गुरूकुलों की परीक्षा प्रणाली

हमारे यहां प्राचीनकाल में गुरूकुलों में विभिन्न परीक्षाओं की व्यवस्था की जाती थी। उन परीक्षाओं को आजकल की अंक प्रदान करने वाली परीक्षाओं की भांति आयोजित नहीं किया जाता था। उसका ढंग आज से सर्वथा विपरीत था। तब आचार्य अपने विद्यार्थियों की परीक्षा के लिए कई प्रकार के ढंग अपनाते थे। उस प्रकार की परीक्षा प्रणाली में इस बात का ध्यान रखा जाता था कि विद्यार्थी की परीक्षा भी हो जाए और उस पर परीक्षा कोई बोझ भी न बने। आचार्य का प्रयास होता था कि विद्यार्थियों की प्रतिभा को निखारने में वह अपनी पूर्ण प्रतिभा को लगा दे और वे किसी भी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त करने में या विषय की गहराई तक जाने में कहीं से भी कमजोर न रह जाएं।
हमारे आचार्य या ऋषि लोग किसी ज्ञान को देने में कई बार अपने शिष्य पर यह अनिवार्य शर्त लगा देते थे कि यह ज्ञान मैं तुमको दे तो सकता हूं, परंतु आपको इस मनोवांछित ज्ञान की प्राप्ति के लिए दस वर्ष तक या उससे भी अधिक तक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए या गौ चराते हुए कठोर साधना का परिचय देना होगा।
 कैसी परीक्षा है? परीक्षा की भी परीक्षा हो रही है और परीक्षा के लिए ली गयी इस परीक्षा में सफल विद्यार्थी को फिर अगला ज्ञान दिया जा रहा है। उपनिषदों में ऐसी अनेकों कहानियां हैं-जब किसी आचार्य ने या ऋषि ने किसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए आये ब्रह्मचारियों को अपनी ऐसी शर्त को पूरा करने का आदेश दिया। उधर हमारे विद्यार्थियों को भी देखिये कि उनके भीतर भी कितना भारी धैर्य है कि वे आचार्य की बात को शिरोधार्य कर वैसा ही आचरण करते हैं-जैसा उन्हें बताया जाता है। इस परीक्षा प्रणाली से ज्ञान अपात्र व्यक्ति या शिष्य के हाथों में नहीं जाता था और साधनाशील व्यक्ति को ही मिल पाता था। जिससे ज्ञान लोक का अशुभ नहीं कर पाता था। जबकि आज तो डिग्रियां खरीदी जा रही हैं, अर्थात ज्ञान खरीदा जा रहा है, बेचा जा रहा है और अपात्र लोग डिग्रियां लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट कर रहे हैं, नकली खाद बना रहे हैं, मनुष्य को मिटाने के लिए हथियार बना रहे हैं, आतंकी पैदा कर रहे हैं। उनका ज्ञान संसार का अशुभ कर रहा है, और इसका कारण केवल यही है कि उन्होंने ज्ञान प्राप्त नहीं किया है-अपितु उसे चोरी से खरीद लिया है।
जब ज्ञान अपात्र को बेच दिया जाता है तो ऐसा ही होता है। संसार को पाकिस्तान के परमाणु बम के जनक के विषय में पता चल गया है कि उसने भी परमाणु ज्ञान प्राप्त करने की साधना न करके उसे चुराया तो चोरी के उस ज्ञान में कोई साधना न होने के कारण पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम संसार के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। अत: संसार को आज यह समझना चाहिए कि भारत के ऋषि लोग ज्ञान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले जिज्ञासुओं की परीक्षा से भी पूर्व परीक्षा क्यों लेते थे और क्यों उससे साधना कराते थे? यदि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का जनक भारत के ऋषियों के पास गया होता तो उसे अपात्र मानकर प्रथम तो यह शिक्षा दी ही नहीं जाती और यदि दी भी जाती तो पहले उसे कठोर साधना का निर्देश दिया जाता।
संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी
हमारे देश की भाषा संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। इस भाषा की वैज्ञानिकता को आज के संसार के सभी विद्वानों ने और भाषा विज्ञानियों ने स्वीकार किया है। यही कारण है कि हमारे गुरूकुलों में प्राचीन काल में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा संस्कृत या हिंदी ही रखी जाती थी। इस भाषा का एक-एक अक्षर अपने आप में वैज्ञानिक और वैयाकरणिक आधार लिये हुए हैं। यही कारण है कि संसार के विभिन्न देशों के विभिन्न विद्वानों ने हमारी वैज्ञानिक भाषा संस्कृत की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने यह कार्य संस्कृत का गहन अध्ययन करने के पश्चात ही किया है।
प्रो. बोप कहते हैं-”संस्कृत ग्रीक एवं लैटिन दोनों की अपेक्षा पूर्ण, विपुल एवं उत्कृष्ट व परिष्कृत भाषा है।”
सर विलियम जोंस का कहना है कि-”देवनागरी पुरानी नागरी अर्थात ब्राह्मी भाषा ही पश्चिमी एशिया की वर्णमाला का स्रोत है। इससे न केवल संस्कृत भाषा एवं साहित्य की प्राचीनता प्रकट होती है अपितु इससे उस धारा का भी पता चलता है-जिसके द्वारा संस्कृत का दर्शन एवं ज्ञान पश्चिम की ओर बहा। इससे वहां नये विषयों की भी प्राप्ति हुई। जिसकी रचना होमर, हियोड पायथागोरस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, जेनो, सिसरो आदि ने की और इन्होंने व्यास, कपिल गौतम, पतंजलि, कणाद, जैमिनी, नारद, पाणिनी, मरीचि एवं वाल्मीकि के साथ मिलकर इसके साहित्य के सम्मान को बांटा। भाषा शास्त्र के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि संस्कृत भाषा समस्त इण्डोयूरोपियन भाषाओं की जननी है। संस्कृत से ही वे मूल धातु और आवश्यक शब्द लिये गये जो इन समस्त भाषाओं का आधार हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि वे अंश जो इन सब भाषाओं में समान रूप से पाये जाते हैं, संस्कृत भाषा की ही देन है।”
संस्कृत को विश्व में आज भी इतने सम्मान भाव से इसीलिए देखा जाता है कि वह विश्व की समस्त भाषाओं की जननी है। हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि सारे विश्व की भाषाओं की मां हमारी संस्कृत है, और सारे संसार के देशों का पिता हमारा देश है। सारे देशों के धर्म का स्र्रोत हमारा धर्म है और सारे संसार की संस्कृतियों की आधार हमारी संस्कृति है। इतना होना ही हमें विश्वगुरू बनाने का पर्याप्त प्रमाण है। अत: विदेशों की ओर देखने के स्थान पर हमें अपने आपको ही देखने की प्रवृत्ति अपनानी होगी।
संस्कृत जैसी संपन्न भाषा रखते हुए भी भारत दूसरे देशों की भाषाओं का सम्मान करने में किसी प्रकार की हिचक नहीं रखता था। ज्ञान वृद्घ ही दूसरे के ज्ञान का सम्मान करना जानता है। इसीलिए भारत की शिक्षा प्रणाली की एक विशेषता यह भी रही है कि हमने विदेशी भाषाओं का सम्मान किया और उनका ज्ञान प्राप्त करने में भी कोई संकोच नहीं किया। भारत की ओर से ज्ञान की कभी उपेक्षा नहीं की गयी। उसने ज्ञान को उसके सभी स्वरूपों में प्रवाहित होने दिया और उससे जितना लाभ वह उठा सकता था उतना उठाया।
वेद का भी यह आदेश है कि देश में विभिन्न भाषा-भाषी और विभिन्न मतों व संप्रदायों वाले लोग रहते हैं, हमें उन सबके साथ समन्वय बनाकर चलना चाहिए। वेद का यह आदेश भारतीय समाज और राजनीति का मौलिक संस्कार बन गया और इसे लोगों ने अंगीकार कर अपने आचरण में अपना लिया। फलस्वरूप भारतीय समाज में लोग एक दूसरे का स्वाभाविक रूप से सम्मान करते आये हैं। भाषा और संप्रदाय कभी भारतीय लोगों के आड़े नहीं आया। जिन लोगों ने भारत की इस परम्परागत जीवनशैली को मिटाकर अपनी विचारधारा भारत पर थोपकर भारत के समाज में दूध में नींबू रस निचोडक़र इस व्यवस्था को नष्ट करने का प्रयास किया, भारत का उन लोगों से अवश्य संघर्ष रहा है।
एक मत और राष्ट्रीय एकता की स्थापना करना
भारत में एक मत और राष्ट्रीय एकता की स्थापना करना भी भारतीय शिक्षा पद्घति की विशेषता रही है। भारत के किसी भी संत ने या किसी ऋषि या महात्मा ने या किसी भी सम्राट ने या राजा ने कभी भी राष्ट्रविखण्डन को प्रोत्साहित करने वाली शिक्षा अपने लोगों को नहीं दी। किसी भी धर्मग्रंथ में राष्ट्र के विभाजन का एक भी निर्देश नहीं है।
क्रमश:

Comment:

betnano giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
betasus giriş
betnano giriş
betnano giriş
betamiral giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betkare giriş
noktabet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
galabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betasus giriş
betplay giriş
betplay giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betasus giriş
betkare giriş
betkare giriş
noktabet giriş
restbet güncel
imajbet giriş
imajbet güncel giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betnano giriş