मृत्यु के समय जीवात्मा की स्थिति व गतिः*-पार्ट-1

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डॉ डी के गर्ग

बाबा रामदेव ने इंडिया टीवी पर कहा की मृत्यु के बाद कुछ समय जीवात्मा उस परिवार के इर्द गिर्द घूमती रहती है। इस विषय पर मैंने वैदिक विद्वानों से वार्ता की और स्वाध्याय किया तो मालूम हुआ की बाबा रामदेव का कथन पूरी तरह से गलत है और सत्य सामने लाना चाहिए।

साभार:जन्म ,मृत्यु ,पुनर्जन्म और कर्मफल रहस्य -लेखक डॉ डी के गर्ग

स्वामी विवेकानंद परिव्राचक -“वैदिक ऋषियों का सिद्धांत यह है कि मरने के बाद आत्मा बेहोश हो जाता है।
सांख्य दर्शन अध्याय 5, सूत्र 125.और उस बेहोश आत्मा को ईश्वर अपने अधिकार में कर लेता है। इसलिए बेहोश आत्मा कुछ भी नहीं जानता। न वह चल फिर सकता है, न उसे कोई ज्ञान होता है। इसलिए यह बात ऋषियों के अनुकूल नहीं है।”

विश्लेषण विस्तार से : जब मृत्यु होती है तो आत्मा स्वेच्छा से नहीं निकलती अपितु एक अदृश्य सत्ता, वह सत्ता सर्वव्यापक ईश्वर होती है, उसकी प्रेरणा व बल से बाहर निकलती है। आत्मा के साथ हमारे प्राण आदि जो सूक्ष्मशरीर का भाग होते हैं, वह भी शरीर से पृथक् हो जाते हैं।
इस विषय में तरह-तरह की किंवदंतिया सुनने को मिलती है कोई कहता है कि मरने के बाद कुछ दिन तक आत्मा परिवारजनों के साथ व आसपास ही रहती है। श्मशान में मृतक शरीर के साथ उसकी आत्मा अन्तिम संस्कार को भी देखती है। अन्त्येष्टि हो जाने पर वह अत्यन्त दुःखी होकर वहां से चली जाती है। कोई कहता है कि मृत्यु होने पर मृतक की आत्मा शरीर के बाहर उसके आसपास इर्द-गिर्द मण्डराती रहती है। उनका तर्क है कि आत्मा का अपने शरीर से मोह व लगाव होता है जिससे वह उसके निकट ही रहती है। मृतक के परिवारजनों को रोना नहीं चाहिये इससे मृतक आत्मा को दुःख होता है। पुनर्जन्म पर ध्यान देने से मृत्यु का भय छूट जाता है। ये मत सोचिये कि मै मर रहा हूँ, ये सोचे कि मै दूसरा जन्म ले रहा हूँ।
चार चीजों से मनुष्य बहुत डरता है ‘गरीबी‘ से, ‘बीमारी‘ से, ‘बुढ़ापे‘ से, तथा ‘मृत्यु‘ से। लेकिन सम्पन्नता से भी व्यक्ति डरता है। जब बहुत सम्पत्ति आ जाती है तो मनुष्य डरने लगता है। अमेरिका के लोग मृत्यु से बहुत डरते है। मोहम्मद गौरी ने बहुत लूटपाट से हीरे जवाहरात मोती इकट्ठे किये। मरते समय उसने सोचा हाय! मेरी सम्पत्ती का क्या होगा? उसने सारी सम्पत्ती एक मैदान में सजाने का हुक्म दिया कि मैं इस सम्पत्ती को देखते हुए मरना चाहता हूँ। सिकन्दर जीवन भर लूटता रहा आदेश देता है कि मरने के बाद मेरे दोनो हाथ कफन से बाहर निकाल देना ताकि संसार को पता लगे खाली आए थे खाली जाना है।
इस विषय में हम सभी बिंदुओं पर एक-एक करके चर्चा करेंगे ।
प्रश्न1 :श्मशान में मृतक शरीर के साथ उसकी आत्मा अन्तिम संस्कार को भी देखती है?
मृतक का आत्मा शरीर से पृथक् होने पर न तो स्वयं के पूर्व शरीर को और न अन्य वस्तुओं को देख सकता है। वह अन्य इन्द्रियों के कार्य भी नहीं कर सकता, अर्थात देख, सुन, सूंघ, स्पर्श आदि नहीं कर सकता। इस विषय में हमारा प्रश्न है कि जीवित अवस्था में जब हम आंखें बन्द कर लेते हैं तब हमारी आंखे आसपास की किसी भी वस्तु को देख नहीं पाती। देखने का काम हम आंखों से करते हैं। आत्मा आंखों से ही देखती है और आंखें बन्द हों तो देख नहीं सकती। आंखें देखने के उपकरण हैं। बिना उपकरण के उपकरण का कार्य नहीं कर सकते अर्थात्् अन्धा व्यक्ति देखने की तीव्र इच्छा रखते हुए भी देख नहीं सकता। जब मृत्यु होती है तो आत्मा स्वेच्छा से नहीं निकलती अपितु एक अदृश्य सत्ता, वह सत्ता सर्वव्यापक ईश्वर होती है, उसकी प्रेरणा व बल से बाहर निकलती है। आत्मा के साथ हमारे प्राण आदि जो सूक्ष्मशरीर का भाग होते हैं, वह भी शरीर से पृथक् हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में जो आत्मा शरीर में रहकर भी देख नहीं सकती थी, उसके लिए अपने शरीर और वहां उपस्थित परिवारजनों को देखना और शरीर की शवयात्रा में श्मशान तक जाना और वहां उपस्थित लोगों को देखना यदि सम्भव है तो वह कैसे सम्भव है?
पपण् मरने के बाद कुछ दिन तक आत्मा परिवारजनों के साथ व आसपास ही रहती है?
प्रश्न -२-आत्मा कुछ समय या एक-दो दिनों तक अथवा दाहसंस्कार होने तक शरीर के आसपास व चारों ओर मण्डराती रहती है या घूमती रहती है
यह बात भी हमें अज्ञान व अविवेकपूर्ण प्रतीत होती है। महर्षि दयानन्द ने शरीर त्याग के बाद जीवात्मा की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा है कि शरीर से निकलकर जीवात्मा सूक्ष्मशरीर सहित जीवात्मा का जहां जन्म होना होता है, ईश्वर की प्रेरणा से जीवन वहां जाकर पहले पिता के शरीर में प्रवेश करता है और गर्भाधान की क्रिया में पिता के शरीर से माता के गर्भ में जाकर और ईश्वर द्वारा नियत समय पर जन्म लेकर संसार में आता है।
मृत्यु होने पर जिन आत्माओं के लिए शोक किया जाता है वह तो अपने कर्मानुसार दूसरे स्थानों पर जाकर जन्म प्राप्त कर लेती हैं। पूर्व जन्म की बातों को भूल चुकी होती हैं। अतः शोक करना उचित नहीं है। मृतक के लिए शोक न कर ईश्वर की व्यवस्था को समझना व विचार करना चाहिये।
प्रश्न-3मृत्यु के समय क्या होता है?
जैसे ही मृत्यु का समय आता है वैसे ही चाहे मृत्यु किसी कारण से हो रही हो मृत्यु का समय आते ही पाँचो ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँचों कर्मेन्द्रियाँ, पाँचो प्राण, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार, सब के सब सूक्ष्मरूप में आत्मा के पास उसके साथ जाने के लिए एकत्रित हो जाते है। यह सब कुछ एक क्षण में, क्षण के एक छोटे से भाग में होता है। इसी प्रकार दूसरे स्थान पर इस ‘आत्मा’ के स्वागत की तैयारी भी होने लगती है। इधर जाने की तैयारियाँ हो रही है उधर स्वागत की तैयारियाँ होने लगती हैं। परन्तु आगे कहाँ जाना है इसका निर्णय आत्मा के कर्म करते हैं। इन्हीं कर्मो के अनुसार यह भी निर्णय होता है कि अपने सूक्ष्मशरीर के साथ यह आत्मा स्थूलशरीर के किस मार्ग से बाहर जायेगा?
मृत्यु के समय मनुष्य के हृदय का अग्रभाग प्रकाशित होने लगता है और वह भी उसी प्रकाश के साथ शरीर से निकलता है। निकलने के मार्गो का भेद उसकी अन्तिम गतियों के अनुकूलन होता है। इस प्रकार पुण्य और पाप कर्म दोनों के वशीभूत जीव एक शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीर को ग्रहण कर लेता है। दूसरे शरीर ग्रहण का क्रम यह होता है कि जीव रज-वीर्य के साथ माता के शरीर में प्रविष्ट होकर गर्भ का आदिम रूप ग्रहण करता है और जीव की उपस्थिति के कारण गर्भ बुद्धि को प्राप्त होता रहता है और पूर्णता को प्राप्त होकर नवजात शिशु के रूप की धारण कर लिया करता है, क्योंकि भीतर से वही वस्तु बढ़ा करती है जिसमें जीव हुआ करता है।
४ जीव का मरणासन्न अनुभव-
1ः मृत्युभय
योगदर्शन (2/9) का कथन है:
‘‘स्वरसवाहि विदुषोेऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः‘‘
अर्थात मृत्यु का भय (अभिनिवेश) विद्वानों एवं निरक्षरों में ,समान रूप में पाया जाता है। विद्वान चाहे आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी मानते हैं और यह भी जानते हैं कि मृत्यु उसका अन्त नहीं है। यह मृत्यु केवल नये शरीर धारण करने के लिये है, फिर भी मृत्यु के भय से वे भी कांपने लगते हैं।
2ः प्राणान्त समारोह /देहावसानः
जीव के शरीर से निष्क्रमण के समय को बृहदारण्यक उपनिषद् (4/3/38) ने राजा के प्रस्थान समय विदाई समारोह की उपमा से समझाया हैः
तद्यथा राजानं प्रयियासन्तं उग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्यः अभिसमायन्ति
एवं एव इमं आत्मानं अन्तकाले सर्वे प्राणाः।
अभिसमायन्ति यत्र एतद् उर्ध्वोच्छ्वासी भवति।।
अर्थात – जैसे जब राजा वापस जाने लगता है, राजकर्मचारी, अधिकारीगण, ग्राम के मुखिया आदि, सब ओर से आकर उसे घेर लेते हैं, वैसे ही मृत्यु के समय सभी प्राण और इन्द्रियाँ आत्मा के समीप आ जाते हैं अर्थात्् अपना कार्य बन्द कर देते हैं और मरणासन्न व्यक्ति ऊध्र्व (ऊँचे) श्वास लेने लगता है।
आगे (4/4/1) कहा गया है-
‘स एताः तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेव अनु अवक्रामति’
अर्थात वह (आत्मा) इन प्राण एवं इन्द्रियों के तेज व शक्ति को समेटता हुआ अपने निवास स्थान हृदय में चला जाता है। सभी प्राण एवं इन्द्रियों से एकीभूत हुआ प्राणी न देखता है, न सुनता है, न बोलता है, न सूंघता है, न स्वाद को जान पाता है, न ही स्पर्श करने पर प्रतिक्रिया करता है। मरणासन्न प्राणी मूच्र्छित-सा होता है, पर मूच्र्छित नहीं होता, प्रत्युत ज्ञानयुक्त होता है।
देहावसान के समय जीवात्मा अपने सूक्ष्मशरीर एवं प्राणों के साथ शरीर के नवद्वार में से किसी द्वार से निष्क्रमण करता है। मुक्त पुरुषों का जीवात्मा दशमद्वार अर्थात ब्रह्मरन्ध्र से निकलता है। इस विषय पर कठोपनिषद् (2/3/16) का कथन हैः
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यः तासां मूर्धानं अभिनिःसृतैका।
तया उर्ध्वं आयन् अमृतत्वमेति विष्वङ् अन्या उत्क्रमणे भवन्ति।।
अर्थात्् हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ है। उनमें से एक मूर्धा (सिर) की ओर निकल गई है। मृत्यु के समय उस नाड़ी (सुषुम्णा नाड़ी) से जो ऊपर को उत्क्रमण करता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। शेष अन्य नाड़ियाँ साधारण व्यक्तियों के उत्क्रमण (जीव का निष्क्रमण) के समय काम आती हैं। अर्थात्् ब्रह्मनिष्ठ व्यक्ति के प्राण मूर्धा से निकलते हैं, दूसरों के अन्य मार्ग से।
शरीर के नौ द्वार हैंः दो आंखें, दो कान, दो नासिकाऐं, एक मुख, मूत्रेंन्द्रिय और गुदा। सामान्य जनों के प्राण इन नौ में से किसी एक द्वार से निकलते हैं। कुछ के प्राण नासिका से निकलते हैं, कईयों के अन्य द्वारों से। अक्सर देखा जाता है कि मृत व्यक्ति की आंखें खुली होती हैं, या मुंह खुला होता है, या किसी के कान का पर्दा फटने से किंचित खून दिखाई देता है य किसी का मल-मूत्र निकल गया होता है। ये सब चिन्ह इंगित करते हैं कि आत्मा किस द्वार से निकली है। मल-मूत्र द्वार से आत्मा का निकलना कुकर्मो का परिचायक होता है, जैसे आत्मा का ब्रह्मरन्ध्र से निकलना मोक्ष का परिचायक है।
3ः जीवन झलकी
लोकोक्ति है, बुझने से पहले, दिया टिमटिमाता है। बृहदारण्यक उपनिषद् (4/4/2) में मृत्यु समय के चित्रण में कहा गया है- मृत्यु समय उस व्यक्ति के हृदय का अग्रभाग आत्मा की ज्योति से प्रकाशित हो जाता है। उस प्रकाश के साथ आत्मा चक्षु से, मूर्धा से, या शरीर के किसी अन्य प्रदेश से निष्क्रमण करता है। उसके निकलने के साथ-साथ प्राण पीछे-पीछे निकलते हैं, प्राण के निकलने के साथ-साथ इन्द्रियाँ पीछे-पीछे निकलती हैं। जीव मरते समय ‘सविज्ञान’ हो जाता है। अर्थात्् सारे जीवन की झलकी उसके सामने आ जाती है। यह ‘विज्ञान’ उसके साथ-साथ जाता है। ज्ञान, कर्म और पूर्व प्रज्ञा (पूर्व जन्मों की बुद्धि, वासना-स्मृति-संस्कार)-ये तीनों भी इसके साथ जाते हैं।
अर्थात् जब वह चेतनामय शक्ति आंख, नाक, जिह्वा, वाणी, श्रोत्र, मन और त्वचा आदि से निकलकर आत्मा में समाविष्ट हो जाती है, तो ऐसे मरने वाले व्यक्ति के पास बैठे हुए लोग कहते हैं कि अब वह यह नहीं देखता, नहीं सूंघता इत्यादि।
इस प्रकार इन समस्त शक्तियों को लेकर यह जीव हृदय में पहुंचता है और जब हृदय को छोड़ना चाहता है तो आत्मा की ज्योति से हृदय का अग्रभाग प्रकाशित हो उठता है। तब हृदय से भी उस ज्योति चेतना की शक्ति को लेकर, उसके साथ हृदय से निकल जाता है। निकलने के मार्गो का भेद उसकी अन्तिम गतियों के अनुकूलन होता है। इस प्रकार पुण्य और पाप कर्म दोनों के वशीभूत जीव एक शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीर को ग्रहण कर लेता है।
4. अन्त मति सो गतिः
यह एक प्रबल जन-अवधारणा है कि मृत्यु≤ जिस प्रकार की कामना होती है उसी प्रकार की गति होती है। यह जन अवधारणा उपनिषदों के वाक्यों पर आधारित है। प्रश्नोपनिषद् (3/10) का कथन है:
यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः।
सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति।।
अर्थात्् मृत्यु≤ प्राणी जैसी भावना से युक्त चित्तवाला होता है, उसी चित्त के साथ प्राण का आश्रय लेता है और प्राण उदानवृत्ति के साथ युक्त हुआ सूक्ष्मशरीर सहित आत्मा के साथ संकल्पित (वासनानुकूल) योनि को प्राप्त करता है।
प्रश्न किया जा सकता है कि जब मनुष्य सुन नहीं सकता, देख नहीं सकता, स्पर्श करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता, तो जीवन में घटित घटनाओं का स्मरण कैसे कर सकता है? देखने, सुनने आदि के लिए इन्द्रियों की आवश्यकता होती है और इन्द्रियों ने काम करना बन्द कर दिया है।
इसका उत्तर ये है कि जीव द्वारा किए गए सभी कर्म संस्कार रूप में सूक्ष्मशरीर में अंकित हो जाते है जो जन्म-जन्मान्तरों तक संचित रहते हैं। इसीलिए मरणासन्न जीव बिना इन्द्रियों की सहायता से इनकी अनुभूति कर सकता है।
वास्तविकता यह है कि जिस प्रकार के अच्छे या बुरे कर्म प्राणी अपने जीवन में करता आया है, उसी प्रकार के विचार, उस प्रकार की कामनाएँ, मृत्युकाल में उभरती हैं। अधिकांश लोग जीवन भर कुत्सित वासनाओं में फंसे रहते हैं। फलतः मृत्यु समय उन्हीं के विषय में बारबार सोचते हैं। केवल श्रेष्ठ जन और महान् आत्माओं के मन में मृत्यु समय शुभ विचार, शुभकामनाएँ उत्पन्न होती है अन्यों की नहीं।

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