भारत में मानवाधिकार आयोग, भाग-3
हमारा मानना है कि शूद्र अछूत तब नहीं बना कि जब उसके अधिकार छीन लिये गये, अपितु वह अछूत तब बना जब अधिकार छीनने वाला वर्ग कत्र्तव्यच्युत हो गया। उस वर्ग का कत्र्तव्य शूद्र के अधिकारों का संरक्षण था न कि उनका भक्षण या हनन।
यदि वह अपने कत्र्तव्य के प्रति जागरूक होता या रहता तो शूद्र की अछूत बनने की स्थिति कभी नहीं आती। आज भी आप देख लें ही अधिकारी कर्मचारी का और कर्मचारी अपने अधीनस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का शोषण कर रहे हैं। एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी अधिकारी के साथ उसका सामान लिये खड़ा रहता है। सायं पांच बजे के पश्चात भी एक अधिकारी के साथ अनमने मन से घूमते रहना उसकी विवशता है। उसके पश्चात अधिकारी गाड़ी में से उतरकर घर में घुस जाता है, जबकि उस कर्मचारी को रात इधर-उधर व्यतीत करनी पड़ती है। आधुनिक समाज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के साथ अर्थात आधुनिक शूद्र के साथ यह भी एक अन्याय है, जिसे एक शूद्र या दलित अधिकारी भी अपने अधीनस्थ कर्मचारी के साथ करता है, और अपना अधिकार समझकर करता है।
यहां पर विचारणीय बात यह है कि यदि अधिकारी कत्र्तव्यवादी होता तो उसके द्वारा अपने कर्मचारी के अधिकार के हनन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिए आवश्यकता अधिकार छीनने वाले को कत्र्तव्यवादी बनाने की है न कि व्यक्ति को अधिकारवादी बनाकर उच्छ्रंखल बनाने की। यदि अधिकार छीनने वाला वर्ग अपने कत्र्तव्य को पहचाने लगता तो समाज में अधिकारों के लिए मारामारी का वर्तमान संघर्ष न आता। अब भी यदि हमारी सरकारें सभ्य मानव समाज का निर्माण करना चाहती है तो उन्हें चाहिए कि देश में एक ‘मानव कत्र्तव्य आयोग’ का भी गठन करे।
यह मानव कत्र्तव्य आयोग मनुष्य को मर्यादा का, नीति का और कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाये, उन्हें समझाये कि दूसरे के प्रति अपने कत्र्तव्य का पालन करने में ही अधिकार का रक्षण निहित है। आप देखेंगे कि यदि मानव, मानवता की मर्यादा में आ गया, कत्र्तव्यवाद के पथ पर आ गया तो-
यहां नारी शोषण नहीं रहेगा।
नारी, नारी के प्रति (भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार के विषय में) क्रूर नहीं रहेगी।
बंधुआ मजदूरी की समस्या यहां नहीं रहेगी।
बाल अपराध समाप्त हो जाएंगे।
सभी लोग अपने कत्र्तव्य के प्रति समर्पित होकर राष्ट्र सेवा और जनसेवा को अपना लक्ष्य बना लेंगे।
विधि व्यवस्था की चरमराती स्थिति स्वयं ही ठीक हो जाएगी।
आतंकवाद अतीत की घटना होकर इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा। आदि।
यह आदर्श व्यवस्था मानवाधिकार आयोग की स्थापना से न तो आ रही है और न आ पाएगी। विशेषत: उस मानवाधिकार आयोग के रहते हुए जो अपराध घटित होने के पश्चात सक्रिय होता है। बलात्कार हो गया तब मानवाधिकार आयोग सक्रिय होता है, बलात्कार हो गया तो बलात्कारी को सजा देना न्यायालय का कार्य है। यह मानवाधिकार आयोग का कार्यक्षेत्र नहीं है। मानवाधिकार आयोग का कार्य किसी अपराधी को कानून के शिकंजे तक पहुंचाना भी नहीं है, यह कार्य पुलिस का है। पुलिस विभाग की शिथिलता को जनसामान्य के सामने प्रकट करना उसका एक समाज सेवा का कार्य हो सकता है, उसका क्षेत्राधिकार कदापि नहीं हो सकता।
उसका क्षेत्राधिकार तो केवल एक ही है कि वह मानव के अधिकारों की इस प्रकार संरक्षा करे जिससे मानव के चरित्र का नैतिक पक्ष इतना सुदृढ़ हो जाए कि किसी भी मानव के मौलिक अधिकारों को वह छीनने या उनका शोषण करने का विचार तक भी न करे। दुर्भाग्य से हमारा शासक वर्ग स्वतंत्रता के पश्चात के वर्षों में इस दिशा में कुछ भी नहीं कर पाया है, जो किया गया है वह विपरीत दिशा में ही किया गया है। फलस्वरूप देश में नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन और शोषण पूर्व के सभी कालों की अपेक्षा अब अधिक हो रहा है। भारत के अतीत के गौरवमयी इतिहास पृष्ठों से हमारे नेतृत्व को शिक्षा लेनी चाहिए। इसी में राष्ट्र का भला है। इसी बात को ‘स्वातंत्रय वीर सावरकर’ ने राजनीति का हिंदूकरण कहा है।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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