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-अशोक “प्रवृद्ध”

ईसा मसीह और क्रिसमस को लेकर लोगों के मन में अनेक भ्रांतियां, अनगिनत प्रश्न और असंगत कथाओं के कारण अनंत कौतूहल है। यह भी सिद्धप्राय है कि 25 दिसम्बर का ईसा मसीह के जन्मदिन से कोई सम्बन्ध ही नहीं है। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 ईसा पूर्व से 2 ईसा पूर्व के मध्य 4 ईसा पूर्व में हुआ था। जीसस के जन्म का वार, तिथि, मास, वर्ष, समय तथा स्थान, सभी बातें अज्ञात है। इसका बाईबल में भी कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे में ईसा जैसे प्रसिद्ध संत, महात्मा या अवतारी व्यक्ति के सम्बन्ध में लोगों के मन में संदेह उठते ही रहता है।

उल्लेखनीय है कि यीशु मसीह अपने जीवन के कुछ काल तक गुप्त अवस्था में भी रहे। यीशु के जीवन वृत्त के कुछ हिस्से गायब रहने अर्थात इतिहास में उस काल का कोई उल्लेख नहीं होने से भी इस बात की पुष्टि होती है कि यीशु अज्ञातवास में चले गये थे और यीशु के अज्ञातवास के काल का ईसाई साहित्य में कोई उल्लेख नहीं है। बाईबल में भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि यीशु मसीह 13 वर्ष से 29 वर्ष की उम्र के बीच कहाँ रहे? लेकिन भारतीय इतिहास के तत्कालीन पृष्ठों के समीचीन अध्ययन और कतिपय विद्वानों के लेखों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यीशु के 13 से 29 वर्ष का समय भारत में व्यतीत हुआ था, और यीशु ने भारत के कश्मीर में ऋषि -मुनियों से साधना सीखकर 17 वर्ष तक योग किया था। बाद में वे रोम देश में गये तो वहाँ उनके स्वागत में पूरा रोम शहर सजाया गया और मेग्डलेन नाम की प्रसिद्ध वेश्या ने उनके पैरों को इत्र से धोया और अपने रेशमी लंबे बालों से यीशु के पैर पोछे थे। बाद में यीशु के अधिक लोक संपर्क से योगबल खत्म हो गया और उनको सूली पर चढ़ा दिया गया तब पूरा रोम शहर उनके खिलाफ था। रोम शहर में से केवल 6 व्यक्ति ही उनके सूली पर चढ़ने से दुःखी थे।

एक नए शोध के अनुसार यीशु ने उनकी शिष्या मेरी मेग्डलीन से विवाह किया था, जिनसे उनको दो बच्चे भी हुए थे। ब्रिटिश दैनिक द इंडिपेंडेंट में प्रकाशित रिपोर्ट में द संडे टाइम्स के हवाले से बताया गया है कि ब्रिटिश लाइब्रेरी में 1500 वर्ष पुराना एक दस्तावेज मिला है, जिसमें एक दावा किया गया है कि ईसा मसीह ने न सिर्फ मेरी से शादी की थी बल्कि उनके दो बच्चे भी थे। साहित्यकार और वकील लुईस जेकोलियत ने 1869 ईस्वी में अपनी एक पुस्तक द बाइबिल इन इंडिया में कृष्ण और क्राइस्ट पर एक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए कहा है कि क्राइस्ट को जीसस नाम भी उनके अनुयायियों ने दिया है। इसका संस्कृत में अर्थ होता है मूल तत्व। क्राइस्ट शब्द क्रिसना अर्थात कृष्ण का ही रूपांतरण है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कृष्ण को क्रिसना ही कहे जाते देख लुईस के इस विचार की पुष्टि ही होती है। यह क्रिसना ही यूरोप में क्राइस्ट और ख्रिस्तान हो गया। बाद में यही क्रिश्चियन हो गया। लुईस के अनुसार ईसा मसीह अपने भारत भ्रमण के दौरान उडीसा के जगन्नाथपुरी अवस्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर में रुके थे। एक रूसी अन्वेषक निकोलस नोतोविच के द्वारा भारत में कुछ वर्ष रहकर प्राचीन हेमिस बौद्ध आश्रम में रखी पुस्तक- द लाइफ ऑफ संत ईसा- पर आधारित फ्रेंच भाषा में लिखी गई द अननोन लाइफ ऑफ जीजस क्राइस्ट नामक पुस्तक में भी ईसा मसीह के भारत भ्रमण के बारे में बताते हुए कहा गया है कि बुद्ध के विचार और नियमों से बहुत प्रभावित ईसा मसीह ने भारत में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। यह भी कहा जाता है कि जीसस ने कई पवित्र शहरों जैसे जगन्नाथ, राजगृह और बनारस में दीक्षा दी जिसके कारण ब्राह्मण नाराज हो गए और उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया। इसके बाद जीसस हिमालय भाग गए और बौद्ध धर्म की दीक्षा लेना जारी रखा। जर्मन विद्वान होल्गर केर्सटन ने जीसस के शुरुआती जीवन के बारे में लिखा था और दावा किया था कि जीसस सिंध प्रांत में आर्यों के साथ जाकर बस गए थे।

अमृता प्रीतम के द्वारा लिखी गई पुस्तक के अनुसार “फिफ्त गॉस्पल” फिदा हसनैन और देहन लैबी द्वारा लिखी गई एक किताब है। इस किताब के अनुसार 13 से 29 वर्ष की उम्र तक ईसा भारत भ्रमण करते रहे। इस किताब में कुँवारी माँ से जीजस का जन्म और मृत्यु के बाद पुनर्जीवित हो जाने वाले चमत्कारी मामलों पर भी ईसाई जगत की मान्यता के विरूद्ध विचार किया गया है। बीबीसी द्वारा बनाए गए एक डोक्युमेंट्री जीसस वाज ए बूद्धिस्ट मोंक में यीशु को सूली पर चढ़ते हुए नहीं दिखाया गया था। डॉक्युमेंट्री के अनुसार जब वह 30 वर्ष के थे तो वह अपनी पसंदीदा जगह वापस चले गए थे। यीशु मसीह की मौत नहीं हुई थी और वह यहूदियों के साथ अफगानिस्तान चले गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय लोगों ने इस बात की पुष्टि की कि यीशु मसीह की मौत नहीं हुई थी, और वह यहूदियों के साथ अफगानिस्तान चले गए थे। यीशु मसीह ने कश्मीर घाटी में कई वर्ष व्यतीत किए थे और 80 की उम्र तक वहीं रहे। इस प्रकार यीशु मसीह 16 वर्ष किशोरावस्था में और जिंदगी के आखिरी 45 वर्ष कुल 61 वर्ष भारत, तिब्बत और आस-पास के इलाकों में व्यतीत किए। कुछ लोगों का मानना है कि कश्मीर के श्रीनगर में रोजा बल श्राइन में जीसस की समाधि बनी हुई है। हालांकि, आधिकारिक तौर पर यह मजार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूजा आसफ का मकबरा है। अगर यह बात सत्य है तो इसका अर्थ है कि यीशु मसीह को कील ठोककर क्रॉस पर लटकाना आदि बातें झूठी व मनगढ़ंत हैं। लेकिन ईसाई मिशनरियाँ इसी बात को बोलकर यीशु मसीह को भगवान का बेटा बताती हैं और धर्मान्तरण का आधार बनाती हैं। यदि यीशु मसीह ने अपने जीवन काल में कथा, धार्मिक प्रवचन आदि किये होते तो उसके प्रवचनों की कोई बड़ी पुस्तक जरूर होती अथवा कम से कम बाइबिल में ही उसके प्रवचन होते। परन्तु बाईबल में तो उनके किसी प्रवचन का जिक्र ही नहीं है? ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि वे सारे भाषण कहाँ हैं? वे सभी प्रवचन कहाँ हैं? इसका उत्तर आज तक किसी के पास नहीं है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि 25 दिसम्बर और यीशु का क्रिसमस से कोई लेना देना नहीं है और न ही संताक्‍लॉज से। यह सिर्फ और सिर्फ ईसाईयत का प्रचार करने और भारतीय संस्कृति को खत्म करने और ईसाईकरण के लिए भारत में क्रिसमस डे के रूप में मनाया जाता है। 25 दिसम्बर हिन्दू सूर्य महाराजा सूरजमल जी का बलिदान दिवस भी है। हाल के वर्षों में भारतीयों ने 25 दिसम्बर को तुलसी पूजन दिवस के रूप में मनाना शुरू किया है।

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