वर्तमान परिस्थितियों में दल बदल कानून भी पड़ गया है कमजोर ?

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रमेश सर्राफ धमोरा 

मौजूदा नियमों के मुताबिक किसी पार्टी के दो तिहाई व उससे अधिक विधायक एक साथ किसी अन्य पार्टी में विलय करते हैं तो उनकी सदस्यता बच जाती है। इसी का फायदा उठाकर राजनीतिक दलों द्वारा धड़ाधड़ दलबदल करवाया जा रहा है।

महाराष्ट्र में शिवसेना पार्टी के विधायकों द्वारा दलबदल करने के कारण मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सरकार को गिरा कर शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में नई सरकार के गठन के बाद देश का दल बदल निरोधक कानून अप्रासंगिक बनकर रह गया है। इस कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर सांसद, विधायक लगातार दल बदल कर रहे हैं। महाराष्ट्र की हालिया घटना के बाद पूरे देश में इस बात को लेकर जोरों से चर्चा है कि मौजूदा कानून दलबदल को रोक पाने में कमजोर साबित हो रहा है। इसे और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। ताकि दल बदल जैसे सत्ता बनाने बिगाड़ने के खेल पर रोक लग सके।

महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर हुए दलबदल में भी भाजपा की भूमिका खुलकर सामने आई है। इससे पूर्व भाजपा कर्नाटक व मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर विधायकों से दलबदल करवा कर वहां की सरकारों को अपदस्थ कर भाजपा की सरकार बनवा चुकी है। 2014 के बाद दलबदल का खेल कुछ अधिक ही खेले जाने लगा है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में पूरी सरकारों को ही अपदस्थ कर वहां भाजपा की सरकार बनवा दी गई थी। उसके बाद गोवा में बहुमत नहीं मिलने के बावजूद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को दरकिनार कर भाजपा की सरकार बनाई गई थी।

2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में पूर्ण बहुमत नहीं मिलने पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बसपा से चुनाव जीते सभी 6 विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवा कर बहुमत प्राप्त कर लिया था। हाल ही में बिहार विधानसभा में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पार्टी के 5 में से 4 विधायकों को दल बदल करवा कर राजद में शामिल करवा लिया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव कांग्रेस के अधिकांश विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करवा चुके हैं। सिक्किम में सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी के दस विधायक दलबदल कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। चर्चा है कि गोवा कांग्रेस के मौजूदा विधायक कभी भी भाजपा में जा सकते हैं।
मौजूदा नियमों के मुताबिक किसी पार्टी के दो तिहाई व उससे अधिक विधायक एक साथ किसी अन्य पार्टी में विलय करते हैं तो उनकी सदस्यता बच जाती है। इसी का फायदा उठाकर राजनीतिक दलों द्वारा धड़ाधड़ दलबदल करवाया जा रहा है। चुनावों के दौरान भी प्रदेशों में बड़े पैमाने पर विधायकों द्वारा दलबदल किया जाता है। हालांकि उस समय विधानसभाओं के चुनाव होने होते हैं ऐसे में दलबदल का सरकार की सेहत पर प्रभाव नहीं पड़ता है।
जनता द्वारा निर्वाचित सांसद या विधायक तो अपनी सुविधानुसार दल बदल कर सत्ता का लाभ प्राप्त कर लेता है। मगर ऐसे में उनको वोट देने वाले मतदाता खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगते हैं। किसी पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान कर चुनाव जिताने वाले लोगों को उस वक्त बड़ा झटका लगता है जब उन्हें पता लगता है कि उनके वोटों से जीता हुआ जनप्रतिनिधि उनके विरोधी दल की पार्टी में शामिल हो गया है। लगातार दल बदल की हो रही घटनाओं को लेकर लोगों में चर्चा है कि दल बदल विरोधी कानून को और अधिक मजबूत बनाया जाए ताकि जिस कार्यकाल के लिए जनप्रतिनिधि निर्वाचित हुआ है। उस कार्यकाल में वह दलबदल नहीं कर सके और यदि वह दलबदल करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाए।
अक्टूबर 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार दल बदलकर इस मुद्दे को राजनीति की मुख्यधारा में ला दिया था। उस दौर में आया राम गया राम की राजनीति देश में काफी प्रचलित हो चली थी। अंततः राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में दलबदल विरोधी कानून पारित कर इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में दलबदल की कुप्रथा को समाप्त करना था।

इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है। अगर एक निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है या कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है या किसी सदस्य द्वारा सदन में पार्टी के रुख के विपरीत वोट किया जाता है या कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग से अलग रखता है या छह महीने की अवधि के बाद कोई मनोनीत सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। मगर अगर किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें तो उनकी सदस्यता खत्म नहीं होगी।
2003 में इस कानून में संशोधन भी किया गया। जब ये कानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी मूल पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया गया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फायदा उठाया जा रहा है। इसलिए ये प्रावधान खत्म कर दिया गया। लगातार दलबदल से निपटने में कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए 2003 में दसवीं अनुसूची में संविधान में निन्यानवे संशोधन का प्रस्ताव किया गया था। 16 दिसंबर 2003 को लोकसभा द्वारा और 18 दिसंबर 2003 को राज्यसभा द्वारा यह बिल पारित किया गया था। 1 जनवरी 2004 को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई और संविधान (निन्यानवे संशोधन) अधिनियम- 2003 को 2 जनवरी 2004 को भारत के राजपत्र में अधिसूचित किया गया।
2003 के अधिनियम के अनुसार दलबदल विरोधी कानून में एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में या उसके साथ विलय करने की अनुमति दी गई है। बशर्ते कि उसके कम-से-कम दो-तिहाई सदस्य विलय के पक्ष में हों। इस प्रकार इस कानून के तहत एक बार अयोग्य सदस्य उसी सदन की किसी सीट पर किसी भी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ सकते हैं। दलबदल के आधार पर अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय के लिये मामले को सदन के सभापति या अध्यक्ष के पास भेजा जाता है जो कि न्यायिक समीक्षा के अधीन होता है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में संसद भवन में आयोजित पीठासीन अधिकारियों की बैठक में दल बदल विरोधी कानून को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। बैठक में तय हुआ कि इस पर अंतिम निर्णय से पहले सभी हित धारकों जैसे पीठासीन अधिकारियों, संवैधानिक विशेषज्ञों और कानूनी विद्वानों के साथ विचार विमर्श किया जाए। केन्द्र सरकार को शीघ्र ही दलबदल पर पूरी तरह से रोक लगाने की दिशा में प्रभावी कार्यवाही करनी चाहिये। सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिये जिसमें दल बदलने वाले सदस्य की सदस्यता हर हाल में समाप्त हो सके। तभी राजनीति में नासूर बन चुके दलबदल के खेल पर पूरी तरह रोक लग पायेगी।

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