सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आरक्षित वर्गों के गले की हड्डी ना बन जाये?

डॉ0 पुरूषोत्‍तम मीणा निरंकुश

 जाट जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग से बाहर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने आरक्षित वर्गों और जातियों के समक्ष अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। आगे लिखने से पूर्व यह साफ करना जरूरी है कि जाट जाति आरक्षण की पात्र है या नहीं? इस बात का निर्णय करने का मुझे कोई हक नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा जिन तर्कों के आधार पर जाट जाति को आरक्षित वर्गों की सूची से बाहर करने का फरमान सुनाया गया है, उसकी समीक्षा करने का हक हर एक नागरिक को है।

भारतीय न्यायपालिका के सामाजिक न्याय से जुड़े निर्णयों के इतिहास पर पर नजर डालें तो ये बात बार-बार प्रामाणित होती रही है कि सुप्रीम कोर्ट का रवैया आरक्षित वर्गों के प्रति संवेदनशील होने के बजाय अधिकतर मामलों में कठोर और नकारात्मक ही रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक बार आरक्षण को छीनने और कमजोर करने वाले निर्णय सुनाये हैं। जिन्हें भारत की संसद द्वारा अनेकों बार रद्द किया है। इसके बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट हर बार किसी न किसी नयी दलील के आधार पर आरक्षण को कमजोर करने या आरक्षित वार्गों के हितों को नष्ट करने वाले निर्णय सुनाता आ रहा है। जिसकी बहुत लम्बी सूची है। देराईराजन, ए आर बालाजी, इन्दिरा शाहनी जैसे प्रकरण सर्वविदित हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट ने जाट जाति के आरक्षण को गलत करार देते हुए अपने निर्णय में कही गयी कुल चार बातों को मीडिया द्वारा खूब उछाला जा रहा है। जिसके चलते अनेक आरक्षण विरोधी लेखकों की कलम की धार भी दूसरे आरक्षित वर्गों के प्रति भी पैनी और निष्ठुर हो गयी है। अत: मैं इन्हीं चार बातों पर विश्‍लेषण करना जरूरी समझाता हूँ :-

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि-‘‘केन्द्र सरकार का फैसला कई साल पुराने आंकड़ों पर आधारित है।’’ पहली नजर में सुप्रीम कोर्ट का तर्क सही है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूर्व में भी सवाल किया था कि जनसंख्या के नवीनतम जातिगत आंकड़ों के बिना किसी भी जाति या वर्ग को कितना प्रतिशत आरक्षण दिया जाये, इस बात का सरकार किस आधार पर निर्णय ले रही है? लेकिन इसके ठीक विपरीत जातिगत जनगणना करवाने के एक हाई कोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहते हुए रोक लगा दी कि जनसंख्या की जाति के आधार पर गणना करवाना या नहीं करवाना भारत सरकार का नीतिगत अधिकार है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करने का हक नहीं है। इससे यहाँ सवाल यह उठता है कि “सुप्रीम कोर्ट आखिर चाहता क्या है? जातिगत जनगणना करवाना या इस पर रोक लगाना?”

वहीं इसके ठीक विपरीत वर्तमान निर्णय में सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि-‘‘जाट सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्हें आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है।’’ इस टिप्पणी से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि “जब सरकार के पास जातिगत आंकड़ें उपलब्ध ही नहीं हैं। तो सुप्रीम कोर्ट किस आधार पर इस नतीजे पर पहुँचा है कि जाट जाति सामाजिक और आर्थिक रूप से सक्षम है? इससे यह पता चलता है कि न्यायपालिका में आरक्षण का प्रावधान नहीं होने के कारण और सुप्रीम कोर्ट में आर्यों का प्रभुत्व होने के कारण सुप्रीम कोर्ट मनुवादी मानसिकता से ग्रस्त है और कमजोर अनार्य तबकों के प्रति अपने निष्पक्ष नजरिये के प्रति निष्ठावान नहीं है।”

लगे हाथ सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना है कि-‘‘आरक्षण के लिए पिछड़ेपन का आधार सामाजिक होना चाहिए, न कि आर्थिक या शैक्षणिक।’’ यदि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार आर्थिक आधार पर ओबीसी आरक्षण नहीं दिया जा सकता तो फिर सुप्रीम कोर्ट की फुल संवैधानिक बैंच द्वारा इन्दिरा शाहनी के मामले में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ओबीसी) को नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण प्रदान करने को हरी झंडी क्यों दी गयी थी? इसके अलावा “सुप्रीम कोर्ट आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की मांग के समर्थन में हड़ताल करने वाले सरकारी कर्मचारी और अधिकारियों की असंवैधानिक हड़ताल को क्यों जायज ठहरा चुका है।”

 चौथी और सबसे खतरनाक बात सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि-‘‘ओबीसी में आरक्षण के लिए अब तक केवल जातियों को शामिल ही क्यों किया गया है, किसी जाति को इससे बाहर क्यों नहीं किया गया।’’ क्या सुप्रीम कोर्ट का यह रुख क्या सरकार के नीतिगत निर्णयों में खुला हस्तक्षेप नहीं है? एक ओर तो सुप्रीम कोर्ट सरकार के नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करने के बहाने जातिगत जनसंख्या की जनगणना करवाने के आदेश देने वाले हाई कोर्ट के निर्णय को स्थगित करता है, दूसरी ओर सवाल उठाता है कि आरक्षित वर्ग में शामिल जातियों को बाहर क्यों नहीं किया जाता है? मेरा सीधा सवाल यह है कि “क्या सुप्रीम कोर्ट के पास किसी जाति या वर्ग विशेष के बारे में ऐसे आंकड़े हैं, जिसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट को पहली नजर में यह निष्कर्ष निकालने का आधार उपलब्ध हो कि फलां जाति या वर्ग को आरक्षण की जरूरत नहीं है? निश्‍चय ही ऐसे आंकड़े नहीं हैं, फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रकार की टिप्पणी करना किस बात का द्योतक है?”

 सीधा और साफ मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट अपने विगत इतिहास की भांति आरक्षित वर्गों के प्रति संवेदनशील नहीं है और किसी न किसी प्रकार से आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने के लिये, ऐसे संकेत देता रहता है, जिससे मनुवादी ताकतें आरक्षित वर्गों के विरुद्ध आवाज उठाने को प्रेरित होती रहती हैं। जिससे एक बार फिर से हमारी यह मांग जायज सिद्ध होती है कि-“सामजिक न्याय की स्थापना के लिए न्यायपालिका में भी सभी वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चत किया जाना जरूरी है।”

 इन हालातों मेंं सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय को केवल जाट जाति का मामला मानकर हलके में नहीं लिया जाना चाहिये और सभी आरक्षित वर्गों को एकजुट होकर इस प्रकार के आरक्षण विरोधी निर्णयों के दूरगामी दुष्प्रभावों की तुरन्त समीक्षा करनी चाहिये, अन्यथा माधुरी पाटिल केस की भांति ऐसे निर्णय आरक्षित वर्गों के गले ही हड्डी बन जायेंगे।-

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