ऐसे मनहूस मैग्नाकार्टा का गुणगान किसलिए

बनवारी

इस जून के मध्य में भारत के अंगरेजी अखबारों में ऐसे अनेक लेख छपे, जिनमें मैग्नाकार्टा का गुणगान किया गया था। मैग्नाकार्टा उस राजकीय घोषणापत्र को कहते हैं, जिसे 15 जून, 1215 को इंग्लैंड के राजा जॉन ने जारी किया था। अंगरेजी जानने-समझने वाले कई अन्य देशों में भी इन दिनों मैग्नाकार्टा को लेकर कुछ लेख छपे और व्याख्यान आदि दिए गए। 1215 की राजकीय घोषणा के आठ सौ वर्ष बाद अनेक लोगों को उसकी याद करना उपयोगी लगा होगा। लेकिन ब्रिटेन या अमेरिका में भी उसका वैसा गुणगान शायद ही हुआ हो, जैसा हमारे यहां के अंगरेजी अखबारों में हुआ। अपने यहां के अंगरेजी अखबार अक्सर यूरोपीय बुद्धि और दृष्टिकोण के पोषक ही दिखाई देते हैं। मैग्नाकार्टा को समझने से पहले तत्कालीन ब्रिटेन की परिस्थिति को समझ लेना उपयोगी रहेगा। रोम साम्राज्य के बिखरने के साथ ही ब्रिटेन भी यूरोप के अन्य हिस्सों की तरह अराजकता की स्थिति में था। धीरे-धीरे उसे सैक्सनी से जर्मन योद्धाओं ने आकर विजित कर लिया और इस विजय के परिणामस्वरूप सैक्सनी के अभिजात वर्ग में परिवर्तित हुए योद्धाओं ने नए सिरे से फ्यूडल व्यवस्था खड़ी की।

फ्यूडल शब्द हमें अंगरेजी से ज्यों का त्यों ले लेना चाहिए, क्योंकि भारतीय भाषाओं में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जो उसकी व्यंजना दे सके। ग्यारहवीं शताब्दी में नार्मंडी के विलियम ने अपने दस हजार योद्धाओं के साथ इंग्लैंड पर आक्रमण किया। उसी समय नार्वे के राजा ने इंग्लैंड पर आक्रमण किया था। उसे पराजित करने के बाद इंग्लैंड का राजा अपनी सुदृढ़ स्थिति के बावजूद विलियम से हार गया और युद्ध में मारा गया।

इस विजय ने इंग्लैंड के इतिहास को एक नया मोड़ दिया। इंग्लैंड मामूली जनसंख्या वाला एक छोटा-सा देश था। विलियम ने अपने बचे आठ हजार साथियों के अनुमोदन से अपने आपको इंग्लैंड का राजा घोषित कर दिया। लेकिन देश के अन्य भागों में सैक्सन सामंतों के विद्रोह को दबाने में विलियम को कई साल लग गए, पर धीरे-धीरे उसने लगभग सभी सैक्सनों को हरा कर नॉर्मंनों को सत्ता के सभी स्थानों पर बैठा दिया।

सैक्सन अभिजात वर्ग के अधिकांश लोग वैजंतिया राज्य या यूरोप के अन्य क्षेत्रों में पलायन कर गए। जिन भी नगरों में विलियम का विरोध हुआ था वहां नगर की आबादी को मौत के घाट उतार दिया गया। अपने से समर्पण करने वाले लंदन सहित कई नगरों का भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ, क्योंकि विजेताओं को धन लूटना था। इस तरह अपनी स्थिति निरापद करने के बाद विलियम और उसके उत्तराधिकारी अगले दो सौ वर्ष अपना तीन चौथाई समय फ्रांस या नॉर्मंडी में बिताते रहे और राज फ्यूडल तंत्र के भरोसे रहा। यूरोप के इतिहासकारों ने भारतीय राज्य-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए असावधानी या चतुराईपूर्वक भारत में भी फ्यूडलिज्म ढूंढऩे का प्रयत्न किया है। माक्र्सवादी इतिहासकारों ने तो राजा द्वारा मान्यम के रूप में स्थानांतरित किए गए राजस्व में अपना भाग भी फ्यूडलिज्म के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। इसलिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ब्रिटेन का उस समय का और एक तरह से समूचे यूरोप का फ्यूडलिज्म था क्या।

फ्यूडलिज्म की मूल बात यह है कि अपने शासित क्षेत्र में सभी तरह का आर्थिक स्वामित्व और राजनीतिक अधिकार राजा का होता था। वह सभी तरह की सत्ता का केंद्र था और तंत्र के शेष सभी लोगों को उसमें निष्ठा दिखानी पड़ती थी। इस निष्ठा के फलस्वरूप राजा को दी जाने वाली सेवाओं के बदले वे राजा के प्रतिनिधि के रूप में कुछ राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों का उपभोग कर सकते थे। भारत में राजा अधिकार देने वाला नहीं, पाने वाला रहा है। वह दूसरों को उनकी सेवाओं के बदले राजस्व में भाग देता नहीं था, अपनी सेवाओं के बदले राजस्व में भाग पाता था। वह विधि बनाता नहीं था, उसकी रक्षा करता था।

फ्यूडल शासन का स्वरूप मूलत: सैनिक था। राजा के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति बैरन होता था, जिसे किसी क्षेत्र विशेष का सर्वप्रमुख असामी घोषित किया जाता था। उसे राजा द्वारा निश्चित टैक्स राजकोष में जमा करना होता था और युद्ध के समय एक निश्चित संख्या में सैनिक राजा को उपलब्ध करने होते थे। राजा और उसके बीच जो संबंध था वही बैरन और उसके नीचे के तंत्र के बीच क्रमश: स्थापित कर दिया जाता था। इसकी निचली कड़ी नाइट या मैनर का स्वामी था। हर मैनर में उसके स्वामी के लिए खेती करने वाले सर्फ (भूदास) होते थे। बदले में उन्हें खेती के छोटे-छोटे भूखंड दे दिए जाते थे, जिनकी उपज का और सर्फ की अन्य आय का आधा भाग मैनर स्वामी को देना होता था। इंग्लैंड की अधिकांश जनसंख्या, लगभग पचासी प्रतिशत सर्फ थी। उनका वर्णन करते हुए मध्यकालीन यूरोप के एक लेखक ने कहा है कि अपने पेट के अलावा उनका किसी वस्तु पर कोई अधिकार नहीं होता था। अपने कपड़े-लत्तों पर भी नहीं, क्योंकि वे भी उन्हें अपने स्वामी से मिलते थे। पूरे इंग्लैंड में तेरह-चौदह प्रतिशत पट्टेदार किसान भी थे, जिन्हें एक निश्चित अवधि के लिए जमीन जोतने के लिए दी जाती थी और उन्हें अपनी उपज का एक बड़ा भाग राजकोष में जमा करना होता था। शहर शेरिफ के अधीन थे और शहर के लोग गिल्ड के या व्यवसायियों के अधीन होते थे। अरिस्टोक्रेसी भी, जो जनसंख्या का एक-डेढ़ प्रतिशत भाग ही थी, पूरी तरह स्वतंत्र नहीं थी। उसकी स्वतंत्रता और उसके अधिकार राजा की कृपा पर ही निर्भर थे। इंग्लैंड के राजा को उन दिनों फ्रांस के राजा के साथ निरंतर युद्ध में उलझना पड़ रहा था। इन युद्धों में राजकोष खाली होता रहता था और राजा को अधिक टैक्स के लिए बैरनों पर दबाव डालना पड़ता था। जो बैरन राजा की आज्ञा की अवहेलना करते थे, उन्हें विद्रोही घोषित करके पद से हटा दिया जाता था। अक्सर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाता था। बैरन आपस में एक-दूसरे से ईष्र्या-द्वेष में पड़े रहते थे, इसलिए जब तक कोई विद्रोह सफल न हो जाए राजा की इच्छा पूर्ति के लिए वे विवश थे। इंग्लैंड के राजा को रोमन चर्च का संरक्षण प्राप्त था। वह अपने आपको पोप का सामंत बताता रहता था और बैरन जब विद्रोह करते थे उन्हें दबाने के लिए वह चर्च के दबाव का उपयोग करता था और कई बार उन्हें चर्च से निष्कासित करवा देता था। इन्हीं परिस्थितियों में 1215 में इंग्लैंड के राजा जॉन ने बैरनों से अधिक टैक्स की मांग की। जॉन की स्थिति कमजोर थी, इसलिए लगभग आधे बैरन विद्रोह पर उतर आए। उनके दबाव में राजा को यह घोषणा करनी पड़ी कि आगे वह अपनी मनमर्जी से टैक्स नहीं बढ़ाएगा, बैरन को अनुचित तरीके से गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, चर्च के कुछ अधिकार सीमित किए जाएंगे और पंद्रह विद्रोही बैरन एक परिषद में लिए जाएंगे, जो परिषद राजा को परामर्श देने का कार्य करेगी। इस घोषणा को मैग्नाकार्टा कहा गया। इस तरह अधिक टैक्स पाने के लिए राजा ने अपने बैरनों को कुछ राजनीतिक अधिकार प्रदान किए थे। इस घोषणा का बैरनों के अलावा किसी और के अधिकारों से कोई संबंध नहीं था। बाद में दोनों ही पक्ष इस घोषणा से पीछे हट गए। राजा और विद्रोही बैरनों के बीच युद्ध हुए, जिनमें राजा की सेना जीत गई। पर राजा और बैरनों के बीच खींचतान चलती रही। अगली कई शताब्दियों तक हर राजा मैग्नाकार्टा का एक नया संस्करण जारी करता रहा। कभी उसे गंभीरता से लिया गया कभी नहीं। लेकिन मूल रूप से यह अधिक टैक्स के बदले समय-समय पर बैरनों को दी गई राजनीतिक छूट थी।

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