“सेकुलरिज्म” का झुनझुना बजाने वाले शायद देश मे कुछ ऐसा माहौल बनाने के चक्कर मे नज़र आ रहे हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय का कोई व्यक्ति अगर अपना काम ठीक से ना करे और उसके लिये अगर उसका विरोध भी किया जाये तो वह उसके साथ खड़े नज़र आयेंगे और उसके “निकम्मेपन” को “सेकुलरिज्म” की आड़ मे छिपाने की पूरी कोशिश करेंगे। यही “सेकुलरिज्म” के ठेकेदार तब अपनी जुबान पर ताले जड लेते हैं जब अमरनाथ यात्रा पर जा रहे यात्रियों के साथ भयंकर लूटपाट और बदसलूकी होती है।

जिस जायज मुददे को लेकर शिवसेना सांसद अपना विरोध व्यक्त कर रहा थे, उस मुददे को तो ठंडे बस्ते मे डाल दिया जाये और “सेकुलरिज्म” की आड़ मे शिकायतकर्ता सांसद को ही कटघरे मे खड़ा कर दिया जाये। सांसद के अलावा और भी लोगों की यह आम शिकायत रही है कि दिल्ली स्थित महाराष्ट्र भवन मे खिलाया जाने वाला खाना बेहद घटिया होता है और उसकी लिखित शिकायत भी कई बार की जा चुकी थी बाबजूद इसके खाने की गुणवत्ता सुधरने की बजाये दिन ब दिन गिरती ही जाये तो आम तौर पर किसी को भी गुस्सा आना स्वाभाविक है लेकिन “सेकुलरिज्म” का पाखंड करने वाले ऐसे थोड़े ही मानने वाले हैं। बड़ी मुश्किल से तो उन्हे बड़े दिनो बाद कोई ऐसा मुददा मिला है जिस पर वह अपनी राजनीति चमका सकें-सो उस मुद्दे को ऐसे बैठे बिठाये हाथ से कैसे जाने देंगे।

अल्पसंखयक समुदाय के एक निकम्मे कर्मचारी की भर्त्सना करने के बजाये जिस तरीके के सांसद की भर्त्सना की जा रही है-वह निश्चित रूप से चिंता का विषय है-सांसद ने अपनी बदसलूकी के लिये माफी मांगी है-क्या यह निकम्मा कर्मचारी जो लोगों को लगातार घटिता दर्जे का खाना खिला रहा था, अपने निकम्मेपन के लिये कभी किसी से माफी मांगेगा-उसका जबाब है – “कभी नही” क्योंकि उसके आका तो इस देश मे सेकुलरिज्म की राजनीति कर रहे है और वह यह सुनिश्चित करेंगे कि शिवसेना के सांसद को तो कडी से कडी सज़ा मिले लेकिन निकम्मा कर्मचारी पूरी तरह से सही सलामत रहे क्योंकि उसी के बल बूते पर तो इन्हे अपनी राजनीति चमकानी होती है। “सेकुलरिज्म” के इन ठेकेदारों ने इस वेवजह के मुद्दे को संसद मे भी उछाला और लोकसभा स्पीकर को यहाँ तक कह दिया कि यह घटना “सेकुलरिज्म” पर हमला है। अगर यह घटना “सेकुलरिज्म” पर हमला है तो अमरनाथ यात्रियों पर हुये हमले और लूटपाट को कौन सा हमला कहा जायेगा?

सेकुलरिज्म के इन पाखंडियों के हाथों मे खेल रहा मीडिया का एक वर्ग भी इनके सुर मे सुर मिलाने के लिये मजबूर नज़र आ रहा है क्योंकि पिछले लगभग 60 सालों मे जब इन सेक्युलर लोगों की सरकारें देश मे रहीं तो इन लोगों ने भी खूब मलाई काटी थी और वह मलाई अब छिन चुकी है और उसी बौखलाहट मे कुछ तथाकथित “राष्‍ट्रीय” समाचार पत्र और टी वी चैनल इस खबर को “रोटी के साथ नमक मिर्च लगाकर” पेश कर रहे हैं।

नीतू सिंह

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