गांधी ,गांधीवाद और देश की समस्याएं

images (54)

डॉ राकेश कुमार राणा

देश की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए गांधी के सपनों के भारत की दिशा में हम कितना बढ़े हैं इसका भी मूल्यांकन करना उतना ही समीचीन है जितना संघषों से प्राप्त की गई अपनी इस आजादी का। गांधी की भारत की कल्पना क्या थी? वह कैसा भारत चाहते थे? गांधी के सपनों का भारत कैसा होगा? देश ने विभिन्न क्षेत्रों में निस्संदेह उत्साहजनक विकास किया है पर देश कई क्षेत्रों में पिछड़ा भी है। गांधी ने अपने सपनों का भारत बनाने के लिए कठिन संघर्ष किया। इसलिए गांधी ने अपने संघर्ष को दो आयामों पर समानांतर चलाया। एक आन्दोलनात्मक पक्ष रहा तो दूसरा रचनात्मक पक्ष। स्वाधीनता गांधी के लिए मात्र ब्रिटिश राज से मुक्ति भर नहीं थी। बल्कि गांधी के लिए गरीबी, निरक्षरता और अस्पृश्यता जैसी बुराइयां मुक्ति का बड़ा सपना थे। गांधी ऐसा भारत चाहते थे कि देश का हर नागरिक समान रूप से आज़ादी और समृद्धि को जी सके। इसके लिए गांधी ने भारतीय जीवन-दर्शन से जुड़ा एक भरा-पूरा विचार दुनिया को दिया जिसे हम गांधीयन वैचारिकी कह सकते है।

गांधीवादी वैचारिकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पुंजों की ऐसी समग्रता है जो विकासशील समाजों के लिए आज पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक है। लेकिन उस प्रासंगिकता की स्थापना हो कैसे? असल संकट यही है। गांधी निर्विवादित ढंग से पूरी दुनिया के लिए प्रकाश पुंज हैं। आज दुनिया के सामने जितने भी संकट हैं उन सब पर गांधी 1909 में “हिन्द स्वराज” को लिखते समय चिंतित थे। गांधी इन सभी संकटों के समाधान सुझा रहे थे। आज समाज में जो भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्यायें हैं, उनके लिए गांधी-विचार मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में सहायक हैं। गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, असमानता, अन्याय, भेदभाव और शोषण ये सब सामाजिक प्रगति के अवरोध हैं। समाज के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में गांधी के विचार अपनी उपादेयता इसी दूरदृष्टि के साथ रखते हैं। 

गांधी ग्राम-स्वराज, सत्याग्रह, स्वदेशी और सर्वोदय की अवधारणा में भारतीय चिंतन परम्परा की मौलिकता में सहेजे जीवन मूल्यों को रेखांकित करते हैं। भारत और भारतीयता के आधारभूत तत्व आध्यात्मिकता में संजोये जीवन-दर्शन को विकास के छलावे में बहकी दुनिया को बताने के लिए सभ्यता-विमर्श के काम में लाते हैं। गांधी का यह मौलिकपन ही उन्हें तमाम विचारकों से बहुत आगे ले जाता है। यही वजह है कि गांधी को वैचारिक फ्रेमों में फिट करना बौद्धिक जमात के बस की बात कभी नहीं रही। यह गांधी की मौलिकता ही है कि गांधी ने आध्यात्मिक नैतिकता की सहायता से हमारी अर्थनैतिक और सैनिक कमजोरी को ताकत में बदल दिया। अहिंसा को समाज की सबसे बड़ी शक्ति बना दी। सत्याग्रह का अमोघ अस्त्र हमें थमा दिया। गांधी प्राचीन भारतीय बौद्धिक विरासत को सहेजते हैं और उसको बीज रूप में इस्तेमाल कर समाज में बोते हैं, समाज को खड़ा करते हैं। गांधी ने भारतीय विचार-दर्शन में निष्क्रिय पड़ी सहिष्णुता जैसी शक्ति को सक्रिय किया। एक शक्तिहीन अशक्त समाज को सशक्त समाज में बदलने का उद्यम किया। 

गांधी चिन्तन के केन्द्र में गांव और गरीब रहा है। उनकी “सर्वोदय” की संकल्पना और “गांव की ओर लोटो” की चिंतन दृष्टि सबका साथ सबका विकास का व्यावहारिक विचार प्रस्तुत करती है। गांधी आह्वान करते हुए पश्चिमीकृत आधुनिकता का खंडन करते हैं और भारतीय जीवन मूल्यों की सर्व कल्याणकारी वैचारिकता का उदघोष करते हैं। जिसमें गांव विकास के केन्द्र में है। वैकल्पिक टेक्नॉलोजी उन नवाचारों में निहित है जो मावनीय सृजन क्षमता से उभरेगी। समाज के सशक्तीकरण की राह स्वदेशी और सर्वोदय के सिद्धांतों पर बनेगी। गांधी भारतीय परम्परा से निकले जीवन मूल्यों में सत्य और अहिंसा को सर्वोच्च स्थान देते हैं और जीवन के हर क्षेत्र को इनसे आप्लावित करना चाहते हैं। यही गांधी का सपना था और उनके जीवन का मिशन भी। गांधी के भारत में सब धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं, आस्थाओं, राजनीति, व्यापार और सामाजिक-आर्थिक संबंधों की अपनी-अपनी विशिष्ट जगह होनी थी और अहिंसा इन संबंधों की मुख्य संचालक शक्ति तथा सत्ता, धन, शिक्षा, धर्म, सामाजिक व्यवहार सभी परस्पर दायित्वबोध से बंधे हों।

गांधी सर्वधर्म समभाव के हिमायती थे। वे सब धर्मों को सच्चा मानते थे पर अभी सब अपूर्ण हैं यह भी उनकी दृढ़ मान्यता थी। सब धर्म एक-दूसरे से मिलकर रहे। सब सबसे कुछ सीखे, तभी सबका विकास होगा और सब धर्म एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। गांधी पश्चिमी सभ्यता, पश्चिमी विकास की अवधारणाओं और आदर्शों का अनुकरण करने के पक्षधर नहीं थे। गांधी का भारत स्वराजयी स्फुरण से महकने वाला भारत होना था। वह मानसिक स्वराज सबसे पहले चाहते थे। उनकी चाहत थी कि भारत संसार से सीखे भी और उसे सिखाए भी। तब भारत अपने हिसाब से स्वायत्त और स्वाधीन बुद्धि वाला राष्ट्र बने। वह सबका भारत बनाना चाहते थे। गांधी के भारत में सबको समान अधिकार और आदर मिलना था। गांधी का भारत दूसरों से होड़ करता भारत नहीं था। गांधी प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की जगह सहयोग और प्रेम के पक्षधर थे। जिससे एक आत्मनिष्ठ, स्वायत्त और आत्मविश्वस्त भारत राष्ट्र का निर्माण हो सके। गांधी साध्य और साधन के बीच की दूरी को कम से कम करने पर बल देते रहे। वह साध्य के लिए साधन की बलि देने को तैयार नहीं थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि उदात्त की प्राप्ति साध्य-साधन के संतुलन से ही संभव है। गांधी की आध्यात्मिकता और आधुनिकता दोनों संतुलन साधने की शक्तियां हैं। गांधी यथावश्यक अपनी प्राचीन विरासत को संशोधित करने को भी तत्पर रहते हैं और आधुनिकता को अपनी शर्तों और अपने समाज के स्वभावानुसार ढ़ालकर आत्मसात् करने में भी नहीं हिचकते हैं। गांधी के भारत में नकार नहीं है पर स्वीकार उसी का है जो भारत को सुदृढ़ करता हो। गांधी का चिंतन उनका बताया रास्ता उलझी हुई दुनिया को दिग्दर्शन कराने वाला विचार है। आज दुनिया के अधिकांश मौजूदा संकटों का समाधान गांधी-दर्शन में निहित है। जो यह सिद्ध करता है कि गांधी का विचार इक्कीसवीं सदी के लिए भी सार्थक और उपयोगी हैं। 

भारत की पुर्नःसत्ता स्थापना में गांधी “स्वराज” को केन्द्रीय महत्व देते हुए दुनिया के मार्गदर्शन की दिशा में भारत को प्रस्थान बिन्दु मानते हैं। गांधी का स्वराज से अभिप्राय लोक-सम्मति से संचालित शासन है। “स्वराज” जनता में इस बात की समझ पैदा करना है कि सत्ता में कैसे सबकी सहभागिता हो और उसका नियमन करने की क्षमता का विकास समाज में कैसे हो। गांधी का “स्वराज” व्यक्ति की आतंरिक शक्ति के विकास पर निर्भर करता है। स्वतंत्र भारत में गांधी “स्वराज” की जिस कल्पना को भारतीय संविधान के जरिए साकार करना चाहते थे उसमें हर व्यक्ति स्वावलम्बी बने। हर कोई स्वतंत्र और मुक्त महसूस करे। यहां तक कि प्रत्येक व्यक्ति को पाप तक करने का अधिकार हो। गांधी के राष्ट्र निर्माण की दृष्टि अद्भुत है ’’मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें गरीब-से-गरीब लोग भी यह महसूस करे कि यह उनका देश है। जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्त्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा। जिसमें ऊँचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेल-जोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता या शराब जैसी दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। उसमें स्त्रियों को वही अधिकार होंगे जो पुरुषों को होंगे। सारी दुनिया के साथ हमारा सम्बन्ध शान्ति और प्रेम का होगा। हम सर्व कल्याण की कामना वाले राष्टृ बनेंगे। ऐसा होगा मेरे सपनों का भारत”।

(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं। यंग सोशल साइंटिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष हैं और एम.एम.एच. कालेज गाजियाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं )

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nitrobahis giriş