इस घटना से जो उत्तेजना फैली उससे  एक दिन मालेर कोटला के महल को कूकों के द्वारा घेर लिया गया और जमकर संघर्ष हुआ। परिणाम स्वरूप 68 व्यक्ति मालेर कोटला के डिप्टी कमिश्नर ‘मिस्टर कॉवन’ ने पकड़ लिये  और अगले दिन उनमें से 49 लोग तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिये गये तथा पचासवां व्यक्ति जो एक 13 वर्षीय बालक था जिसे कॉवन की पत्नी ने बचाना चाहा, किंतु कॉवन को अपने गुरू रामसिंह जी को गाली बकते देखकर वह वीर बालक कॉवन की लंबी दाढ़ी को पकडक़र लटक गया और तब तक लटका रहा जब तक कि उसके दोनों हाथ न काट दिये गये।
इसके अलावा शेष व्यक्ति अगले दिन मलौध में फांसी पर लटका दिये गये। ये लोग उसी प्रकार अपना प्राणोत्सर्ग कर रहे थे जिस प्रकार कभी हमारे राजपूत लोग केसरिया साफा बांधकर प्राणोत्सर्ग के लिए मुस्लिमों के विरूद्घ रण के मैदान में उतर जाया करते थे। इनकी वीरता देखते ही बनती थी। निश्चित रूप से उनकी वीरता पर पंजाब और ये देश युगों युगों तक गौरव का अनुभव करता रहेगा।

गांधीजी की अहिंसा इन्हें लील गयी
एक आपराधिक षडय़ंत्र के अंतर्गत जिस प्रकार हमारे क्रांतिकारी और महान स्वतंत्रता सेनानियों को भुलाया गया है, उसी के अंतर्गत कूका आंदोलन के प्रणेता और प्रचेता तथा उनके वीर सहयोगियों को हमने भुला दिया। एक प्रकार से गांधी जी की अहिंसा इन वीरों को लील गयी देखिये-
ीझूठ के बल पर प्रचार तंत्र असहयोग (वह भी शांतिपूर्ण) आंदोलन के प्रणेता भारत में गांधीजी रहे हैं।
ीहमें जो स्वतंत्रता मिली उसे केवल गांधीजी की अहिंसा के बल से ही प्राप्त किया गया है।
इन दो झूठों के महिमामंडन में ‘कूका आंदोलन’ को आज तक इतिहास में उचित स्थान नही मिल पाया है। यह लज्जास्पद स्थिति है जिस पर हमें आज पुनर्विचार करना चाहिए। किसी एक व्यक्ति को सिर पर चढ़ाने के लिए इतना आतंकवादी दृष्टिकोण हमें नहीं अपनाना चाहिए कि किसी के उचित स्थान को ही उससे छीन लिया जाए। वास्तव में यह नीति तो आत्महत्या की नीति है। यदि किसी के उचित स्थान को हम इस प्रकार छीनने के कार्य करते रहेंगे तो राष्ट्र में उचित स्थान बनाने वाले लोग उत्पन्न कैसे होंगे?

सदगुरू रामसिंह ने प्रारंभ किया असहयोग आंदोलन
गांधीजी ने जिन उपायों के जैसे विदेशी वस्त्रों की होली जलाना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना, स्वदेशी पर जोर देना, अंग्रेजों के प्रति असहयोग करना आदि प्रयोग भारतीय राजनीति में किए, उन सारे प्रयोगों को पूर्व में ही गुरू रामसिंह जी के द्वारा परीक्षित कर लिया गया था। वास्तव में असहयोग आंदोलन का पाठ तो उन्हें गुरू रामसिंह जी के उल्लेखनीय स्मरणीय और अनुकरणीय कृत्यों से ही मिला।
इन उल्लेखनीय, स्मरणीय और अनुकरणीय कृत्यों की ईंटों से जो गांधीवाद का भवन तैयार किया गया, वह कितना खोखला है? यह स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है।

गांधीजी और लोकतंत्र 
गांधीजी को लोकतंत्र का प्रबल समर्थक भी कहा जाता है। उनके चहेते शिष्य जवाहरलाल ने इस बात का बहुत बढ़-चढक़र प्रचार किया। जबकि उस समय की परिस्थिति गत साक्ष्य यह सिद्घ कर रहे हैं कि गांधीजी का लोकतंत्र में नही अपितु अधिनायकवाद में दृढ़ विश्वास था। अब संक्षिप्त चर्चा इस पर करते हैं। भारतीय समाज में ऐसे व्यक्ति को बुद्घिमान माना जाता है जो देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार उचित निर्णय लेने में सक्षम और समर्थ होता है तथा अपने कार्य को निकालने में सफल होता है। गांधीजी भारतीय  समाज व संस्कृति के इस तात्विक सिद्घांत को पलट देना चाहते थे। वे यह मानने को भी तैयार नहीं थे कि आपत्तिकाल में कोई मर्यादा नही होती। इसका एक उदाहरण देखें। जिस समय कश्मीर में मुस्लिम आक्रांता हमारी बहन-बेटियों के साथ पाशविक व्यवहार करते हुए उनका शीलभंग कर रहे थे तो एक प्रश्नकर्ता ने गांधीजी से 5 नवंबर सन 1947 ई. को एक प्रश्न पूछा कि-‘कश्मीर में आक्रांताओं का अहिंसक प्रतिकार कैसे किया जा सकता है?’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए गांधीजी ने कहा-”जिन लोगों पर आक्रमण हुआ है उन्हें सैनिक सहायता न दी जाए। जो आक्रमित हैं, वे आक्रमणकारियोंं का प्रतिरोध न करें, क्रोध रहित, द्वेष रहित हृदय से आक्रांताओं का सामना करते हुए उनके शस्त्रों पर बलि चढ़ जाएं। शस्त्र प्रयोग न करें। मुक्के थप्पड़ों से भी अत्याचारी पर प्रहार न करें। तब उनके ‘अहिंसात्मक आंदेालन’ की सुगंध सारे संसार में फैल जाएगी।”
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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