भारत की लाचार संसदीय प्रणाली

नोटबंदी का फैसला हो, जीएसटी लागू करने की बात हो या फिर तीन तलाक का मामला, सब जगह संसद की अवहेलना की गई। कानून बनाने में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना करने तक सीमित है। वह न कोई कानून बनवा सकता है और न रुकवा सकता है। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती है, असल में गलत है। सच्चाई यह है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही लागू भी करती है। 
साल खत्म होते-होते मुस्लिम महिलाओं को दो उपहार देकर गया। केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पिछले हफ्ते बृहस्पतिवार को लोकसभा में तीन तलाक का बिल पेश किया, जिसे लोकसभा ने पास कर दिया है और शीघ्र ही इसके कानून बन जाने की आशा है। एक छोटे से गुट को छोड़ दें, तो देश भर ने अमूमन इस कदम का स्वागत किया है। आशा की जानी चाहिए कि तलाक-ए-बिद्दत नाम का यह अभिशाप अब भारत के मुस्लिम समाज से मिट जाएगा। मुस्लिम समाज में, विशेषकर हनाफी सुन्नी समाज में कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक विधि से ‘तलाक-तलाक-तलाक’ कहकर तलाक दे सकता था। तीन तलाक से आजादी दिलाने के बाद प्रधानमंत्री ने बीते रविवार मुस्लिम महिलाओं को एक और तोहफा दिया। मुस्लिम महिलाएं अब किसी पुरुष संरक्षक के बिना अकेले भी हज पर जा सकेंगी। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने कहा है कि हज पर अकेली जाने के लिए आवेदन करने वाली मुस्लिम महिलाओं को लॉटरी के ड्रॉ से भी छूट दी जाएगी। सरकार ने इसके लिए हज के नियमों में आवश्यक बदलाव कर दिया है।
ये दोनों कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि तीन तलाक का बिल मुस्लिम समाज के किसी वर्ग में पहले नहीं बांटा गया था। इसे आम जानकारी के लिए मीडिया को भी पहले नहीं दिया गया। इसके लिए विशेषज्ञों से राय नहीं ली गई और लोकसभा ने भी एक संक्षिप्त बहस के बाद बृहस्पतिवार को ही इसे पास भी कर दिया। संसदीय प्रणाली में संसद की सर्वोच्चता की अवधारणा मान्य है। देश में शासन चलाने के लिए संसद कानून बनाती है, उनमें संशोधन कर सकती है या किसी कानून को पूरी तरह से निरस्त कर सकती है। हमारी सरकार सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी है और यदि सरकार संसद का विश्वास खो दे, तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है। पार्टियां अपने-अपने सांसदों को व्हिप जारी करके पार्टी की नीति के अनुसार वोट देने का निर्देश देती हैं, जिनका पालन अनिवार्य है। सरकार को संसद में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े, इसके लिए सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन भी अपने सांसदों को व्हिप जारी करता है और सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन से जुड़े सांसद हर सरकारी बिल के पक्ष में वोट देने के लिए विवश होते हैं, ताकि बिल और सरकार गिरने की नौबत न आए। इससे संसद की भूमिका ही अप्रासंगिक हो गई है।
नोटबंदी का फैसला हो, जीएसटी लागू करने की बात हो या फिर तीन तलाक का मामला, सब जगह संसद की अवहेलना की गई। कानून बनाने में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना करने तक सीमित है। वह न कोई कानून बनवा सकता है और न रुकवा सकता है। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती है, असल में गलत है। सच्चाई यह है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही लागू भी करती है। सत्तर साल के संसदीय इतिहास में केवल 14 निजी बिल कानून बन सके हैं और सन् 1970 के बाद एक भी निजी बिल कानून नहीं बन पाया है।
यह एक दुखद सत्य है कि बिल पेश होने से पहले ही हमें उसके परिणाम का पता होता है और बिल पर मतदान एक अप्रासंगिक औपचारिकता मात्र बनकर रह गई है। इससे संसद की शक्तियां प्रभावित हुई हैं। संसद की शक्तियों के क्षरण की सीमा यह है कि संसद अपनी मर्जी से कोई कानून पास नहीं कर सकती, क्योंकि प्रधानमंत्री के दल का बहुमत है और संसद में सिर्फ वही बिल पास होते हैं, जो या तो सरकार द्वारा लाए जाते हैं या उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त होता है। विपक्ष की आलोचना का सरकार के बहरे कानों पर कोई असर नहीं होता, इसलिए मीडिया और जनता का ध्यान खींचने के लिए विपक्ष शोर-शराबा करता है, संसद में धरने देता है या वॉकआउट करता है, पर इसका असल प्रभाव न के बराबर है। विपक्ष कुछ कर नहीं सकता और सत्तारूढ़ दल के सदस्य सरकारी बिल के पक्ष में मतदान के लिए विवश हैं इसका परिणाम यह है कि संसद में पेश किए जाने वाले बिलों पर कोई सार्थक बहस नहीं होती। किसी बहस की बात तो छोडि़ए, अकसर सारे ही बिल कानफाड़ू शोर-शराबे के बीच पास हो जाते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों में 47 प्रतिशत बिल बिना किसी बहस के, जी हां, बिना किसी बहस के ही पास कर दिए गए। सन् 1990 में चंद्रशेखर की सरकार ने दो घंटे में लोकसभा से 18 बिल पास करवा लिए थे। सन् 2007 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा पेश किए गए तीन बिल लोकसभा में 15 मिनट में पास हो गए थे। दुर्भाग्यवश नरेंद्र मोदी की सरकार भी इस मामले में जरा भी अलग नहीं है। संसद की शक्तियों के क्षरण के कारण सरकारों को मनमानी करने का लाइसेंस मिल जाता है। एक और खतरनाक बात यह है कि दल-बदल विरोधी कानून लागू होने के बाद पार्टीं हाइकमान को पार्टी के मालिक का सा हक मिल गया है और हाइकमान कुछ व्यक्तियों के एक छोटे से गुट, एक परिवार या कई बार तो एक व्यक्ति तक सीमित हो जाता है।
दल के शेष छोटे-बड़े नेता हाइकमान के आदेशों को मानने के लिए विवश हैं। मोदी ने भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलाई है। इससे पार्टी में या सरकार में उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं है। मोदी विरोधियों को नेस्तनाबूद करने के लिए जाने जाते हैं और अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए वह धर्म के आधार पर वोटों का धु्रवीकरण करते थे, प्रधानमंत्री बनने तक उनका यह अस्त्र सफल रहा। हाल के गुजरात विधान सभा चुनावों में जब उन्हें चुनौतियां नजर आईं, तो उन्होंने गुजरात की अस्मिता और धार्मिक उन्माद का सहारा तो लिया ही, हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान को भी चुनाव मैदान में घसीट लिया।
कांग्रेस और शेष विपक्षी दलों ने अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में हिंदू समाज की अनदेखी की, इसलिए हिंदू समाज नरेंद्र मोदी को तारणहार की निगाह से देखने लगा है। यूपीए शासन के आखिरी सालों में सरकार घोटालों और अनिर्णय के जाल में फंसी रही, इसलिए मोदी का तुर्त-फुर्त फैसला लेने का तरीका भी जनता को बहुत भा रहा है, लेकिन हम इसमें निहित खतरों की अनदेखी कर रहे हैं। मोदी ने सारी शक्तियां अपनी जेब में डाल ली हैं। लोकतंत्र के बावजूद उनका व्यवहार तानाशाह का-सा है। यह देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। हमारे सामने सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है? हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री बदलने से इस समस्या का हल नहीं होता। व्यक्ति या दल बदलना इस समस्या का समाधान नहीं है। इसका सीधा सा मतलब है कि समस्या कहीं और है, और वह समस्या है हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त संसदीय प्रणाली। इस समस्या के हल के लिए हमें संसदीय प्रणाली की सभी खामियों का गहराई से अध्ययन करना होगा, ताकि हम समस्या की जड़ तक जाकर उसका सही इलाज कर सकें। समय की मांग है कि हम संसदीय प्रणाली की समीक्षा करें और इसमें निहित खामियां दूर करने का गंभीर प्रयास करें। देश का हित इसीमें निहित है।

Comment:

betnano giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betnano giriş
betnano giriş
betamiral giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betkare giriş
noktabet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
galabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betasus giriş
betplay giriş
betplay giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betasus giriş
betkare giriş
betkare giriş
noktabet giriş
restbet güncel
imajbet giriş
imajbet güncel giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betnano giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
fikstürbet giriş
fiksturbet giriş
fiksturbet
betplay giriş
betplay
betplay giriş
betasus giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betplay giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş