अवधूत दत्तात्रेय हर क्षण किसी से ज्ञान प्राप्त करने के लिए तत्पर रहा करते थे। वह पशु-पक्षियों एवं कीट पतंगों की गतिविधियों को बड़े ध्यान से देखा करते और विवेचना कर उनसे शिक्षा प्राप्त किया करते थे। दत्तात्रेय अक्सर कहा करते थे कि ”जिनसे मैं कोई भी शिक्षा लेता हूं वे मेरे गुरू हैं।”
एक दिन वे वन जा रहे थे रास्ते में एक वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान का स्मरण करने लगे। अचानक उनकी दृष्टि आकाश की ओर गयी। उन्होंने देखा कि एक पक्षी आगे-आगे उड़ा जा रहा है और एक दर्जन पक्षी उसका पीछा कर रहे हैं। पीछा करने वाले पक्षी आगे के पक्षी से अलग नस्ल के हैं। दत्तात्रेय ने ध्यान से देखा कि आगे वाले पक्षी की चोंच में रोटी का टुकड़ा है और उसे छीनने के लिए ही सभी पक्षी उसका पीछा कर रहे हैं, इस क्रम में कुछ पक्षी चोंच मारकर उसे घायल कर रहे हैं। पक्षियों के आक्रमण से लहूलुहान हुए उस पक्षी ने अचानक चोंच से रोटी का टुकड़ा गिरा दिया। पीछा कर रहे किसी अन्य पक्षी ने उस टुकड़े को लपक लिया। अब अन्य पक्षी उसे घेरकर चोंच मारने लगे। पहले वाला पक्षी चोंचों के प्रहार से लहूलुहान हुआ नीचे उतरकर एक वृक्ष पर बैठ गया।
दत्तात्रेय ने हाथ जोडक़र उसे संकेत करते हुए कहा-”हे पक्षी, आज तू भी मेरा गुरू हुआ। मैंने तुझसे यह सीखा है कि संसार में जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए अधिक लोग अधिकार जताते हों, उसे छोड़ देना चाहिए।”
हमारे द्वारा इस प्रसंग को यहां लाने का उद्देश्य मात्र इतना है कि कांग्रेस के नेता पद की रोटी के टुकड़े को राहुल गांधी लेकर उड़ रहे हैं, और उन्हें देश के करोड़ों लोग अपात्र मानकर चोंच (व्यंग्यबाण) मार रहे हैं कि यह व्यक्ति इसपद के लिए योग्यता नहीं रखता। इतना ही नहीं उनकी अपनी पार्टी के भी अधिकांश (99 प्रतिशत) लोग उन्हें कांग्रेस के नेता पद के योग्य नहीं समझते, अब तो उनकी मां को भी संदेह होने लगा है। सोनिया अपना पद इसीलिए नहीं छोड़ रहीं हैं कि उन्हें राहुल की अपरिपक्वता रास नहीं आ रही है। ऐसे में राहुल को बिना समय गंवाये ‘रोटी का टुकड़ा’ (अपनी उपाध्यक्षता और कांग्रेस के नेता पद की दावेदारी) छोड़ देनी चाहिए। नीति और समझादारी के इस तकाजे को राहुल जितना शीघ्र समझ लेंगे यह उतना ही उनके लिए हितकर रहेगा।
हम बार-बार यह लिखते रहे हैं कि राहुल गांधी ही होंगे जो कांग्रेस मुक्त भारत बनाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। अत: कांग्रेस को यथाशीघ्र राहुल मुक्त होना होगा। कांग्रेस को ध्यान रखना होगा-
”बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा”
इस समय कांग्रेस की स्थिति बड़ी दयनीय है। यद्यपि इसे नष्ट करने के लिए राहुल (‘आउल’ नहीं) ही काफी हंै, परंतु इस समय कांग्रेस की हर शाख पर ‘मणिशंकर अय्यर’ व ‘दिग्गी राजा’ जैसे लोग भी बैठे हैं जो कि बौद्घिक स्तर पर राहुल गांधी के समकक्ष ही हैं। इन लोगों का बौद्घिक दीवाला निकल चुका है और इनके लिए इस समय कुर्सी प्राप्ति ही सबसे बड़ा लक्ष्य है। यद्यपि ‘कुर्सी प्राप्ति’ कांग्रेस का पुराना संस्कार है। इसके लिए इस पार्टी ने देशभक्ति और मर्यादा की हर सीमा को लांघने में देरी नहीं की है। 3 जून 1947 को इस पार्टी ने देश का बंटवारा भी इसीलिए स्वीकार कर लिया था कि उस बंटवारे की कीमत के रूप में कुर्सी इसे मिलने जा रही थी। उसी संस्कारबीज से राहुल गांधी का निर्माण हुआ है। जिन्होंने अभी हाल ही में चीन के राजदूत से हाथ मिलाना उचित समझा है। श्री गांधी ने ऐसा ‘कृत्य’ तब किया है-जब सारा देश चीन के विरूद्घ उबल रहा है, और चीन हमारे सैनिकों के प्राण लेने की हर संभव चेष्टा कर रहा है। चीन इस समय सिक्किम को हड़पने की तैयारी में है और वह इसके लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। ऐसे में देश का हर नागरिक चीन के प्रति क्रोध में है। लोगों ने चीनी माल का बहिष्कार करना आरंभ कर दिया है, जिससे चीन के प्रति लोग अपने क्रोध को प्रकट कर रहे हैं। ऐसे में सत्ता प्राप्ति को अपना लक्ष्य मानकर चलने वाली कांग्रेस के संस्कारबीज से निर्मित राहुल गांधी चीन के राजदूत से मिल रहे हैं और इस प्रकार के मिलने से वह मोदी को केन्द्रीय सत्ता से हटाने करने के सपने बुन रहे हैं। लगता है कि वह कांग्रेस के लिए तो अभिशाप हैं ही, देश के लिए भी बनने जा रहे हैं। माना जा सकता है कि राहुल गांधी से चीन के राजदूत की हुई भेंट केवल शिष्टाचार की भेंट थी-जैसा कि कांग्रेस ने कहा भी है। पर बड़ा प्रश्न ये है कि इस भेंट को एक बार छिपाना और फिर स्वीकार करने का जो क्रम कांग्रेस की ओर से चला वह क्यों चला? जब सब कुछ ठीक ही था, तो पहली बार में ही भेंट करने की बात स्वीकार कर लेनी चाहिए थी। यदि मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान में बैठकर मोदी को चलता कर देश की सत्ता कांग्रेस को दिलाने में पाकिस्तान की सहायता लेने की बात को कह सकते हैं तो राहुल इस कार्य को चीन की सहायता से पूरा करने की तैयारी में तो नहीं हैं? यदि ऐसा है तो इससे निम्नस्तर की राजनीति और कोई हो ही नहीं सकती। रविदास जी ने क्या उत्तम बात कही है-
रविदास जन्म के कारनै, होत न कोऊ नीच।
नर को नीच करि डारि है, ओछे करम की नींच।।
राहुल जी! संभलो, अन्यथा इतिहास तुम्हें दंडित करेगा, और यदि उसने तुमको ‘ओछे करम की कीच’ में सना घोषित कर दिया तो फिर पीढिय़ां भी तुम्हारा नाम लेने से वैसे ही शरमाएंगी जैसे आज ‘जयचंद’ के वंशज जीवित होकर भी अपने आपको ‘जयचंदी वंश’ का बताने में संकोच करते हैं या बताते ही नहीं हैं। देश का अहित बहुत हो चुका, अब देश हित में सोचो। राजनीति नहीं राष्ट्रनीति का पाठ पढ़ो। कल्याणमस्तु।

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