज्ञ में संकल्प के बिना विजय नहीं मिल सकती है। इसलिए जनता यदि यह ठान ले कि वह पढ़े-लिखे और ईमानदार लोगों को ही वोट देगी तो कोई माफिया, बाहुबली और भ्रष्टाचारी चुनाव नहीं जीत सकता है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर जनता को अपने भाग्य का फैसला करने का अधिकार मिला है। यदि आप स्वस्थ समाज चाहते हैं तो कम से कम भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को अपना प्रतिनिधि मत चुनिए। जिन्हें आप चुनेंगे वही कानून और सरकार बनाएंगे। देश का शासन कानून के अनुसार चलता है और देश का कानून आपके चुने हुए प्रतिनिधि बनाते हैं। इन्हीं के हाथों में है कि वे कैसा कानून बनाएंगे और कैसे उनका क्रियान्वयन होगा। आप ऐसे विधायकों को चुनेंगे जिनके हाथों में पांच वर्ष तक प्रदेश का भविष्य होगा। यदि अच्छे लोग विधानसभा में जाएंगे तो अच्छे कानून बना कर प्रदेश का विकास करेंगे। यदि गलत लोग विधानसभा में पहुंच गए तो वे न तो अच्छे कानून बनने देंगे और न ही प्रदेश का विकास होने देंगे। गलत व्यक्ति विधायक चुना गया तो केवल एक जिले का नहीं बल्कि प्रदेश के करोड़ों लोगों का अहित कर सकता है क्योंकि यदि एक अपराधी या भ्रष्टाचारी को खुद कानून का निर्माता बना दिया जाता है तो वह कभी ऐसे कानून का समर्थन नहीं करेगा जो खुद उसके ऊपर अंकुश लगाता हो। ऐसी स्थिति में जनता के हित के कानून पारित नहीं हो पाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में अपने निजी स्वार्थ साधने वाले स्वयंसेवी, अपराधी तथा भ्रष्ट लोगों की घुसपैठ हो गई है, जिससे लोगों की कीमत पर चोर-बेईमानों और अपराधियों को फलने-फूलने में मदद मिली है। अपराधी और माफिया विधायक, सांसद और मंत्री तक हो चुके हैं। अब समय आ गया है कि मतदाता राज-काज को ऐसे लोगों से छुटकारा दिलाने के लिए अपने मताधिकार का प्रयोग करें। मतदाता अपनी पसंद जाहिर करके राजनीतिक दलों में घुसे अपराधियों और भ्रष्टाचारियों को राजनीति से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। चुनाव आयोग ने भी राजनीतिक दलों को जाति और धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगने का निर्देश दिया है। ऐसा करना आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने को भ्रष्ट आचरण बताया है। यदि आप चाहते हैं कि हमारी विधायिका में खीसें निपोरते हुए अपराधी और कपटी लोग न पहुंचें तो अपने मताधिकार का सही प्रयोग कीजिए और दूसरे लोगों को भी यह बताइए कि हम अपनी संसदीय राजनीति को अपने मतदान से साफ-सुथरा बना सकते हैं। आप चाहें तो उन लोगों को नकार सकते हैं जिन्होंने जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी ड्यूटी नहीं निभाई है या गैर-जिम्मेदार रहे हैं। आप उन लोगों को चुन सकते हैं जिनकी छवि साफ- सुथरी हो और जो सदन में आप की आवाज बन सकें।
लेकिन यह सब तभी संभव है जब आप अपने मतदान का प्रयोग जाति-बिरादरी, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठ कर करें। मतदाता अपने जनप्रतिनिधि से क्षेत्रीय विकास निधि का हिसाब मांग सकता है कि कहां और कितना खर्च हुआ, उससे क्षेत्र का कितना विकास हुआ? उन राजनीतिकों के लिए दरवाजे बंद होने चाहिए जो अपराधियों या माफिया तत्त्वों का समर्थन करते हैं अथवा अपनी पार्टी का टिकट बेचते हैं। क्षेत्रीय मतदाता अपने क्षेत्र के हर बाहुबली और जालसाज को जानता है। जिन लोगों ने विधायिका में आने के बाद धन और बाहुबल का प्रदर्शन किया है, आप उन्हें हरवा सकते हैं। बुजुर्गों ने हमेशा कहा है कि अच्छे अवसर का इंतजार करो और जब अवसर आए तो चूको मत। अब फैसला आप ही को करना है कि आप अपना जनप्रतिनिधि कैसा चाहते हैं। सिर्फ सरकार को कोसने से बात नहीं बनेगी। आप अपने अधिकार का प्रयोग कीजिए और दूसरों को भी बताइए कि लोकतंत्र में अपने भाग्य का निर्माता मतदाता स्वयं होता है। उन लोगों के लिए दरवाजे बंद होने चाहिए जिन्होंने भ्रष्ट तरीके से अनाप-शनाप दौलत जुटाई है। जाहिर है कि ऐसे लोग मतदाताओं को भी प्रलोभन देने की कोशिश करेंगे और यदि आप उनके चक्कर में फंस गए तो अपनी आने वाली पीढिय़ों का भविष्य बरबाद करेंगे।
अजीब है कि सभी दल भ्रष्टाचार को दूर करना चाहते हैं, लेकिन कोई भी दल लोकायुक्त को विधायकों की जांच का अधिकार नहीं देना चाहता। भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के बड़े-बड़े वादे सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल भूल जाते हैं। वे उसी भ्रष्टाचार में शामिल हो जाते हैं। जाति-बिरादरी और संप्रदाय के नाम पर राजनीति करने वालों से मतदाता जब तक पूरी तरह पिंड नहीं छुड़ा लेता, तब तक उसका उद्धार नहीं हो सकता। आजादी के सात दशक बाद भी आम आदमी मामूली मरहम-पट्टी के लिए घंटों स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर और कम्पाउंडर की प्रतीक्षा के लिए विवश है। पानी, बिजली, परिवहन और शिक्षा की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और किसी भी दल ने ध्यान देने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की है।  वास्तव में यदि लोग बेईमान और भ्रष्ट लोगों को ही जनप्रतिनिधि चुनते रहे तो हम इस जंजाल से कभी नहीं निकल सकेंगे। इस मुद््दे को उठाना जरूरी है और यह समस्या ऐसी नहीं है जो हल न हो सके। यदि जनता चाहे तो यह समस्या हल हो सकती है। हम अपने हाथ खड़े करके साफ-सुथरे समाज की कल्पना नहीं कर सकते हैं। राष्ट्र के रूप में हमें जागरूक होना पड़ेगा। जो राष्ट्र या व्यक्ति केवल अच्छा समय आने का इंतजार करता रहेगा, वह कुछ हासिल नहीं कर पाएगा, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र या व्यक्ति वही बनता है जो वक्त का इंतजार नहीं करता और स्वयं पहल करता है। इसलिए मतदाता को मतदान करते समय दल के बजाय अपने प्रतिनिधि के चाल-चलन, चरित्र पर खास ध्यान देना होगा। जब तक लोकतंत्र के लुटेरों को आप अपना प्रतिनिधि चुनते रहेंगे तब तक आपका कोई भला नहीं कर सकता है। आंखें बंद रखने से काम नहीं चलेगा। जनता को आंखें खोलनी ही होंगी। उसे अपने प्रत्याशियों के चाल-चलन और चरित्र को देख कर ही फैसला करना होगा।
यदि आप मतदान के समय सही फैसला नहीं करेंगे तो आप अपना और अपनी आने वाली पीढिय़ों का भला नहीं कर सकते। ऐसी हालत में चर्चिल की वह भविष्यवाणी सही सिद्ध हो जाएगी कि ‘भारतीय शासन करना नहीं जानते और इनकी आजादी का मतलब इनकी बरबादी होगा।’ इसलिए यह आप के विवेक की परीक्षा का समय है। आप अपने मत का सही फैसला कीजिए और उन्हें चुनिए जो ईमानदारी के साथ सरकार चला सकें और जनता को भी न्याय दे सकें।

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