आखिर क्या कारण था कि गांधी अंग्रेजों के लिए काम करते रहे ——-इंजीनियर श्याम सुन्दर पोद्दार

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———————————————गोखले के उत्तराधिकारी गाँधी ने कांग्रेस नेता के रूप में तीन जन आन्दोलन किये। पहला ख़िलाफ़त आंदोलन,दूसरा नमक सत्याग्रह व तीसरा और अंतिम ‘अंग्रेजों ! भारत छोड़ो’ पर अपनी फौज भारत में ही बनाए रहो। गांधी द्वारा देश की आजादी के नाम पर लड़े गए इन तीनों आंदोलनों की यदि हम समीक्षा करते हैं तो पाते हैं कि कांग्रेस का प्रस्ताव तो 1920 से 1929 तक पूर्ण स्वराज की लड़ाई लड़ने का नहीं था। 1929 में जाकर उसे पूर्ण स्वाधीनता का संकल्प लेने की सुध आई थी। उससे पहले कि कांग्रेस डोमिनियन स्टेटस की मांग कर रही थी।
जब देश की आजादी के नाम पर गांधीजी खिलाफत की लड़ाई लड़ रहे थे तो उसका देश की आजादी से दूर-दूर का भी कोई संबंध नहीं था। गांधी इस आंदोलन को देश की आजादी के लिए न लड़कर मुसलमानों के लिए लड़ रहे थे । उनके खलीफा के पद की सुरक्षा में वह देश की आजादी देख रहे थे। इससे बड़ी मूर्खता और कोई नहीं हो सकती।
उनके खिलाफत आंदोलन का उद्देश्य मुस्लिम जगत के ख़लीफ़ा के पद को वापस दिलाने का था। इस ख़िलाफ़त आंदोलन का स्वराज की लड़ाई से दूर दूर का भी सम्बंध नही था। दूसरी बार कांग्रेस ने १९२९ में पूर्ण स्वराज की प्राप्ति के लिये सर्वसम्मत प्रस्ताव पास किया। यहां भी गाँधी ने पूर्ण स्वराज की लड़ाई नही लड़कर नमक क़ानून के लिये लड़ाई लड़ी। गाँधी को कांग्रेस के आंदोलन को स्वराज प्राप्ति से भटकाने के लिये ऐसा क्यों करना पड़ा ? यह सोचने का विषय है।
इस बात पर तनिक गहराई से सोचने से हमें पता चलता है कि जब गांधीजी ऐसा करते थे तो इसका अंतिम लाभ अंग्रेजों को मिलता था। गाँधी ऐसा इसलिये करते थे क्योंकि वे मजबूर थे। वे कांग्रेस के नरम दल के नेता गोखले के उत्तराधिकारी थे। कांग्रेस के नरम दल का उद्देश्य ही अंग्रेज़ी राज को भारत में रखते हुए भारत की उन्नति करना था। जबकि कांग्रेस में तिलक के नेतृत्व में गरम दल का उद्देश्य था – स्वाधीनता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। अंग्रेज़ी राज को समाप्त कर उन्नति करेंगे। नरम दल व गरम दल के उद्देश्य में इतना बड़ा अंतर होने के बावजूद दोनो दल कांग्रेस में बने रहते थे।
गाँधी को गरम दल वालो के दबाव में स्वराज या पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास करना पड़ता है। पर नरम दल के उत्तराधिकारी होने के चलते अंग्रेज़ी राज को बनाए रखने के लिये स्वराज या पूर्ण स्वराज की लड़ाई नही लड़कर दूसरी लड़ाई ख़िलाफ़त,नमक सत्याग्रह करते है, ताकि अंग्रेज़ी सरकार पर प्रहार ना हो। गाँधी ने अपना राजनीतिक जीवन भारत के अन्य नेताओं की तरह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भारत में आरम्भ नही किया। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में आरम्भ किया। ४६ वर्ष की उम्र में वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस के नरम दल के नेता गोखले के उत्तराधिकारी के रूप में दक्षिण अफ़्रीका से लाये गए। गाँधी को दक्षिण अफ़्रीका से लाने के पहले गोखले को लन्दन जाकर अंग्रेजों की दक्षिण अफ़्रीका सरकार को लन्दन से आदेश दिलाना पड़ा कि वे गोखले से मिलकर उनकी बातों को माने।
।इस तरह गोखले प्रिटोरिया जाकर गाँधी को भारत में लाने के पहले हीरो बनाने के लिये गाँधी की दो तीन माँगे यथा ३ पाउंड टैक्स वगेरह माफ़ करवाते हैं। गाँधी के पोते राजमोहन गाँधी की पुस्तक मोहन दास में गाँधी भारत में कैसे लाये गये का पूर्ण विवरण है। अंग्रेज सरकार ने गाँधी को दक्षिण अफ़्रीका में ही मदद नही की। भारत की राजनीति में हीरो बनाने के लिये कदम कदम पर मदद की वार काउंसिल से प्रतिष्ठित नेता तिलक को को हटा कर गाँधी को बैठाया व तिलक के बराबर बनाया,चंपारन में गवर्नर के आदेश पर जनता का हीरो बनाया। गाँधी भी पूरे जीवन यही प्रयास करते रहे अंग्रेज़ी सरकार का भला हो।
एक बात बहुत बिचित्र है – १९४२ वाले आंदोलन के बारे में। जब सुभाष चन्द्र बोस ने द्वितीय बिश्वयुद्ध के आरम्भ में भारत छोड़ो आंदोलन की सम्पूर्ण रूप रेखा बनायी व आंदोलन आरम्भ करना चाहा। तब गाँधी ने यह कहकर कि अंग्रेज की विपत्ति के समय मै उन्हें और विपत्ति में नही फेंक सकता, और सुभाष बाबु को भारत छोड़ो आंदोलन करने नही दिया। पर १९४२ में तो द्वितीय बिश्वयुद्ध चल रहा था । तब गाँधी ने यह आन्दोलन क्यों किया ,? तब अंग्रेजों की विपत्ति ख़त्म हो गई थी क्या? सुभाष बाबू के अंग्रेजों भारत छोड़ो कहने और गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो पर अपनी सेना यही रखो, एम3 जमीन आसमान का अंतर था।
अब इस बात को आज के कांग्रेसियों को कौन समझाए कि अंग्रेज अपनी सेना यहा रखेंगे तो भारत ही क्यों छोड़ेंगे ? वास्तव में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन को करने का उद्देश्य भी गांधी के द्वारा अंग्रेजों को मदद करने का ही एक तरीका था। जापान भारत की तरफ़ आगे बढ़ रहा था ,7 April 1942 रंगूँन पर जापान का क़ब्ज़ा हो गया था। उस समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस वहां पर उपस्थित थे। कांग्रेस में गरम दल के लाखों उनके अनुयायी थे। सुभाष बाबु के भारत पहुँचने पर ये सभी उनकी मदद करते। उनको यह आंदोलन कर जेल में पहुँचाना। गाँधी इसमें कामयाब भी रहे।
वास्तव में गांधीजी जैसे नेता कांग्रेस के मंचों के माध्यम से अंग्रेजों को सीधे मदद पहुंचाते रहे तो कभी अपने आंदोलनों के माध्यम से भी उन्होंने अंग्रेजों को मदद पहुंचाने का काम किया। यह अलग बात है कि इस सबके बावजूद भी इतिहास उन्हीं का गुणगान करता है। सचमुच आज इतिहास के बदलने का समय आ गया है।

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