हुक्‍मरानों की बदनीयती ने पाकिस्‍तान को बर्बाद कर दिया

indian pak flagतनवीर जाफरी

दक्षिण एशियाई क्षेत्र के दो प्रमुख देश भारत व पाकिस्तान के मध्य समय-समय पर सामने आने वाले आपसी रिश्तों के उतार-चढ़ाव प्रायरू पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं। 1947 में भारत के विभाजन के बाद अस्तित्व में आने वाले नवराष्ट्र पाकिस्तान ने अपने वजूद में आते ही कश्मीर को भारत से अलग करने की मंशा के साथ भारत से दुश्मनी मोल लेनी शुरु कर दी थी। पाकिस्तान शुरु से ही कश्मीर को भाारत से अलग करना चाह रहा है। परंतु इसे पाकिस्तान का दुर्भाग्य कहा जाए या भारत की कुशल व सक्षम राजनीति का परिणाम कि पाकिस्तान के लाख दुष्प्रयासों के बावजूद कश्मीर भारत से अभी तक अलग नहीं हो सका। जबकि पाकिस्तान अपने ही एक बड़े भूभाग को बांग्लादेश के रूप में गंवा बैठा। निश्चित रूप से 1971 में बांग्लादेश के अस्तित्व में आने के पीछे भारत का बहुत बड़ा योगदान है। परंतु इसे 1971 से पूर्व के पाकिस्तान हुक्मरानों की नाकामी ही कहा जाएगा कि वे बांग्लादेश की अवाम को पाकिस्तान के साथ एकजुट होकर रहने के लिए राजी नहीं कर सके। पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के बांग्लादेशी नागरिकों अथवा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ बरते गए सौतेले व्यवहार ने उन्हें बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया। उस समय भी पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश की धरती पर जुल्म व आतंक का एक ऐतिहासिक अध्याय लिखा था जिसका मुंह तोड़ जवाब भारतीय सेना अथवा बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी ने माकूल तरीके से दिया। नतीजतन पाकिस्तानी सेना को भारतीय सेना के समक्ष ऐतिहासिक आत्मसमर्पण करना पड़ा। निश्चित रूप से यह वह दौर भी था जबकि पाकिस्तान में बांग्लादेश के मोर्चे पर लड़ने के अतिरिक्त पूरे देश में लगभग शांति व स्थिरता का वातावरण था।

आज परिस्थितियां 1971 से बिल्कुल विभिन्न हैं। पाकिस्तान में चारों ओर असुरक्षा,दहशत,आतंकवाद व सांप्रदायिकता का वातावरण है। वजीरिस्तान के अधिकांश क्षेत्रों पर तालिबानों का नियंत्रण है तो लश्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठन पंजाब सूबे में अपना मुख्यालय बनाकर अपनी गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। जमाअत-उद-दावा प्रमुख हाफ़िज़ सईद कश्मीर की आजादी के नाम पर पूरे पाकिस्तान में घूम-घूम कर भारत विरोधी माहौल तैयार करने में लगा हुआ है। सूत्रों के अनुसार कई आतंकी संगठन आपस में एकजुट हो चुके हैं। और उनकी नजर पाकिस्तान स्थित परमाणु हथियारों पर लगी हुई है। पाकिस्तान में अब छोटी-मोटी आतंकी घटनाएं तो घटित होते सुनी ही नहीं जाती। बजाए इसके या तो मस्जिदों, जुलूसों व भीड़-भाड़ वाले इलाकों में आत्मघाती हमले अंजाम दिएजाते हैं या फिर सीधे तौर पर सैन्य ठिकानों को ही निशाना बनाया जाता है।

पेशावर में गत् वर्ष 16 दिसंबर को एक सैन्य स्कूल पर हुए आतंकी हमले ने तो पाकिस्तानी सेना को खुले तौर पर चुनौती दे डाली है। इतने संगीन व संवेदनशील दौर से गुजर रहे पाकिस्तान को इन हालात में सि$र्फ यह कोशिश करनी चाहिए कि वह अपनी पूरी शक्ति,सामर्थ्य व सलाहियत के साथ पाकिस्तान के भीतरी हालात को सामान्य करने कीे कोशिश करे। यही नहीं बल्कि उसे ऐसा करने के लिए अपने भारत जैसे पड़ोसी देश से यदि सहायता दरकार हो तो वह भी तलब करना चाहिए। परंतु पाकिस्तान के हुक्मरान खासतौर पर वहां की सेना व आईएसआई ऐसा करने के लिए बिल्कुल राजी नहीं। बजाए इसके वे अपनी नाकामियों व अक्षमता का ठीकरा समय-समय पर भारत के सिर फोड़ते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर ब्लूचिस्तान के लोग पिछले कई दशकों से अथवा यह कहा जाए कि 1947 के फौरन बाद से ही स्वयं को पाकिस्तान से अलग किए जाने की मांग करते रहे हैं। धर्म के नाम पर 1947 में पाकिस्तान के चतुर राजनीतिज्ञों ने बांग्लादेश की ही तरह ब्लूचिस्तान को भी अपने साथ शामिल रहने के लिए राजी कर लिया था।

भौगोलिक दृष्टि से अलग भूभाग होने के कारण पाकिस्तान, बांग्लादेश को तो लंबे समय तक अपने नियंत्रण में नहीं रख सका। परंतु ब्लूचिस्तान पर पाकिस्तान अभी भी ब्लूच नागरिकों की इच्छाओं के विपरीत नियंत्रण बनाए हुए है। और ब्लूचिस्तान में चल रही राजनैतिक उथल-पुथल तथा अलगाववादी आंदोलनों के लिए वह भारत को जिम्मेदार ठहराता रहता है। यही नहीं बल्कि पाकिस्तान की अनेक आतंकवादी घटनाएं जिनमें पाकिस्तानी आतंकवादी ही शरीक पाए जाते रहे हैं उनके लिए भी पाकिस्तान ने समय-समय पर भारत को ही जिम्मेदार ठहराया है। पाकिस्तान के पास इस तरह के कोई पुख्ता सुबूत नहीं हैं कि भारत का कोई संगठन अथवा यहां की कोई एजेंसी पाकिस्तान में आतंकवाद फैलाने का काम सक्रियता से अंजाम दे रही हो। जबकि भारत के पास ऐसे दर्जनों प्रमाण हैं जिसमें कि पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने भारत की संसद से लेकर दूसरे कई प्रमुख स्थानों, शहरों व धर्मस्थलों पर हमले किए हों।

ऐसे सैकड़ों आतंकवादी भारत में सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारे भी जा चुके हैं तथा गिरफ्तार भी किए गए हैं। संसद में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तो लाशें तक पाक शासकों ने स्वीकार नहीं कीं। मुंबई हमलों का गिरफ्तार किया गया अपराधी अजमल कसाब पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा भारत में आतंक फैलाए जाने का एक प्रमुख चेहरा था उसे भी पाक द्वारा पाकिस्तानी नागरिक मानने से इंकार करने की कोशिश की गई थी। इसी प्रकार कश्मीर में भी पाकिस्तान पूरी तरह से सक्रिय है। कश्मीर में आतंकियों की सीमा पार से घुसपैठ कराए जाने से लेकर कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन को हर प्रकार का नैतिक व अनैतिक समर्थन देने तक में पाकिस्तान की अहम व प्रमाणित भूमिका है। पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर पाकिस्तान के और कई इलाक़ो में भारत में आतंक व अस्थिरता फैलाने के लिए आतंकी प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे हैं।

उपरोक्त वातावरण के बीच कभी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होते व साड़ी व शाल का ‘सौहाद्र्रपूर्ण’ आदान-प्रदान करते नजर आते हैं। कभी सांस्कृतिक व साहित्यिक सहयोग बनाए जाने की खबरें दोनों देशों के मध्य सुनाई देती हैं। व्यापारिक रिश्ते भी मजबूत करने की बातें होती रहती हैं। और सही मायने में दोनों देशों के आम नागरिक जोकि अपनी निष्पक्ष सेाच रखते हैं वे तो हर हाल में दोनों देशों के मध्य मधुर रिश्ते चाहते हैं। भारत-पाक नागरिकों में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो भारत-नेपाल की तरह भारत-पाक के मध्य वीजा व्यवस्था को भी समाप्त करने का पक्षधर है। गीत-संगीत व फिल्मी क्षेत्र में भी दोनों देश एक-दूसरे से खुले सहयोग के इच्छुक हैं। परंतु क्या बिना परस्पर विश्वास बहाली के यह बातें संभव हैं। शायद हरगिज नहीं। तारीख गवाह है कि चाहे भारत-पाक के मध्य समझौता एक्सप्रेस चलाकर या प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लाहौर बस सेवा शुरु कर या फिर विदेश मंत्री अथवा विदेश सचिव स्तर की शिखर वार्ताएं कर संबंध सुधारने की जितनी भी कोशिशें क्यों न की गई हों परंतु पाकिस्तानी सेना व आईएसआई ने तथा इनके दबाव में पाक सरकार ने भी भारत को अपना विश्वसनीय पड़ोसी कभी भी स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि पिछले दिनों एक बार फिर पाकिस्तान के रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय में पाक सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ की अध्यक्षता में हुई कोर कमांडरों की बैठक में अपना रटा-रटाया आरोप पुनरूदोहराया गया कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है। यहां इस संदर्भ में 2011 में अमेरिकी सेना के तत्कालीन संयुक्त सैन्य प्रमुख माईक मुलेन की इस रिपोर्ट का हवाला देना जरूरी है जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क आईएसआई का असली साथी है। यानी पूरी दुनिया यह भलीभांति जानती है कि पाकिस्तान,भारत व अफगानिस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए किन संगठनों को प्रोत्साहित करता है व उन्हें पनाह देता है तथा किन संगठनों को स्वयं के लिए खतरा महसूस करते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई का स्वांग रचता है।

लिहाज़ा पाकिस्तान को अपनी स्वतंत्रता से लेकर अब तक के पूरे राजनैतिक हालात की समीक्षा कर यथाशीघ्र इस निर्णय पर पहुंच जाना चहिाए कि वहां के हुक्मरानों की बदनीयती व उनकी गलत नीतियों ने ही पाकिस्तान को कमजोर, रुसवा व बदनाम कर दिया है। भविष्य में भी यदि वे भारत के साथ पूरे विश्वास के साथ संबंध बहाल नहीं करते तो इसके बिना इन दोनों देशों के मध्य शांति की संभावना कतई नजर नहीं आती।

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