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डॉ राकेश कुमार आर्य

आगामी 2024 के लोकसभा चुनावों के दृष्टिगत देश की राजनीति में इस समय अजीब किस्म की उथल-पुथल और भागदौड़ देखी जा रही है। अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए नेताओं के चूहे इस समय भागदौड़ में लगे हुए हैं। ये सभी किसी ऐसे सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं, जहां ये 2024 से अगले 5 वर्षों में अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए व बनाए रखने में सफल हो जाएं।
हम सबसे पहले कांग्रेस की बात करते हैं। यहां से गुलाम नबी आजाद जैसे कई बड़े नेता अपने अस्तित्व की खोज में और अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए जहां पार्टी को छोड़ गए हैं ,वहीं पिछले 20 वर्ष में पहली बार ऐसा होने वाला है कि कांग्रेस को गांधी नेहरू परिवार से बाहर का एक व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में मिलने जा रहा है। पार्टी अपने भीतर लोकतंत्र को बहाल करने का प्रयास कर रही है। क्योंकि भाजपा के व्यंग बाण उसे अब पूर्णतया छलनी कर चुके हैं। यही कारण है कि पार्टी परिवारवाद से बाहर निकलना चाहती है। इसी समय राहुल गांधी अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए भारत जोड़ो यात्रा पर हैं। वह और उनकी मां सोनिया गांधी चाहेंगी कि पार्टी की कमान अशोक गहलोत के हाथ में जाए।
इसके दो कारण हैं कि इससे यदि अशोक गहलोत कांग्रेस के अध्यक्ष बनते हैं तो वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं होंगे। इसके साथ ही वह इस समय वृद्धावस्था को भी अनुभव कर रहे हैं। उनकी वृद्धावस्था भी उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी। बात साफ है कि ऐसी परिस्थिति में यदि कल को पार्टी सत्ता के निकट आती है या सत्ता में सीधे आने के लिए स्पष्ट बहुमत लेकर जीतती है तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में सोनिया गांधी को कोई समस्या नहीं आएगी। इस प्रकार कांग्रेस के अध्यक्ष पद की लड़ाई और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने हेतु की जा रही कशमकश के रूप में देखा जाना चाहिए। राहुल गांधी के लिए अशोक गहलोत एक अच्छा चेहरा हो सकते हैं। अशोक गहलोत वैसे भी पिछड़ी जाति से हैं। उत्तर भारत में पिछड़ी जाति को अपने साथ जोड़ने का गुणा भाग भी कांग्रेस इस समय लगा रही है। इसलिए सचिन पायलट को काटकर जो थोड़ी बहुत क्षति कांग्रेस को हुई थी, उसकी पूर्ति अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बना कर की जा सकती है। इस सोच के अधीन भी अशोक गहलोत को पार्टी प्रमुख बनाए जाने की तैयारी सोनिया गांधी और राहुल कर रहे हैं। उनकी यात्रा ( जीवन ) में भी राजनीति है और राजनीति में भी यात्रा है।
अब चलते हैं बिहार की ओर। यहां पर पलटूराम के नाम से विख्यात नीतीश कुमार अब बुरी तरह जाल में फंसे हैं। उनके पास बिहार विधानसभा में केवल 43 विधायक हैं। जबकि आरजेडी के 79 विधायक हैं। जिसके चलते उनकी स्थिति बड़ी दयनीय हो चुकी है। आरजेडी के तेजस्वी यादव उन्हें किसी भी प्रकार से बिहार से बाहर कर देना चाहते हैं। नीतीश जी यह बात समझ चुके हैं कि अब वह दोबारा जीतकर मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले। इसलिए शेष जीवन को राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री के चेहरे के नाम पर काट लेने में भी लाभ है।
बिहार में यह बहुत संभव है कि वे स्वयं ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तेजस्वी यादव को देखकर अपने आप को राष्ट्रीय राजनीति में ले आएं। उनकी यात्रा अंतिम पड़ाव पर है और उसे वह एक शानदार मोड़ पर जाकर समाप्त करना चाहते हैं। उनका समापन ही तेजस्वी यादव का शुभारंभ होगा। इस हिसाब से शतरंज के खेल में नीतीश और तेजस्वी दोनों वर्तमान राजनीति में जी रहे हैं। इन दोनों के लिए राजनीति में शतरंज है और शतरंज में राजनीति है। अपनी शतरंजी चाल बिछाने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली में आकर राहुल गांधी ,शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल सहित विपक्ष के कई नेताओं से मिल चुके हैं। जबकि तेजस्वी यादव बिहार में अपने ढंग से अपनी शतरंज की चाल बिछा रहे हैं।
अब आते हैं ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश के ओमप्रकाश राजभर की ओर। दोनों भाग दौड़ करने के बाद कुछ थके थके से दिखाई दे रहे हैं। एक ने उत्तर प्रदेश में सपा के साथ मिलकर भाजपा को उखाड़ने का संकल्प लिया था तो दूसरी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा को सत्ता से दूर रखने में सफलता प्राप्त करके भी जिन पंखों को लगाकर दिल्ली के लिए उड़ान भरी थी वह उड़ान बीच में ही निढाल हो गई है । फलस्वरूप अब कटे हुए पंखों से घायल पंछी की तरह ममता बनर्जी यदि पश्चिम बंगाल में तड़प रही हैं तो वैसे ही सपा के साथ मिलकर धड़ाम से नीचे गिरने की चोट से आहत हुए राजभर उत्तर प्रदेश में कराह रहे हैं।
अब दोनों के सुर बदल रहे हैं और किसी न किसी प्रकार भाजपा की ओर बढ़ने में ही अपना लाभ देख रहे हैं। इन दोनों के लिए स्वार्थ में राजनीति है और राजनीति में स्वार्थ है। सुर बदलने में कुशल ममता बनर्जी ने अभी कुछ समय पहले आर0एस0एस0 की प्रशंसा की थी तो ओ0पी0 राजभर राजभर समाज को एसटी में सम्मिलित कराने के लिए अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर लौटे हैं।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और मायावती दोनों राजनीति के घायल पंछी हैं। दोनों ने नजदीक आकर भी देख लिया है और दूर जाकर भी देख लिया है। परिस्थितियां फिर ऐसी बन रही हैं की दोनों एक साथ आ सकते हैं। अभी पिछले दिनों जब अखिलेश यादव ने पैदल मार्च निकाला और बीजेपी सरकार ने उसमें अड़ंगा डाला तो इसको लेकर मायावती ने बीजेपी सरकार की खिंचाई की। मायावती के इस प्रकार के आचरण से जहां सपा को राहत मिली वहीं राजनीतिक आकलन करने वाले लोगों को इसके नए अर्थ भी समझ में आने लगे हैं। निश्चय ही ऐसे आचरण के माध्यम से मायावती भी अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं। उन्हें अब यह एहसास हो चुका है कि वह राजनीति के हाशिए पर जा चुकी हैं और किसी भी प्रकार से यदि अपना अस्तित्व बचाया जा सकता है तो वह राजनीति में नए मित्र तलाश कर ही बचाया जा सकता है। बुआ भतीजे के नाम से विख्यात मायावती और अखिलेश यादव पहले किस्मत को फोड़ते हैं और फिर एक दूसरे को छोड़ते हैं। इनके लिए फोड़ना और छोड़ना ही राजनीति है।
अब चलते हैं कश्मीर की ओर। यहां पर पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला व फारूक अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला गुपकार बैठक के माध्यम से एक दूसरे के निकट आए थे। पर अब उनकी राजनीति बिखर चुकी है। भाजपा ने वहां पर विधानसभा की सभी सीटों का पुन: सीमांकन कराने के पश्चात सत्ता में इन दोनों पार्टियों के आने की संभावनाओं पर ग्रहण लगा दिया है। पी0डी0पी0 की नेता महबूबा मुफ्ती तो अभी चीख चिल्ला रही हैं, उनकी बौखलाहट साफ दिखाई दे रही है। पर राजनीति के कुशल खिलाड़ी फारूक अब्दुल्ला की समझ में सारा खेल आ चुका है। इसलिए उनके सुर बदल चुके हैं। गुपकार कहीं बीते दिनों की बात होकर बिखर चुकी है।
370 धारा के हटाए जाने के बाद के कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला ने जीना सीख लेने के संकेत देने आरंभ कर दिए हैं।
अभी पिछले दिनों पी0डी0पी0 नेता महबूबा मुफ्ती ने एक वीडियो शेयर किया था । जिसमें कुछ मुस्लिम स्कूली छात्र “रघुपति राघव राजा राम” वाला भजन गाते दिखाई दे रहे हैं। इस गीत पर महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि धार्मिक नेताओं को जेल में डाल कर और जामा मस्जिद बंद करके स्कूली बच्चों से हिंदू भजन गाने के लिए निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे भारत सरकार का कश्मीर में हिंदुत्व का एजेंडा उजागर हो गया है। गुपकार बैठक के माध्यम से सारे देश को एक साथ चलने का संदेश देने वाले फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती इस बिंदु पर अलग-अलग राय रखते हुए देखे जा रहे हैं। फारूक अब्दुल्ला ने इस बिंदु पर कहा है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। हिंदू यदि अजमेर की दरगाह में जाता है तो वह वहां जाकर मुसलमान नहीं हो जाता है। भजन गाने में कुछ गलत नहीं है, मैं भी भजन गाता हूं। मैं द्वी-राष्ट्रवाद के सिद्धांत का समर्थक नहीं हूं।
फारुख अब्दुल्ला जहां कुछ समय पहले विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करने की धमकी दे रहे थे, वहीं अब वे विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गए हैं और एक विधायक के रूप में अपना राजनीतिक भविष्य देख रहे हैं। समय के अनुसार चुप रहो या गिरगिट बनकर रंग बदल डालो ,यह फारुख अब्दुल्ला की राजनीति का एक हिस्सा है। जबकि हर बिंदु पर विरोध के स्वर तेज करते रहो और राजनीतिक समीकरणों को अपने अनुकूल करने के लिए सांप्रदायिकता का जहर भी फैलाते रहो, यह सोच महबूबा मुफ्ती की रही है। इसके उपरांत भी सांप्रदायिकता में राजनीति और राजनीति में सांप्रदायिकता खोजना इन दोनों पार्टियों के नेताओं के मौलिक स्वभाव में है।
अपनी अपनी राजनीति अर्थात अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग बजाने में कुशल भारत के ये राजनीतिज्ञ इस समय जिस प्रकार की हड़बड़ी में हैं, उससे यह तो स्पष्ट है कि इन्हें अपने राजनीतिक भविष्य पर बड़े-बड़े प्रश्नचिन्ह उभरते हुए दिखाई दे रहे हैं। अपनी उसी बेचैनी के चलते ये इस समय एक दूसरे का हाथ और साथ पकड़ने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं।
देश का मतदाता भी राजनीति के मेंढकों की उछल कूद को बड़े मनोरंजक ढंग से देख रहा है। अब देश का मतदाता पहले से बहुत अधिक समझदार हो चुका है। वह दूर बैठकर मेंढकों की उछल कूद का आनंद ले रहा है। आने वाले चुनावों में वह अच्छे अच्छों को ठिकाने लगा देगा। सरकार किसकी बनेगी, किसकी नहीं – यह तो हम नहीं कहना चाहेंगे , परंतु इतना निश्चित है कि अगले लोकसभा चुनावों में कई ऐसे चेहरे होंगे जो संसद का मुंह नहीं देख पाएंगे। क्योंकि देश का मतदाता अब निकम्मे, निकृष्ट, बेईमान, भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति के राजनीतिज्ञों को ठिकाने लगाने का मन बना चुका है।

 

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