बिखरे मोती-भाग 234

बालक नरेन्द्र में कुशाग्र बुद्घि हृदय में उदारता, ऋजुता समाज और राष्टï्र के लिए कुूछ कर गुजरने का जज्बा, वाकपटुता, वाकसंयम, प्रत्युत्तर मति और बहुमुखी प्रतिभा अप्रतिम थी, जिसे उनके गुरूरामकृष्ण परमहंस ने और भी धारदार बना दिया। प्रभावशाली बना दिया। बड़ा होकर यही बालक स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्व विख्यात हुआ तथा ज्ञान और तेज का सूर्य कहलाया। जिसने अमेरिका के प्रसिद्घ शहर शिकागो में विश्व-धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म की धाक जमा दी थी।

मूलशंकर भी महर्षि देव दयानन्द सरस्वती तभी बने थे जब वे अपने गुरू प्रज्ञाचक्षु बिरजानंद के द्वारा शिक्षित और संस्कारित हुए थे। भारत में ‘स्वराज्य’ शब्द की गंगा का आविर्भाव सबसे पहले महर्षि देव दयानंद के मुख से हुआ था। उनके विलक्षण व्यक्तित्व के प्रणेता उनके गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी बिरजानंद दण्डी थे जिन्होंने ज्ञान और संस्कार की तूलिका से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को अनुपम बना दिया। इसलिए गुरू एक व्यक्ति नहीं, एक दिव्य शक्ति है। कवि इस संदर्भ में कितना सुंदर कहता है :-

बूंद ने अपनी नहीं नई नगरी सजाई। मिल गयी जब सिन्धु से तो महानगरी बसाई।।

कौन कहता है? हिमालय मात्र हिम का ढेर है।

इस हिमालय ने पिघलकर, धरती पर गंगा बहाई।।

आत्मोत्थान में रजोगुण और तमोगुण दो बड़ी बाधाएं हैं :-

रज-तम दो बाधाएं हैं,

बिरला ही करता पार।

सत्त्व में जो स्थिर रहै,

उसका हो उद्घार ।। 1169 ।।

व्याख्या :-रजोगुण कर्मों की आसक्ति से व्यक्ति को बांधता है अर्थात रजोगुण के बढऩे पर ज्यों-ज्यों तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है, त्यों ही त्यों मनुष्य की कर्म करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है, चंचलता और उच्छ्रंखलता बढ़ती है, मन के वशीभूत होने की प्रवृत्ति बढ़ती है। ऐसी अवस्था में मनुष्य को अपना कल्याण अथवा उद्घार करने का अवसर ही नहीं मिलता है। इस तरह रजोगुण कर्मों की सुखासक्ति से मनुष्य को बांध देता है अर्थात जन्म-मरण से क्रम ले जाता है। यह तमोगुण अज्ञान से अर्थात नासमझी, मूर्खता से प्रारम्भ होता है और पश्चाताप पर जाकर समाप्त होता है। यह मनुष्य को क्रोध आलस्य, प्रमाद और निद्रा में बांध देता है। तमोगुण की प्रधानता के कारण जिन मनुष्यों में सत् असत् पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कत्र्तव्य-अकत्र्तव्य का ज्ञान (विवेक) नहीं है, वे मनुष्य होते हुए भी पशुओं की तरह हैं-जो खा पी लेते हैं और सो जाते हैं अथवा संतानोत्पत्ति करते हैं।

इस तरह तमोगुण मनुष्य की सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति नहीं होने देता है, उसे अपने पाश में बांध लेता है अर्थात कुकृत्यों के कारण उसे ऐसे लोकों में ले जाता है, जहां सूर्य के प्रकाश की किरणें भी नहीं पहुंच पाती हैं। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्टï हो गया कि रजोगुण मनुष्य को चंचलता के कूप में गिराता है तो तमोगुण मनुष्य को जड़ता अज्ञान और अहंकार के गहन अंधकार में भटकाता है। इसलिए मनुष्य के जीवन में रजोगुण और तमोगुण वास्तव में दो बड़ी बाधाएं हैं, दो बड़ी गहरी खाईयां हैं, जिन्हें कोई बिरला ही व्यक्ति पार कर पाता है।ध्यान रहे, सत्त्वगुण से अंतकरण और ज्ञानेन्द्रियां, रजोगुण से प्राण और कर्मेन्द्रियां तथा तमोगुण से स्थूल पदार्थ, शरीर आदि का निर्माण होता है। इन तीनों गुणों से संसार के अन्य पदार्थों की उत्पत्ति होती है।

क्रमश:

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