अशांति की गिरफ्त में पूर्वोत्तर

तरुण विजय
विगत एक फरवरी से नगालैंड के दो सबसे बड़े जिले कोहिमा और दीमापुर जल रहे हैं। वहां सेना तैनात करनी पड़ी और मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार ने विशेष निर्देश दिए हैं। दीमापुर के अलावा चुमोकेडिमा जिले में भी कफ्र्यू लगाने की नौबत आ गई। स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि स्थानीय निकाय चुनाव भी निरस्त कर दिए गए हैं। राज्य में पिछले 16 वर्षों से स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं हुए हैं। नगा मात्र संगठन की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के साथ शीघ्र चुनाव कराने के निर्देश दिए थे। इन चुनावों के विरोध में नगा जनजाति को मिले अधिकारों का हनन है, जो उन्हें संविधान की धारा 371-ए के तहत हासिल हैं। इन संगठनों द्वारा नगालैंड में चुनाव के विरोध में बंद का आयोजन किया गया। ऐसे ही विरोध प्रदर्शन अत्यंत उग्र होने पर पुलिस की गोलीबारी में दो नगा युवक मारे गए। इसके बाद वहां पर हिंसा भडक़ गई। जातीय संगठन यह कहते हुए विरोध पर उतर आए कि महिलाओं के लिए आरक्षण उनके परंपरागत जनजातीय अधिकार से जुड़ा है।
नगालैंड के साथ मणिपुर भी अराजकता और देश के अन्य भागों से जोडऩे वाले राजमार्गों के बंद होने की विभीषिका से जूझ रहा है। एक नवंबर को स्थानीय यूनाइटेड नगा काउंसिल ने जिस बंद का आह्वान किया था, वह बंद अभी समाप्त नहीं हुआ है। नगा काउंसिल का आरोप है कि मणिपुर की कांग्रेस सरकार ने सात नए जिले बनाते समय उससे सलाह नहीं ली थी और इन जिलों से नगा हितों पर चोट पहुंची। मणिपुर की यह आर्थिक नाकेबंदी प्रदेश की आर्थिक कमर तो तोड़ ही रही है, साथ ही साथ वहां का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। मणिपुर की राजधानी इंफाल लगभग चारों ओर से पहाडिय़ों से घिरी हुई है। वहां सडक़ मार्ग से जाने के लिए केवल दो राजमार्ग हैं – राजमार्ग संख्या 2 और 37। इसके अलावा म्यांमार की सीमा पर स्थित मोरे गांव से 100 किलोमीटर की सडक़ लडख़ड़ाती हुई इंफाल पहुंचती है। इन तीनों ही मार्गों के दोनों ओर जनजातियों की घनी बस्तियां हैं। वे जब चाहें इन मार्गों पर अवरोध पैदा कर सकते हैं। 25 नवंबर को नगा काउंसिल के अध्यक्ष गायदोन कामेई और प्रचार सचिव स्टीफेन लाम्कांग की गिरफ्तारी के बाद म्यांमार को भारत से जोडऩे वाले ट्रांस एशियन अंतरराष्ट्रीय राजमार्ग को बंद कर दिया गया। अब तक लगभग 100 वाहन आग की भेंट चढ़ चुके हैं। इस आर्थिक नाकेबंदी के कारण मणिपुर में आम जरूरत की सभी वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। पेट्रोल 250 रुपए प्रति लीटर से ज्यादा दाम पर बिक रहा है। सब्जी, ईंधन, गैस, आटा, दाल और चावल की तो पूछिए ही मत। स्कूल-कॉलेजों की वैसे ही दुर्दशा है। जिसके वश में होता है वह अपने बच्चों को दिल्ली, कोलकाता और देहरादून जैसे शहरों में पढऩे भेज देता है, लेकिन बाकी गरीब जनता क्या करे? वो ना मर सकती है और ना जी सकती है।
दूसरी ओर पूरा देश और मुख्यधारा का मीडिया चुनाव के शोर में डूबे हैं। किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि नगालैंड और मणिपुर के बारे में विशेष जानकारी दी जाए और सभी राजनीतिक दलों को इन भावनाओं से अवगत कराएं। अगर आप पूर्वोत्तर के दुख में शामिल नहीं हुए तो यह स्वर्ग तुल्य क्षेत्र आपके लिए सबसे बड़े दुख का कारण बन जाएगा। कश्मीर से ज्यादा आतंकवाद और अलगाववाद आज उस पूर्वोत्तर में पनप रहा है, जहां अगर शांति कायम होती तो यह क्षेत्र समूचे पूर्वी एशिया के लिए शिक्षा और पर्यटन का सबसे पसंदीदा भारतीय ठिकाना बन सकता था। अकेले मणिपुर में ही 17 से अधिक अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं, जिनमें से प्रमुख संगठन वामपंथी झुकाव वाला है। इसने अपना नाम चीन की सेना के नाम पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी रखा है। वहां पर्वतीय क्षेत्रों की जनसंख्या मुख्यत: ईसाई है। मगर मैदानी इलाकों में वैष्णव हिंदू धर्म के अद्भुत एवं प्रेरणादायी प्रचलन वाला स्वरूप देखने को मिलता है। वहां गोविंदजी का मंदिर और मणिपुर की पांच दिन तक लगातार चलने वाली होली का कहीं दूसरी जगह उदाहरण नहीं मिल सकता। वहीं उत्तर भारत के लिए वृंदावन की लठमार होली ही मानो होली का संपूर्ण परिचय है। संकुचित मानसिकता और राजनीतिक संकीर्णता के कारण मणिपुर की महान हिंदू विरासत के प्रति कम ही ध्यान गया है। बेहतर होगा यदि प्रधानमंत्री इस बार होली मणिपुर में मनाएं तो इसका देश-विदेश में बेहद सकारात्मक संदेश जाएगा।
नगालैंड में तो भारतीय इतिहास की सबसे अनूठी और अभूतपूर्व सर्वदलीय सरकार चल रही है। केवल 19 लाख की जनसंख्या और 80 प्रतिशत साक्षरता वाले इस सुंदर प्रदेश में पिछले साल जेलियांग के नेतृत्व में जो सरकार बनी, उसमें नगालैंड पीपुल्स फ्रंट की सहभागिता के साथ-साथ कांग्रेस, भाजपा, जदयू और एनसीपी के सदस्य भी शामिल हैं। रोचक तथ्य यह है कि कांग्रेस के 8 विधायक हैं, जिनमें 7 को कैबिनेट पद दिया गया है। यहां 1952 से फिजो के नेतृत्व में देश से अलग होने का विद्रोही आतंकवादी आंदोलन भी चल रहा है। चर्च का यहां हर क्षेत्र में वर्चस्व है और अलगाववादी आंदोलन भी उसके साये में पनपता है। उनकी मांग वृहत्तर नगालिंग बनाने की है, जिसमें मणिपुर, असम और अरुणाचल के भी कुछ हिस्से शामिल करने की मांग हो रही है। इस कारण संपूर्ण क्षेत्र में हमेशा अंतरप्रांतीय तनाव बना रहता है। 
गत वर्ष यहां शांति व्यवस्था और सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत ऐतिहासिक कदम उठाकर नगा समझौता किया था, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। फिर भी इस क्षेत्र को शेष भारत और राजनीतिक दलों द्वारा नजरअंदाज किया जाना भारतीय एकता एवं सद्भाव के लिए बहुत बड़ा खतरा बन रहा है। चुनाव चाहे उत्तर प्रदेश के हों या गोवा के, मीडिया और आम जनता का पूरा ध्यान उन पर ही टिका है और वे पूर्वोत्तर पर अपेक्षित रूप से ध्यान नहीं देते। हम तो वहां के भारतीय भाई-बहनों के नाम भी याद नहीं रख पाते। यदि पूर्वोत्तर निरंतर अराजकता और आतंक में जलता रहा तो भारत भी सुखी नहीं रह सकता। मणिपुर और नगालैंड में आम जनता की सबसे बड़ी शिकायत होती है कि शेष भारत के लोग उन्हें अपना नहीं मानते और जब वे मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों में नौकरी या पढ़ाई के लिए जाते हैं तो उनके साथ भेदभाव होता है। छुट्टियां मनाने भी लोग नेपाल या सिंगापुर चले जाएंगे, लेकिन स्विट्जरलैंड से भी सुंदर मणिपुर या अरुणाचल प्रदेश का रुख नहीं करेंगे।

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