हृदय से निकलती शुक्रवार की प्रार्थना

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विजय मनोहर तिवारी

शुक्रवार की प्रार्थना सामान्य प्रार्थना नहीं है। वह परम प्रार्थना है। अत्यंत गुणकारी। तत्काल लाभप्रद।
सनातन संस्कृति में कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया ऋषियों ने खोजी थी। सात चक्र और उन्हें सक्रिय करने की विधियां ध्यान कहलाईं। आत्मसाधना की एक लंबी प्रक्रिया, जिसके माध्यम से सातवें चक्र तक पहुंचने में संभव है कई जन्म लग जाएँ। किंतु वह धीमी गति की निरापद प्रक्रिया है। होम्योपैथी या आयुर्वेद जैसे उपचार की, जिसमें औषधि के साथ पर्याप्त धैर्य और विश्वास की भी अपनी भूमिका होती है। किंतु शुक्रवार की परम प्रार्थना एलोपैथी का भी नेक्स्ट लेवल अल्ट्रा-एलोपैथी जैसी है। प्रार्थना गृह से निकलते ही व्यक्ति का रूपांतरण हो चुका होता है।
आकाशीय योजनाकार के प्रखर मस्तिष्क ने इस प्रार्थना में कुछ ऐसे तत्व डाले हैं, जो अप्रकट हैं। वह लोक कल्याण का एक अद्भुत आविष्कार है। शुक्रवार का शुभ मुहूर्त ग्रहों की सूक्ष्म गणना के उपरांत ही निर्धारित किया गया है। परम प्रार्थना की प्रक्रिया पूर्ण होते ही कुंडलिनी के सातों चक्रों में जैसे ग्रीस लग जाता है। वे टॉप गियर में सक्रिय होना आरंभ हो जाते हैं। किंतु अनुभवों से ऐसा प्रतीत होता है कि सॉफ्टवेयर में कुछ एरर होने से सारे चक्र क्लॉक-वाइज गति करने के स्थान पर एंटी क्लॉक वाइज घूमने लगते हैं।
पहले प्रथम चक्र यानी मूलाधार घरघराघट के साथ उल्टा सक्रिय होता है। वह दूसरे चक्र से एक पट्टे से बंधा होता है। आटा चक्की की तरह यह पट्टा गति आरंभ करके दूसरे चक्र को घुमाना आरंभ कर देता है। यही प्रक्रिया सातवें चक्र यानी सहस्त्रार तक चलती है। जब सातों चक्र विपरीत दिशा में संपूर्ण वेग से घूर्णन करते हैं तो यह किसी हाइड्रो पावर हाऊस के भीतर होने वाली वेगवान गतिविधि की अनुभूति में ले जाते हैं। सातवां चक्र जैसे ही अपने संपूर्ण वेग में आता है, साधक का तत्काल रूपांतरण हो जाता है।
परम प्रार्थना के अंतिम चरण में एक शक्तिशाली महामंत्र का सामूहिक उच्चार होता है। उक्त महामंत्र का हिंदी भाषा में अनुवाद है-‘परमात्मा सबसे महान् है।’ यह मंत्र एक जयघोष बन जाता है। आंतरिक ऊर्जा से लबालब भरे साधक जब प्रार्थना गृह से बाहर प्रकट होते हैं तो वे वही नहीं होते, जो अल्प समय पहले प्रार्थना गृह के भीतर मंगल प्रवेश कर रहे थे। बाहर आते ही उनकी आंतरिक ऊर्जा एक उग्र एवं उफनते समुद्र में परिवर्तित हो जाती है।
जैसे देवताओं के हाथों मंे भांति-भांति के अस्त्र प्रतिमाओं में दर्शनीय हैं, वैसे ही इन साधकों के कर कमलों में भांति-भांति के अस्त्राभूषण दिखाई देने लगते हैं। इनमें पाषाण खंडों का उपयोग सामान्य है और सरल है। वे इन्हीं की बौछारें करने लगते हैं। यह मानवता की ओर उनका स्वागत से भरा हुआ पहला चरण कमल है। कांच की शीशियाँ दूसरे प्रकार का अस्त्र हैं, जिनमें कोई ज्वलनशील तैलीय पदार्थ प्रकट होता है। वे लक्ष्य निर्धारत करके प्रहार आरंभ करते हैं और देखते ही देखते भूमि पर अग्नि और आकाश की ओर धुएं की गति आरंभ हो जाती है। इस बीच कुछ वरिष्ठ साधक उत्साहवर्द्धन के लिए ऊंचे स्वरों में जय घोष करते हैं, जिसका शुद्ध हिंदी में सरल अनुवाद है-‘परमात्मा सबसे महान् है।’
प्रार्थना गृहों से बाहर आने का यह प्रभावपूर्ण दृश्य अत्यंत मनोरम है। साधकों की ऊर्जा के विलक्षण दर्शन करने का सुयोग अब तकनीक ने मानवमात्र को उपलब्ध करा दिया है। कहीं कोई कैमरे से या मोबाइल नामक संयंत्र से इन दृश्यों को अपने भीतर समाहित कर, अदृश्य संचार किरणों के संजाल के माध्यम से संसार के कोने-कोने में पहुंचा देता है। टेलीविजन नामक संयंत्र में समाचार वीथिकाओं में लाल रंग के तीव्र प्रकाश में अप्सराएं सूचनाओं को प्रवाहित करने लग जाती हैं। सबसे ताजा सूचनाएं भारत नामक देश में उत्तरप्रदेश नामक राज्य के कानपुर नामक महानगर से आईं। दर्शक निमित्तमात्र हैं। सूचनाएं शाश्वत हैं। शुक्रवार की परम प्रार्थना अनंतकाल से अपने प्रभाव के दर्शन सुलभ करा रही थी। तकनीक ने इस दर्शन प्रक्रिया को गति दे दी है ताकि अन्याय की आग में झुलसती मानवता को शांतिपूर्वक रहने की प्रेरणा मिल सके। वे साधक शांतिदूत की भूमिका में अपने विचार के एक जीवंत आमंत्रण बन जाते हैं।
शुक्रवार की परम प्रार्थना में साधकों के दर्शन सब करते हैं। किंतु साधकों के पीछे मार्गदर्शन करने वाले परमज्ञानी पुरोहितों की भूमिका पर कोई चर्चा नहीं करता, जिनके उज्जवल मानस में आकाशीय योजनाओं का मास्टर प्लान संचित होता है। टेलीविजन की आधुनिक भाषा में इन्हें मास्टर माइंड भी संबोधित किया जा सकता है। ये पुरोहित मानवता के महाकल्याण में शताब्दियों से लीन हैं। उनके अमृत वचन परमात्मा की अंतिम घोषणाओं से लिए गए हैं। वे घोषणाएं पुरोहितों के मुखारविंद से निकलकर आदेश बन जाते हैं। ऐसे आदेश, जिन्हें तत्काल प्रभाव से लागू करना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया में परमात्मा ने समस्त नियमों को शिथिल कर दिया है।
ये पुरोहित एक लंबी पाठ्यक्रम प्रक्रिया के उपरांत दीक्षित होते हैं। वे बाल्यकाल से ही शास्त्र अध्ययन के लिए परमपीठों में भेज दिए जाते हैं। दस-बारह साल की अध्ययन प्रक्रिया के संपन्न होते ही उन्हें प्रार्थनागृहों में प्रवेश का अधिकार प्राप्त हो जाता है, जहां वे नित्य प्रति अपने साधकों को मार्ग दिखाते हैं और जीवन में शांति के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। प्रार्थनागृहों में प्राचीन काल से ही फव्वारे भी लगे होते हैं ताकि निकट का वातावरण सुरम्य रहे और साधक एकाग्रचित्त होकर लक्ष्य केंद्रित हो जाए। पुरोहितों ने स्वयं को मानवकल्याण के लिए समर्पित कर दिया है। किंतु शुक्रवार की परम प्रार्थना के प्रभावी प्रयोगों का परीक्षण सदैव नहीं किया जाता है। पुरोहितों को उनसे भी योग्य दूरदृष्टाओं की ओर से संकेत प्राप्त होते हैं। दैवीय संकेत मिलते ही साधकों के समूहों तक संदेश चले जाते हैं और सब श्वांस को रोककर शुक्रवार की प्रतीक्षा करते हैं।
विगत शुक्रवार को भारत नामक देश के उत्तरप्रदेश नामक राज्य में कानपुर नामक महानगर में वह प्रतीक्षा समाप्त हुई। संकेत आए। संदेश गए। नियत शुभ मुहूर्त में साधकों के समूह प्रार्थना में एकत्रित हुए। कुंडलिनी के सातों चक्रों की मोटर को चालू किया। एक-एक करके चक्र उल्टी दिशा में घरघराहट के साथ घूमना आरंभ हुए। जैसे ही सातवें चक्र ने गति पकड़ी, एक जयघोष हुआ, जिसका शुद्ध हिंदी में अनुवाद है-‘परमात्मा सबसे महान् है।’
जयघोष होते ही सीढ़ियों से उतरते साधक देवदुर्लभ मुद्रा में प्रकट हुए। साधना के सुफल स्वरूप भांति-भांति के अस्त्र उनके करकमलों में चमके। ऊर्जा का प्रवाह एक शांतिप्रिय समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हो गया। एक ऐसा समाज, जो इस अभागी धरती पर मानवता के विकास के लाखों वर्षों में पीढ़ियों के योगदान के बावजूद कहीं भी अब तक बन नहीं पाया है और आकाशीय योजनाकार के अनुसार जहां परमात्मा सबसे महान है…

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