मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी नौकरशाही

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अजय कुमार 

योगी सरकार ने दूसरा कार्यकाल बड़े जोर-शोर से शुरू किया। खुद सीएम योगी एक तरफ काम में जुटे दिखे तो तमाम मंत्री भी औचक निरीक्षण के माध्यम से सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करते नजर आए। लेकिन 100 दिन का कार्यकाल पूरा करते-करते तस्वीर बदलने लगी।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब जनता के बीच अपनी सरकार के सौ दिन के कामकाज का जश्न मना रही थी, उसी समय योगी सरकार के एक दलित राज्य मंत्री ने ब्यूरोक्रेसी पर गंभीर आरोप लगा कर सरकार की किरकिरी करा दी है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। चर्चा यह भी है कि योगी सरकार के कई और मंत्री भी नौकरशाही के अड़ियल रवैये से त्रस्त हैं, लेकिन अभी यह खुलकर सामने नहीं आए हैं। कहा यह भी जा रहा है कि योगी सरकार के कई राज्य मंत्री ब्यूरोक्रेसी के अलावा अपने ऊपर बैठे कैबिनेट मंत्रियों के रवैये को भी नहीं पचा पा रहे हैं। राज्य मंत्रियों की आम शिकायत है कि उनके विभाग के बड़े यानी कैबिनेट मंत्रियों ने उनके (राज्य मंत्रियों के) हाथ बांध रखे हैं। वहीं कैबिनेट मंत्रियों का अपना दर्द है। क्योंकि ब्यूरोक्रेसी सुन उनकी भी नहीं रही है।

डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और लोक निर्माण मंत्री जितिन प्रसाद की भी तबादला नीति को लेकर नाराजगी सामने आ चुकी है। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक जिनके पास स्वास्थ्य शिक्षा विभाग है, वह तबादलों को लेकर गड़बड़ी की शिकायत कर चुके हैं, जिसके खिलाफ सीएम योगी आदित्यनाथ ने जांच बैठाने के साथ तबादला नीति का उल्लघंन करने के आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की है। तबादला नीति को लेकर नाराजगी जितिन प्रसाद की भी सामने आई है, लेकिन जितिन प्रसाद के बारे में यह भी चर्चा है कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन कर अपना ओएसडी रखा था, जिसे योगी द्वारा हटाए जाने से जितिन नाखुश हैं। वैसे जितिन प्रसाद ने नाराजगी वाली बात को सिरे से खारिज कर दिया है। 

बहरहाल, यह सब तब हो रहा है जब सीएम योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कर रहे है, कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखने से लेकर यूपी को वन ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी बनाने के लिए अभियान चल रखा है। सीएम लगातार ब्यूरोक्रेसी से कह रहे हैं कि जनप्रतिनिधियों को सम्मान दिया जाए, उनकी बात सुनी जाए। लेकिन ब्यूरोक्रेसी योगी सरकार प्रथम के दिनों को नहीं भूल पा रही है, जब सीएम पद की शपथ लेने के बाद योगी ने आदेश जारी किया था कि कोई जनप्रतिनिधि सचिवालय, पुलिस-चौकी नहीं जाएगा। योगी का फरमान था कि ब्यूरोक्रेसी अपने विवेकानुसार फैसले ले, इससे नाराज विधायकों को एक बार विधान सभा तक में अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करना पड़ गया था। करीब 150 विधायकों ने ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ विधान सभा में हो-हल्ला मचाया था। राजनीति के इतिहास में यह बड़ी घटना थी।
    
योगी सरकार टू की बात कि जाए तो चुस्त-दुरुस्त योगी सरकार के सामने एक बार फिर वही पुरानी समस्या खड़ी होती दिख रही है। योगी सरकार के पहले कार्यकाल में ब्यूरोक्रेसी पर तमाम आरोप लगे थे कि विधायकों, सांसदों से लेकर मंत्रियों तक की सुनवाई नहीं होती है। वही आरोप अब 100 दिन पूरा करने के बाद योगी सरकार 2.0 में भी सामने आने लगे हैं। राज्यमंत्री दिनेश खटीक का इस्तीफा इसी कड़ी का हिस्सा है। यह सब तब हो रहा है जबकि स्वयं सीएम योगी आदित्यनाथ अपने दूसरे कार्यकाल में लगातार नौकरशाही को कसने में लगे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में कई बड़े अफसरों पर गाज गिर चुकी है। अनुशासन को लेकर तमाम फरमान जारी हो रहे हैं। 
    
नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के तमाम विधायकों की तरफ से आरोप लगाए गए थे कि यूपी सरकार में ब्यूरोक्रेसी निरंकुश है। प्रदेश में लखनऊ से लेकर जिलों तक अफसर मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की बात को तवज्जो नहीं देते, उनके दिए गए सुझावों पर टालमटोल वाला रवैया अपनाते हैं। आईजीआरएस (इंटीग्रेटेड ग्रीवान्स रिड्रेसल सिस्टम), जिसे मुख्यमंत्री ने खुद पारदर्शिता बनाने के लिए बनवाया। जिसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति सीधे मुख्यमंत्री से शिकायत कर सकता है। इसी आईजीआरएस पर तमाम मंत्रियों, नेताओं ने अफसरों के खिलाफ शिकायत करनी शुरू कर दी। कानपुर के विधायक सुरेंद्र मैथानी, महोली एमएलए शशांक त्रिवेदी, लखनऊ में विधायक नीरज बोरा, बदायूं से धर्मेंद्र शाक्य, कासगंज एमएलए देवेंद्र प्रताप, बरेली एमएलए डॉ. अरुण कुमार से लेकर तत्कालीन राज्यमंत्री स्वाति सिंह और सांसद कौशल किशोर ने शिकायतें दर्ज कराईं। यूपी चुनावों के दौरान भी ये बात काफी चर्चा में रही थीं, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद बात शांत हो गई।

योगी सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह से ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ नाराजगी जताई थी, ऐसी नाराजगी शायद ही किसी और सरकार में देखने को मिली होगी। बीजेपी के ही पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के एक बयान को यहां उद्धृत करना जरूरी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ब्यूरोक्रेसी एक बेलगाम घोड़े जैसी है, इस बेलगाम घोड़े की सवारी वही घुड़सवार कर सकता है जिसकी रानों में दम होता है। यह और बात है कि कल्याण सिंह जब दूसरी बार सीएम बने थे तो वह भी ब्यूरोक्रेसी पर लगाम लगाने में असफल रहे थे।
   
बात बसपा राज की कि जाए तो उस समय ब्यूरोक्रेसी थर-थर कांपती थी। सीएम मायावती जो कहती थीं, ब्यूरोक्रेसी हां में हां मिलाती थी। माया राज में जो भी भ्रष्टाचार की खबरें आईं, उसमें बसपा सुप्रीमो का भी योगदान कम नहीं रहा था। चीनी मिल बिक्री घोटाला, ताज कॉरिडोर घोटाला इस बात का बड़ा प्रमाण है। वहीं ब्यूरोक्रेसी की सबसे खराब स्थिति सपा राज में देखने को मिलती थीं, सपा का अदना-सा कार्यकर्ता भी धड़धड़ाते हुए बड़े-बड़े अधिकारियों के दफ्तर में घुस कर अपना काम डंके की चोट पर करा लेता था।
खैर, योगी सरकार ने दूसरा कार्यकाल बड़े जोर-शोर से शुरू किया। खुद सीएम योगी एक तरफ काम में जुटे दिखे तो तमाम मंत्री भी औचक निरीक्षण के माध्यम से सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करते नजर आए। लेकिन 100 दिन का कार्यकाल पूरा करते-करते तस्वीर बदलने लगी। मंत्रियों के औचक निरीक्षण के बाद तमाम आरोप सामने आए कि मंत्री के कहने के बाद भी कोई एक्शन नहीं हुआ। इसी दौरान उत्तर प्रदेश में तबादला नीति जारी हुई। जिसके बाद बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य विभाग, पीडब्ल्यूडी सहित तमाम विभागों में तबादले हुए। तबादला होने के फौरन बाद ही भ्रष्टाचार की शिकायतें आनी शुरू हो गईं। मामले ने तब तूल पकड़ लिया, जब यूपी के डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने अपने ही विभाग में ही हुए तबादलों पर सवाल खड़े कर दिए। बृजेश पाठक ने इस संबंध में पत्र लिखकर अपर मुख्य सचिव अमित मोहन से जवाब-तलब कर लिया। उन्होंने कहा कि जो ट्रांसफर हुए हैं, उनमें तबादला नीति को पूरी तरह दरकिनार करने का आरोप है। एक ही जिले में तैनात पति-पत्नी को अलग-अलग जिला भेजा दिया गया, किसी अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी को नजरअंदाज कर वहां से भी डॉक्टर दूसरी जगह शिफ्ट कर दिए गए। स्थिति यह रही कि एक डॉक्टर का तो दो जिलों में तबादला कर दिया गया। तबादला नीति में मनमानी की खबर बृजेश पाठक के पत्र के सामने आने के बाद सुर्खियां बटोरने लगी। देखते ही देखते पीडब्ल्यूडी में भी हुए तबादलों पर सवाल खड़े हो गए।
जानकार कहते हैं कि बृजेश पाठक के इस पत्र को योगी सरकार द्वारा कहीं न कहीं ब्यूरोक्रैसी और जन प्रतिनिधियों के बीच टकराव के रूप में देखा गया। सवाल उठे कि अपने ही विभाग में तबादलों की जानकारी मंत्री को नहीं है? इसका जिम्मेदार कौन है? योगी सरकार द्वारा जांच कराई गई तो पता चला कि पीडब्ल्यूडी में हुए तबादले का फर्जीवाड़ा किया गया। मामले में फौरन एक्शन हुआ और पीडब्ल्यूडी मंत्र जितिन प्रसाद के ओएसडी अनिल पांडेय को दोषी मानते हुए उन्हें हटाने का फरमान जारी हो गया। दरअसल अनिल कुमार पांडेय भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति पर आए थे, उन्हें वापस भेजने के साथ ही उनके खिलाफ विजिलेंस जांच और विभागीय कार्रवाई की भी संस्तुति कर दी गई। ये भी बातें सामने आई कि जितिन प्रसाद ही अनिल पांडेय को लेकर आए थे, वो उनके करीबी माने जाते हैं। सवाल ये भी उठने लगे कि इस फर्जीवाड़े की जानकारी मंत्री को ही नहीं थी? 
    
अब दिनेश खटीक का इस्तीफा सामने आ गया है। उनके इस्तीफे पर गौर करें तो उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को संबोधित करते हुए पत्र लिखा है। राज्यपाल, सीएम या पार्टी अध्यक्ष को पत्र भेजने की बजाए गृह मंत्री को संबोधित पत्र लिखने के पीछे की सोच तो दिनेश खटीक ही बता सकते हैं। उनके पत्र पर गौर किया जाए तो उन्होंने यूपी की नौकरशाही पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं जो निरर्थक नहीं हैं। योगी सरकार को बेलगाम ब्यूरोक्रेसी पर लगाम लगाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने ही पड़ेंगे।

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