भारत में आज न्यायालयों में करोड़ों वाद लंबित हैं। सस्ता और सुलभ न्याय देना सरकारी नीतियों का एक अंग है। किंतु यथार्थ में न्याय इस देश में इतना महंगा और देर से मिलने वाला हो गया है कि कई बार तो न्याय प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भी वह न्याय भी अन्याय सा प्रतीत होने लगता है।
ऐसा क्यों हो रहा है? यह विषय यहां विवेचनीय नहीं है। किंतु एक कारण पर विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। यह कारण है भारत में ग्राम स्तर की न्याय प्रणाली को समाप्त कर देने की निर्मम सरकारी नीति और पढऩे-लिखने के पश्चात व्यक्ति के भीतर पनपने वाली छल, कपट, द्वेष और घृणा की नीति। ग्राम स्तर पर आज पंच परमेश्वर की पुरानी भारतीय परंपरा लुप्त होती जा रही है। अब पंच स्वयं में पंच नहीं रह गया है। शराब की बोतलों से पंच क्रय कर लिये जाते हैं। इसलिए उनका परमेश्वर भी समाप्त हो गया है।
जहां पंचों को शराब से क्रय किया जाता हो उस समाज में अन्याय और अनाचार में वृद्घि होती है। जिस कारण पीडि़त पक्ष न्यायालय की शरण में जाता है। फलस्वरूप न्यायालयों पर वादों का अप्रत्याशित बोझ बढ़ रहा है। सरकारों का ध्यान न्यायालयों में वादों की हो रही वृद्घि के कारण की ओर तनिक भी नहीं है।

पंच परमेश्वर महिमा
आज आवश्यकता इस ओर ध्यान देने की है कि भारत का वह स्वरूप ज्यों का त्यों बना रहे जहां पंच स्वयं को परमेश्वर माने और बिना पक्षपात के सही-सही निर्णय देकर वादों का अपने स्तर पर बिना वकील, बिना दलील और बिना अपील के निस्तारण करे। इसके लिए हमें अपनी शिक्षा को केवल रोजगारप्रद ही नहीं, अपितु संस्कारप्रद भी बनाना होगा। आज पंच ही पंच नहीं रहा है और न ही उसे बड़ा या पंच मानने वाले लोग रहे हैं। फलस्वरूप देश में संयुक्त परिवारों की प्रथा भी समाप्त हो रही है। संयुक्त परिवार के मुखिया की अवधारणा मृतप्राय हो गयी है। अपने रक्त संबंधियों से लोगों को चिढ़ है और दूसरों से संबंध बनाया जा रहा है। जो अपने हैं ही नहीं, उनसे संबंध बनाना व्यक्ति को आजकल उचित लगता है। अत: जीवन ही नीरस हो गया है। क्योंकि समय पडऩे पर अपने साथ आते नहीं और व्यक्ति जिन्हें अपना मान रहा था वे लोग पल्लू झाड़ जाते हैं।
एक भयंकर षडय़ंत्र-‘भारत उजाड़ो – इंडिया बसाओ’ नीति
फलस्वरूप मनुष्य के जीवन में तनाव है, दबाव है, और अलगाव है। जिसका परिणाम मानसिक बीमारियों और हृदय रोगों के रूप में समाज में फैलते हुए देखा जा सकता है। इस सारी दुखद स्थिति का एक कारण जहां पश्चिम का अंधानुकरण है, वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारी कांग्रेस सरकारों की ‘भारत उजाड़ो और इंडिया बसाओ नीति’ भी एक महत्वपूर्ण कारण है।
बड़ों के अनुभव का आज युवा वर्ग लाभ उठाना नहीं चाहता। उसकी सोच यह बन गयी है कि तू तो स्वत: ही पिछली पीढ़ी से अधिक ज्ञानवान है। क्योंकि उसे बताया गया है कि हर अगली पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक ज्ञानवान होती है। इसलिए वृद्घ का ज्ञान और अनुभव दोनों ही एक कोठरी में उसी के साथ बंद किये जा रहे हैं। फलस्वरूप युवा वर्ग उच्छं्रखल, उद्दण्डी और उत्पाती होता जा रहा है। इसके विपरीत प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराएं कितनी महान थी? यथा-जीवन को हमारे यहां 100 वर्ष की अवधि का (न्यूनतम) मानकर उसके प्रथम पच्चीस वर्ष ब्रह्मचर्याश्रम के थे। जो सब प्रकार से शक्ति संचय करने के वर्ष थे। मानो पाठशाला में जाकर हम जोड़ के सवाल सीख रहे हैं।
अगले 25 वर्ष गृहस्थाश्रम में जाकर घटाने (शक्ति और जीवन मूल्यों में गिरावट और काम, क्रोध, ईष्र्या, जलन, मद, मोह, लोभ के वशीभूत हो जाने से) के थे और पुन: वानप्रस्थ में जाकर अगले 25 वर्ष गुणात्मक ढंग से अपनी खोयी शक्तियों का संचय करने के वर्ष थे। इसके पश्चात अंतिम 25 वर्ष संन्यास में जाकर जो कुछ अर्जित किया था-उसे बांट देने के थे। इस आश्रम में जाने वाले संन्यासी को सभी वंदनीय और पूजनीय मानते थे। वह संसार में एक संन्यासी ट्रस्टी की भांति जीवनयापन करता था, क्योंकि उसका कार्य अपने अनुभव जन्य ज्ञान और सदग्रंथों के अध्ययन से निर्मल बनी बुद्घि से समाज और संसार का उपकार करना था। ऐसे उपकारी जीवन सभी की पूजा और सम्मान के पात्र होते थे।

आदर्श समाज व्यवस्था
आज पश्चिम के संस्कार आ रहे हैं जिनके कारण हमें बताया जा रहा है कि ब्रह्मचर्य की शक्ति के संचय की कोई आवश्यकता नहीं है। गृहस्थ में रहकर अतिथि सेवा की भी आवश्यकता नहीं है। इसके पश्चात वानप्रस्थ की आवश्यकता नहीं, जब तक जियो, खाओ, पियो, और मौज करो बस यही पर्याप्त है। संन्यास में जाकर अनुभवों को बांटने और दूसरों के अनुभवों से लाभ लेने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि बात वही है कि अगली पीढ़ी पिछली वाली पीढ़ी से स्वयं ही अधिक बुद्घिमान होती है। इसलिए उसे किसी ज्ञान अथवा मार्गदर्शन की कोई भी आवश्यकता नहीं है। फलस्वरूप- 
-भारत की आत्मा छंटपटा रही है।
-चीत्कार कर करूण क्रंदन कर रही है।
-उसके मूल्य और स्वरूप उजड़ रहे हैं।
-पश्चिम के पाशविक मूल्य उमड़ रहे हैं।
-चहुं ओर से विनाश के बादल घुमड़ रहे हैं।
-हमें नहीं ज्ञात कि हम किधर बढ़ रहे हैं
-हम पतन की ओर हैं कि ऊपर चढ़ रहे हैं।
-हम विकास का या विनाश का साहित्य पढ़ रहे हैं।
हमें स्मरण रखना होगा-
जो देश अपने धर्म का स्वरूप स्वयं मिटाने लगे।
निजबंधुओं से शत्रुता कर संख्या बल घटाने लगे।।
एक दिन भूमंडल पर उसका नाम शेष रह जाएगा।
ऐसा या वैसा था कुछ ऐसा मात्र अवशेष रह जाएगा।।
हम सोच लें विचार लें कि हम किधर हैं जा रहे।
लक्ष्य जो था बलिदानियों का क्या उसे हम पा रहे।।
हम किस मां के पुत्र हैं और गीत किसके गा रहे।
‘राकेश’ इन्हें रोक दो ये पग जिधर बढ़े जा रहे।।
अत: हम समाज के इस गिरते स्वरूप पर विचार करें और भारत के प्राचीन वंदनीय स्वरूप की पुनस्र्थापना उसी दिशा में कार्य करें। यह समय की मांग है।
हम विकास का या विनाश का साहित्य पढ़ रहे हैं।

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş