गुरू गोविन्द सिंह ने कीं अपनी सैन्य तैयारियां आरंभ

संघर्ष की भावना ने और गति पकड़ी
गुरू तेगबहादुर का बलिदान व्यर्थ नही गया। उनके बलिदान ने भारतवासियों को अन्याय, अत्याचार और शोषण के विरूद्घ अपना संघर्ष जारी रखने की नई ऊर्जा प्रदान की। अपने गुरू के साथ इतने निर्मम अत्याचारों की कहानी को सुनकर लोगों के मन में जहां तत्कालीन सत्ता के विरूद्घ एकजुट होने की भावना बलवती हुई, वहीं बलिदान को सार्थक बनाने के लिए संघर्ष की भावना ने भी गति पकड़ी।
गोबिन्दराय बने दशम गुरू
गुरू तेगबहादुर के सुपुत्र गोबिन्दराय सिखों के दशम गुरू बनाये गये। इनका जन्म 22 दिसंबर 1666 ई. को पटना (बिहार) में हुआ था।
गुरू तेगबहादुर के पश्चात दशम गुरू बने गोबिन्दराय को इतिहास में गुरू गोबिन्दसिंह जी महाराज के नाम से जाना जाता है। इन्हीं के काल में खालसा पंथ की स्थापना की गयी थी। इनकी माता का नाम गुजरी था। जिस समय गोबिन्दराय का जन्म हुआ था उस समय गुरू तेगबहादुर आसाम में थे। जहां एक संदेशवाहक के माध्यम से उन्हें बालक गोबिन्दराय के जन्म की सूचना दी गयी थी। उन्होंने आसाम से ही उस संदेशवाहक के माध्यम से घर के लिए यह संदेशा, भेजा कि बच्चे का नाम गोबिन्दराय रखा जाए। ढाई वर्ष पश्चात पिता ने आसाम से लौटकर अपने बच्चे को पहली बार देखा था।
बचपन में ही दिखायी वीरता
बालक गोबिन्दराय ने अपनी वीरता और निर्भीकता का परिचय अपने बचपन से ही देना आरंभ कर दिया था। एक बार की बात है कि पटना के स्थानीय नवाब की सवारी निकल रही थी। सवारी में पूरे राजकीय ठाट-बाट का आयोजन था, जिसे व्यर्थ का दिखावा भी कहा जा सकता है। नवाब की सवारी के सामने एक व्यक्ति ऊंची आवाज में कहता चल रहा था-”बा-इज्जत, बा-मुलाहिजा, होशियार पटना के नवाब साहब तशरीफ ला रहे हैं।”
इससे लोग इधर-उधर को बच और छुप रहे थे, साथ ही मार्ग खाली करके मार्ग के दोनों ओर सिर झुकाकर खड़े होते जा रहे थे। बालक गोबिन्दराय ने जब ऐसा दृश्य देखा तो उसे बड़ा कष्ट हुआ। एक व्यक्ति की सवारी के लिए इतना बड़ा आडंबर क्यों? ऐसे प्रश्न बाल गोबिन्दराय के मन में उठने-मचलने लगे। इसे बालक गोबिन्दराय ने शक्ति का दुरूपयोग माना और लोगों के भीतर शासन की ओर से आत्म सम्मान के भाव जागृत करने के स्थान पर उन्हें आत्मग्लानि से भरने का एक कुत्सित और घृणित प्रयास माना। जिसके विरूद्घ बालक गोबिन्दराय विद्रोही हो उठा।
जब बालक गोबिन्दराय से वह दृश्य अधिक नही देखा जा सका तो उसने अपने साथियों को इस अपमानजनक परंपरा के विरूद्घ खड़ा होने का संकेत दिया। बालक गोबिन्दराय ने अपने बाल साथियों का सहारा लिया। वे सभी गली में बाहर आकर शोरगुल करने लगे। जब उन्हें नवाब के रक्षक पकडऩे का प्रयास करते तो वह भाग जाते। एक प्रकार से बाल गोबिन्दराय का तत्कालीन क्रूर सत्ता के विरूद्घ यह पहला विद्रोह था जिसका नेतृत्व वह स्वयं कर रहे थे, घटना छोटी थी-पर आगत के महत्व की महत्वपूर्ण कड़ी बनने जा रही थी।
नवाब रहीम बख्श ने जब पूछा कि यह बालक कौन है? तब उसे बताया गया कि यह बालक गुरू तेगबहादुर जी का पुत्र गोबिन्दराय है। तब वह बालक गोबिन्दराय के प्रति सहज हो गया।
गोबिन्दराय की शिक्षा-दीक्षा
गुरू तेगबहादुर जी ने बालक गोबिन्दराय की शिक्षा-दीक्षा के लिए देवनागरी, गुरू मुखी तथा फारसी भाषा का ज्ञान कराने के साथ-साथ संस्कृत का ज्ञान कराने की उचित व्यवस्था की। फारसी के लिए मुंशी मीर मुहम्मद, संस्कृत के लिए पंडित कृपाराम जी तथा गुरूमुखी सिखाने के लिए मुंशी साहिबचंद को नियुक्त किया गया।
गुरू गद्दी संभाल ली
लगभग नौ वर्ष की अवस्था में गुरू तेगबहादुर के स्थान पर गुरू गद्दी के उत्तराधिकारी के रूप में गुरू गोविन्दसिंह जी ने कार्यभार संभाल लिया। वह बालक अवश्य थे पर यही बालक था जिसने अपने पिता को कश्मीरी पंडितों के समर्थन में उठ खड़ा होकर अपना बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। इसलिए गुरू गोविन्दसिंह कोई साधारण बालक नहीं थे, उन्होंने छोटी अवस्था में बड़े निर्णय लेकर बड़े काम करना सीख लिया था, इसलिए बड़े पद का दायित्व संभालने के लिए वह पहले से ही मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार थे।
अपने पिता के कटे शीश को देखकर या लखीशाह द्वारा किये गये पुरूषार्थ के परिणाम स्वरूप आयी पिता की शीश कटी लाश को देखकर भी यह बालक विचलित नही हुआ था। वह बड़े, शांत भाव से सारे कार्यों का संपादन अपनी उपस्थिति में कराता रहा। निश्चय ही उसकी यह गंभीरता उसके नायक होने की ओर संकेत कर रही थी।
कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये
बालक गोबिन्दसिंह गुरू बन गया तो उसने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये। सर्वप्रथम उन्होंने यह देखा कि इस समय मुगल सत्ता की क्रूरता और निर्दयता से जूझते हिंदू समाज के लेागों का मनोबल बढ़ाने के लिए ‘भक्ति मार्ग’ की आवश्यकता न होकर ‘शक्ति मार्ग’ की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने गुरू गद्दी संभालते ही अपने लोगों से स्पष्ट कह दिया कि हम उन्हीं लोगों को पसंद करेंगे जो हमें रणक्षेत्र में काम आने वाली वस्तुएं भेंट में देंगे।
अपनी इस योजना के पीछे गुरू गोविन्दसिंह का उद्देश्य स्पष्ट था। वह जानते थे कि दिल्ली की मुगल सत्ता अब उन्हें किसी भी प्रकार से कष्ट देने का कार्य कर सकती है। भविष्य असुरक्षित भी है, और अनिश्चित भी है, इसलिए भविष्य को सुरक्षित और निश्चिंत बनाने के लिए अपेक्षित तैयारियां की जानी आवश्यक हैं।
राष्ट्रीयता का ज्वर चारों ओर चढऩे लगा
गुरूदेव के अनुयायी सिखों और उनके प्रति आस्थावान हिंदू लोगों ने अपने नये गुरू के आदेशों के अनुसार कार्य करना आरंभ कर दिया। लगता है गुरू तेगबहादुर का बलिदान अपने सार्थक परिणाम देने लगा। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का ज्वर चारों ओर चढ़ा हुआ था। लोग गुरूदेव से जाकर मिलने लगे, इतना ही नही लोगों ने शस्त्र बनाने के कारखाने भी स्थापित करने आरंभ कर दिये। सबको लगता था कि भविष्य में कभी भी कुछ भी हो सकता है, इसलिए सुरक्षित भारत के निर्माण के लिए अपेक्षित तैयारी की जानी आवश्यक है।
गुरू गद्दी पर विराजमान होते ही गोबिन्दराय जी ने भविष्य में आने वाली सभी प्रकार की समस्याओं का सामना करने के लिए तैयारियां आरंभ कर दीं, जिसके अंतर्गत उन्होंने अपने सिख युवकों के भीतर शस्त्र विद्या घुड़सवारी, शिकार, तैराकी आदि पुरूषत्व के खेलों की ओर रूचि बढ़ाना आरंभ कर दिया। संगत को तैयार रहने, शस्त्र धारण करने और शस्त्रों का अभ्यास करने को कहा। इन आदेशों को सुनकर गुरू सिख युवक शस्त्र और अपना यौवन गुरूदेव के चरणों में समर्पित करने के लिए आनंदपुर साहिब पहुंचने लगे।
आनंदपुर में गुरूदेव ने युद्घ प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित कर दिये। साहस भरने के लिए कई प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन करने लगे और विजयी युवकों को प्रोत्साहन देने के लिए पुरस्कारों से समय-समय पर सम्मानित करते।
दरबार में बैठने के नये नियम बनाये
”गुरूदेव ने दरबार में बैठने के नये नियम बनाये, जहां पहले माला लेकर संगत बैठती थी, अब योद्घाओं को शस्त्र धारण करके बैठने का आदेश दिया गया और स्वयं भी ताज, कलंगी इत्यादि राजाओं जैसी वेशभूषा पहनकर सिंहासन पर विराजमान होने लगे।”
गुरू गोविन्दसिंह की देशभक्ति अत्यंत उच्चकोटि की थी। उनके हृदय में कश्मीरी पंडितों के प्रति जिस करूणा के दर्शन कराये थे वह निरी करूणा ही नहीं थी-उसमें देशभक्ति का उच्च भावनापूर्ण प्रबल संस्कार भी था। अपने इसी प्रबल संस्कार के कारण गुरू गोबिन्दसिंह ने अपने पिता को मुगलों के अत्याचारों का सामना करने और बलिदान होने की प्रेरणा दी थी।
आज जब वही बालक गोबिन्दराय गुरू गोबिन्दसिंह के नाम से गुरू गद्दी पर विराजमान था तो उससे यह अपेक्षा नही की जा सकती थी कि अब वह मुगलों से संधि कर लेगा। उसे तो युद्घ करना था और भारत के सत्य सनातन धर्म और मानवतावादी संस्कृति की रक्षा करनी थी।
 हिंदूवीरों का मौन रह पाना असंभव था
गुरू गोबिन्दसिंह जी की पुकार पर या उनके दिये गये संदेश पर हिंदूवीरों का मौन रह पाना असंभव था। भारत अपने पराक्रमी स्वभाव के लिए विख्यात था, इसलिए गुरू तेगबहादुर की शहादत के पश्चात भारत का पराक्रमी मौन रहने का पाप नहीं कर सकता था। इस बात को हरविलास सारदा जी की पुस्तक ‘हिन्दू श्रेष्ठता’ पृष्ठ 73 पर दिये गये इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है-
”मुकन्दस मारवाड़ के कुनयनवत’ राठौरों का सरदार था। उसने एक अपमान जनक उत्तर देकर शहंशाह औरंगजेब की अप्रसन्नता मोल ले ली। अत्याचारी बादशाह ने उसे निरस्त्र करके शेर के पिंजड़े में डाल दिया। बिना किसी भय के वह उस पिंजड़े में घुस गया जहां वह जंगल का शेर घूम रहा था।” उसने शेर को तिरस्कार पूर्वक ललकारा-‘मियां के शेर आ जसवंत के शेर का सामना कर।’
उसने जंगल के राजा की ओर दो आंखें निकालीं जो कुछ तो क्रोध और कुछ अफीम के प्रभाव से कुछ लाल हो रही थीं। वह शेर जो ऐसे अभिवादन का अभ्यस्त नहीं था एकदम चौंका-एक क्षण के लिए आगंतुक को देखा अपना सिर झुका लिया, और पीछे घूमकर उससे अलग हट गया। राठौर चिल्लाया देखो! आपके इस शेर में सामना करने का साहस नहीं है। सच्चे राजपूत की शान के विरूद्घ है कि वह उस शत्रु पर आक्रमण करे जो मैदान छोडक़र हट जाए।
इतने पर भी उस अत्याचारी शासक ने जो इस दृश्य को आश्चर्य से देख रहा था, उसकी प्रशंसा की और उसे भेंट देकर पूछा-”क्या तुम्हारा कोई ऐसा बच्चा है जो तुम्हारे इस पराक्रम का उत्तराधिकारी है।” उसका उत्तर था-” हमारे बच्चे कहां से हों जब आप हमारी स्त्रियों को हमसे दूर अटक के पार रखते हो।” इससे पूर्णत: प्रकट है कि-‘भय और राठौर दोनों एक दूसरे से अपरिचित थे। इस एक अकेली घटना से ही उसे नाहर खान की उपाधि दी गयी।’
लोग स्वयं को पुन: शेर समझने लगे
गुरूओं ने भारतीयों के और विशेषत: अपने सिखों के नाम के पीछे ‘सिंह’ लगवाना आरंभ कर दिया। जिससे कि वह कभी अपने आपको गीदड़ ना समझें और उनका शेरत्व कभी सो न जाए। इस एक छोटी सी बात का चमत्कारिक प्रभाव हुआ। लोग स्वयं को पुन: शेर समझने लगे। जहां कहीं भी निराशा व्याप्त थी, वह भी दूर होने लगी। औरंगजेब के शेर से तो एक हिंदूवीर ने टक्कर ली थी, परंतु औरंगजेब के शासन के विरूद्घ तो अनेकों शेर हिंदू योद्घा या भारतीय योद्घा हर स्थिति-परिस्थिति में शासन के लिए शेर बन चुके थे। जिन्हें पकडऩे का औरंगजेब का हर प्रयास असफल जा रहा था।
दिया सिख निर्माण के साथ-साथ सिंह निर्माण पर भी बल
पंजाब की वीर भूमि पर ऐसे शेरों (सिंहों) का निर्माण करने का दायित्व अब बालक गुरू गोविन्दसिंह के हाथों में था। जिन्होंने पहले दिन से शिष्य-सिख निर्माण के साथ-साथ सिंह निर्माण पर भी बल देना आरंभ किया। वह अपने लोगों को और भारत की सनातन संस्कृति के रक्षक किसी भी भारतीय को अशक्त, असहाय या निरूपाय नहीं देखना चाहते थे। उनका वास्तविक उद्देश्य था कि भारत सशक्त समर्थ और सबल बने। उनके इस लक्ष्य में जो भी कोई व्यक्ति सहायता करना चाहता था उसे वह अपना लेते थे। उनका अंतिम उद्देश्य था-औरंगजेब की क्रूर और निर्दयी सत्ता का प्रतिरोध किया जाना और अपने देश में ऐसे शासन की स्थापना करना जो समाज और राष्ट्र के लिए ऐसे नैतिक नियमों की स्थापना करे जिनसे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की रक्षा और उसके व्यक्तित्व का विकास होना संभव हो सके।
रणजीत नगारे की स्थापना
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गुरू गोबिन्दसिंह अपने साथियों से अथवा सेनानायकों व दरबारियों से अक्सर चर्चा करते रहते थे और चर्चा में लिये गये निर्णयों को बड़े मनोयोग से पूर्ण भी कराते थे। एक दिन ऐसी ही चर्चा में गुरूजी से कुछ लोगों ने कहा कि हमारे सैनिकों के सैन्य प्रशिक्षण के लिए एक बड़े नगारे की आवश्यकता है। जिससे कि सैनिकों का मनोबल ऊंचा किया जा सके। गुरूदेव ने तुरंत इस परामर्श को मान लिया। कुछ लोगों ने सैन्य प्रशिक्षण और उसके लिए नगारे की व्यवस्था को औरंगजेब से शत्रुता लेने की दिशा में बढ़ाया गया कदम कहकर इसकी आलोचना भी की, परंतु गुरू गोबिन्दसिंह पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने अपनी सेना में सम्मिलित किये गये इस नगारे का नाम ‘रणजीत नगारा’ रखा था।
गुरू गोबिन्दसिंह और राजा भीमचंद
इस नगारे के साथ वह शिकार पर भी जाते। पड़ोस में कहिलूर नगर था, जिसका राजा उस समय भीमचंद था। गुरू गोबिन्दसिंह जब भी कहिलूर की ओर आते तो इनके लोग वहां के जंगलों में नगारा अवश्य बजाते थे। जिसे राजा भीमचंद ने अपनी प्रतिष्ठा के विपरीत माना। परंतु भीमचंद को उसके मंत्री देवीचंद ने समझाया कि गुरू के शिष्यों या सैनिकों का नगारा बजाने का उद्देश्य आपको आतंकित करना नही है। क्योंकि हमारे संबंध गुरूओं से पीढिय़ों पुराने हैं और अतीत में इन संबंधों ने समय विशेष पर एक दूसरे को सहायता भी दी है।
भीमचंद अपने मंत्री की बातों से सहमत और संतुष्ट हो गया। बाद में देवीचंद मंत्री ने गुरू गोबिन्द सिंह से अपने राजा की भेंट करायी। गुरूदेव ने राजा के साथ जिस प्रकार प्रेम प्रदर्शन किया उससे राजा बड़ा अभिभूत हुआ।
पुरोहित परमानंद ने कर दिया गुड़ गोबर
परंतु राजा अभी भी शंकाओं से घिरा हुआ था। वास्तव में उसे उसी के पुरोहित ने भ्रमित कर दिया था। परमानंद नामक उस पुरोहित की ओर से कही गयी बातों के आधार पर राजा भीमचंद ने कुछ अन्य राजाओं के साथ मिलकर गुरू की बढ़ती शक्ति का विरोध करने का निर्णय लिया। उसे ऐसा लगता था कि जैसे गुरू गोबिन्द सिंह की सैनिक तैयारी उसके लिए ही घातक रहेगी।
भीमचंद आशंका यह भी थी कि गुरू गोबिन्दसिंह भविष्य में किसी नये राज्य की नींव रखने जा रहे हैं। इसलिए उसने राजा वीरसिंह जसवालिये और मदनलाल सिरमूरिये के साथ मिलकर सरहंद के सूबेदार के माध्यम से औरंगजेब के पास सूचना भिजवाई कि गुरू गोबिन्दसिंह की गतिविधियों से उनके साम्राज्य को भारी संकट आ सकता है। क्योंकि गुरू गोबिन्दसिंह एक नया धर्म चलाने वाले हैं जो कि हिंदू-मुस्लिम धर्म से भिन्न होगा। इस धर्म की स्थापना होने से हिंदू और मुसलमान दोनों को ही कष्ट हो सकता है। इन राजाओं ने गुरू गोबिन्दसिंह के भंगाणी के युद्घ में टक्कर भी ली थी, परंतु उसमें वह असफल रहे थे। इसलिए उन्होंने अब सम्राट के लिए लिखा कि हमने गुरू गोबिन्दंिसह से आपके साम्राज्य की समृद्घि के लिए भंगाणी में युद्घ भी किया है, परंतु हम असफल रहे हैं। इसलिए आपके स्तर पर गुरू और उसकी सेना का विनाश किया जाना अपेक्षित है।
औरंगजेब के लिए लिखा गया पत्र
इस विषय में एक मुस्लिम इतिहासकार मोहिउद्दीन का कथन है कि-इस दरबारी ने गुरू साहिब के भाषणों की सूचना देते हुए ऐसे लिखा-”गुरू गोबिन्दसिंह ने हिंदुओं की जाति-पांति, ब्रह्म, भ्रम, रीति रिवाज आदि को समाप्त करके सिखों को एक ही भाईचारे में गठित कर दिया है, जिसमें न कोई बड़ा है और न छोटा। एक ही बाटे में सभी जातियों को खाना खिलाया है। भले ही कुछ प्राचीन हठधर्मियों ने इस बात का विरोध किया। फिर भी लगभग बीस हजार पुरूष और महिलाओं ने गुरू साहिब के हाथों खण्डे की धार का अमृत छका है। गुरूदेव ने सिखों को यह भी कहा है कि अपने आपको गोविन्दसिंह तभी कहलाऊंगा जब चिडिय़ों से बाज तुड़वाऊंगा और एक-एक सिंह सिख दुुश्मन के सवा सवा लाख व्यक्तियों से टक्कर लेता दिखाई देगा।”
चुनौतियों के लिए चुनौती बनकर उठ खड़े हुए गोबिन्दसिंह
वास्तव में गोबिन्दसिंह की सोच भी यही थी। वे अपनी सैन्य तैयारियों से जहां अपने लोगों का मनोबल बढ़ा रहे थे, वहीं शत्रु को भी यह संकेत दे रहे थे कि इस बार कोई गुरू या कोई भी गुरू का शिष्य अपने आप चलकर शहीदी के लिए नहीं आने वाला, अबकी बार प्रचण्ड रण होगा और ऐसा भीषण रण होगा कि एक एक सिंह=सिख सवा-सवा लाख शत्रुओं का विनाश करेगा। गुरूजी का ऐसा अदम्य साहस और विशाल मनोबल शत्रु की चुनौतियों के लिए स्वयं में एक चुनौती था। चुनौतियों के लिए चुनौती बनकर उठ खड़ा होना ही तो राष्ट्रवाद होता है, चुनौतियों से छुपकर चलना कायरता होती है। भारत ने सदा ही चुनौतियों का सामना चुनौती बनकर किया। हमारी चुनौती को यदि हमारी कुछ दुर्बलताओं का जंग न लगा होता तो शत्रु की चुनौतियों का सफाया होना भी निश्चित था। गुरूजी इस बार पुन: भारत को खड़ा कर रहे थे-चुनौतियों के लिए चुनौती बनाकर। यह उनकी राष्ट्र साधना का दिव्यतम स्वरूप था।
शत्रु-शत्रु मिलकर मित्र हो गये
जिन लोगों ने बादशाह के लिए पत्र लिखा था-उनका उद्देश्य बादशाह से सैनिक सहायता प्राप्त कर गुरू गोबिन्दसिंह की बढ़ती शक्ति का विनाश कराना था और यही लक्ष्य औरंगजेब का था। इसलिए चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए शत्रु-शत्रु मिलकर मित्र हो गये और उन्होंने गुरू गोबिन्दसिंह के विरूद्घ एक साथ मिलकर युद्घ करने का निर्णय लिया। बादशाह औरंगजेब ने शत्रु का विनाश करने के लिए राजाओं के पत्र को स्वर्णिम अवसर माना। उसने राजाओं से निश्चय किया कि सैन्य सहायता तो हम देंगे, परंतु इस सैन्य अभियान में आने वाला संपूर्ण व्यय आपको झेलना होगा। राजाओं ने इस बात पर भी सहमति दे दी, तब औरंगजेब ने अपने पांच हजारी मनसब पैदे खां और दीनाबेग को विशाल सैन्य दल के साथ इन राजाओं की सहायता के लिए भेज दिया।
आनंदपुर का युद्घ
आनंदपुर के समीप दोनों पक्षों की सेनाओं में युद्घ हुआ। गुरू गोबिन्दसिंह स्वयं इस युद्घ में उपस्थित रहे। दोनों ओर से भयंकर मारकाट, रक्तपात आरंभ हो गया। सिखों ने गुरूजी की उपस्थिति में अपनी रोमांचकारी वीरता का प्रदर्शन किया। उन्हें मुगलों का विशाल सैन्यदल एक टिड्डी दल की भांति ही दिखता था। गुरूजी ने जिस प्रकार सिखों को आज तक सैन्य प्रशिक्षण दिया था, वह भी अब काम आ रहा था। भयंकर रक्तपात करते सिखों को देखकर मुगल सेना के पांव उखड़ गये और शत्रु को युद्घ भूमि से भागना पड़ गया। इस युद्घ में गुरू गोबिन्दसिंह ने पैदे खां को ललकारा और उसे अपने आपसे युद्घ के लिए उकसाया। इतना ही नही गुरूदेव ने पैदेखां को पहले वार करने के लिए दो अवसर दिये पर पैदेखां असफल रहा तब वह पीछे मुडऩे लगा। इस पर गुरूदेव ने उसे पुन: ललकारा और रूकने का संकेत दिया। गुरूजी ने एक ही तीर के वार से इस शत्रु का विनाश कर दिया। युद्घ भूमि में गिरे शत्रु के शवों से आज गुरू तेगबहादुर और उनके वीर साथियों को पहली बार श्रद्घांजलि अर्पित कर दी गयी। सिखों ने भागी हुई मुगल सेना का रोपड़ तक पीछा किया। यह लड़ाई सन 1700 ई. में लड़ी गयी थी। क्रमश:
(लेखक की पुस्तक प्राप्ति हेतु डायमण्ड पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटेड एक्स-30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस-द्वितीय नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100 पर संपर्क किया जा सकता है। (साहित्य सम्पादक)

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