पाकिस्तान दिवस पर भारत का विरोध क्यों?

सुरेश हिन्दुस्थानी

वास्तव में पाकिस्तान विश्व का एक ऐसा देश है जिसका जन्म ही भारत के विरोध तथा भारत के विभाजन के साथ हुआ। वर्तमान में पाकिस्तान भले ही इस बात को भूल गया हो कि हमारा जन्म ही भारत से हुआ है, लेकिन भारत आज भी पाकिस्तान को समृद्धि के मार्ग पर लाने का प्रयास करता दिखाई देता है। हम जानते हैं कि पाकिस्तान का कोई भी कार्यक्रम हो उसमें भारत का विरोध नहीं होगा तो वह कार्यक्रम सफल नहीं माना जाता है, उसके पीछे निहितार्थ यही है कि वर्तमान में पाकिस्तान के मानस में कट्टरवादिता का जितना जहर है वह सब भारत के विरोध के लिए ही है। जबकि भारत हमेशा से ही पाकिस्तान की नाजायज हरकतों को भी एक बड़े भाई की तरह माफ करता दिखाई देता है।

अभी हाल ही में पाकिस्तान के उच्चायोग द्वारा किये गए पाकिस्तान समारोह में जिस प्रकार का दृश्य देखा गया, उसमें पाकिस्तान का उत्सव कम, भारत का विरोध ज्यादा देखा गया। एक तो पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित द्वारा भारत विरोधी कार्य करने वाले हुरियत के नेताओं को आमंत्रण दिया, दूसरे उस कार्यक्रम को पूरी तरह से भारत के विरोध पर आधारित कर दिया। कार्यक्रम के समय आतंकी नेता यासीन मलिक ने तो यह कहकर एक बार फिर से भारत विरोधी मानसिकता का परिचय दिया है कि कश्मीर के लोग भारत के नागरिक नहीं हैं, उनके बारे में यह तय किया जाना है कि वह किसके नागरिक हैं। यह कथन निश्चित ही अलगाव की भाषा ही कहा जाएगा, इससे बढ़कर यह प्रथम दृष्टया राष्ट्रविरोधी भी है। पूरा विश्व इस सत्य को जानता है कि संवैधानिक दृष्टि से कश्मीर आज भी भारत का अभिन्न अंग है।
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित का झुकाव कई बार अलगाववादियोंं की ओर दिखाई दे चुका है। इस मामले पर भारत ने हमेशा ही कठोर रवैया अपनाया है। उल्लेखनीय है कि कुछ माह पूर्व होने वाली सचिव स्तर की वार्ता को मात्र इसी एक कारण के चलते भारत ने रद्द कर दिया था। इसके बाद भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया।

अलगाववादी ताकतें हमेशा से ही भारत में उसी प्रकार की गतिविधियों को संचालित करती आई है, जो भारतीय समाज के लिए विरोधी हैं। अब सवाल यह भी आता है कि खुलेआम भारत विरोधी गतिविधि में संलग्न रहने वाले इन नेताओं से पाकिस्तान को इतना लगाव क्यों हैं? वर्तमान में पाकिस्तान मुंह में राम बगल में छुरी वाली कहावत को ही चरितार्थ कर रहा है। पाकिस्तान ने हमेशा से ही आतंकी और अलगाववादी ताकतों का समर्थन किया है, इससे बढ़कर वह हमेशा ही कश्मीर में भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थन करता हुआ दिखाई दिया। हम जानते हैं कि कश्मीर में अलगाववादी नेताओं ने वहां की जनता को गुमराह किया। कश्मीर में शांति व्यवस्था काश्म करने वाली सेना पर पथराव कराने में इन्हीं शक्तियों का हाथ कई बार प्रमाणित हो चुका है। इतना ही नहीं यह शक्तियां कश्मीर की जनता में हमेशा ही यह भ्रम फैलाने का काम करती हैं कि हम भारत के नागरिक नहीं हैं, हम सभी पाकिस्तान के समर्थक हैं।
अलगाववादी नेताओं का यह कृत्य निश्चित ही भारत विरोधी तो है ही, साथ ही असंवैधानिक भी। क्योंकि संविधान के अनुसार कश्मीर भारत का हिस्सा है। इसके अलावा पिछले विधानसभा चुनावों ने तो यह स्पष्ट भी कर दिया है कि कश्मीर की जनता अब भारत की मूल धारा से जुडऩा चाहती है। उसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं। परंतु सबसे मुख्य कारण यह माना जाता है कि वर्तमान में पाकिस्तान के हालात बहुत ही खराब हैं। आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान की व्यवस्था चरमरा गई है। कश्मीर की जनता आज इस सत्य को भी जान चुकी है कि कश्मीर के विकास में अगर कोई रुकावट है तो उसके लिए पाकिस्तान और उसके समर्थक पूरी तरह से दोषी हैं। कश्मीर की जनता को भारत की सरकार और सेना हितैषी लगने लगी है। उल्लेखनीय है कि जब कश्मीर में प्रलयंकारी बाढ़ के हालात निर्मित हो गए थे, तब उनके सहयोग के लिए न तो पाकिस्तान ने कोई दरियादिली दिखाई और न ही उसके समर्थक अलगाववादी ताकतों ने। इस गंभीर संकट के समय अलगाववादी नेता कहीं खो गए थे, या फिर सुरक्षित स्थान पर जाकर जम गए। विरोध सहने के बाद भी भारतीय सेनाओं ने बिना किसी पक्षपात के उनकी ऐसे मदद की जैसे ये लोग उनके अपने ही हों। मात्र इसी कारण से कश्मीर की जनता की दशा और दिशा आज बदली हुई है। जो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

पाकिस्तान दिवस पर जिस प्रकार से पाकिस्तान उच्चसयुक्त में कार्यक्रम किया गया, उसकी जितनी निन्दा की जाए उतनी कम ही होगी, क्योंकि वह कार्यक्रम पूरी तरह से भारत के विरोध पर ही आधारित था। इस कार्यक्रम को लेकर कांगे्रस की मानसिकता देखकर पता चलता है कि वह ऐसे संवेदनशील प्रकरण पर भी राजनीति करके सरकार पर दोषारोपण कर रही है। कांगे्रस नेता मनीष तिवारी पाकिस्तान दिवस पर हुए कार्यक्रम में शामिल होने पर विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह के पीछे ही पड़ गए, और उनसे इस्तीफा मांगने लगे। विदेश राज्य मंत्री का कार्यक्रम में शामिल होना तो सरकारी परंपरा का हिस्सा माना जा सकता है, जैसा कि पूर्व की सरकारों के समय से होता आया है। लेकिन वी के सिंह ने एक बात तो अच्छी की कि वे नाखुश वाले अंदाज में कुछ ही समय में कार्यक्रम छोड़कर चले आए। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह आता है कि कांगे्रस नेता मणिशंकर अय्यर उस कार्यक्रम में किस हैसियत से गए और अगर गए हैं तो कांगे्रस अय्यर पर इस प्रकार के सवाल क्यों नहीं उठा रही? वर्तमान में कांगे्रस में यही खराबी है, उनके लोगों ने किया तो अच्छा, दूसरा कोई वही काम करे तो वह गलत, ऐसा क्यों? क्या कांगे्रस के पास इस बात का जवाब है।

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