अध्यात्म, देवत्व व भौतिकता का अद्भुत समन्वयक वसंतोत्सव -अशोक “प्रवृद्ध”

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शीतातंक के अपसार हो चलने के पश्चात जराजीर्ण शिशिर का का बहिष्कार करते हुए वसंत ऋतु ने समस्त वसुंधरा सहित मानव मन के ह्रदय पटल पर एक साथ अपने आगमन की दुदुम्भि बजा दी है। मधुमाधवौ वसंत: स्यात् -की उक्ति को चरितार्थ करते हुए वनस्पतियों में नवीन रस का संचार ऊपर की ओर हो रहा है, और प्राणियों के शरीरों में भी नवीन रुधिर का प्रादुर्भाव हिलोरें मारने लगा है। चहुँओर उमंग और उल्लास के बढ़ने के साथ ही प्रकृति देवी का यह महोत्सव ऋतुराज वसंत के स्वागत्त के लिए 40 दिवस पूर्व ही आरंभ हो जाता है। जब प्रकृति ही सर्वतोभाव के रस से तृप्त होकर ऋतुनायक के स्वागत के लिए तत्पर है तो उसी के पंचभूतों- भूमि, गगन, वायु, आकाश व नीर से रचित रस स्तवन को उद्यत हुआ मानव मन विभिन्न जीवनी-दायक रसों से परिपूर्ण वसंत के शुभागमन से बहिर्मुख बन भला कैसे रह सकता है?
सृष्टि के इस पुनीत समारोह को ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 17, मंत्र 7 में अंकित ईश्वर आज्ञा – सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते। अर्थात देवत्व भाव को प्राप्त हुए यज्ञकर्ता विद्वानों के समान अंतरिक्षस्थ वाणी को पुष्ट करने के लिए हम सबके द्वारा भी सम्मिलित होकर हवन-यज्ञ करते हुए परमात्मा से प्रार्थना करना ही उत्तम है। ऐसी शुभ आध्यात्मिक दृष्टिकोण के आलोक में अठ्ठारहवीं शताब्दी में धर्म ध्वजा की न्याय-पूर्ण रक्षार्थ अपने प्राणों का उत्कर्ष कर देने वाले वीर हक़ीक़त राय व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती लक्ष्मी देवी के बलिदान की अविस्मरणीय घटना से प्रेरणा लेते हुए इस पवित्र, मंगलमय बेला में विश्व कल्याण के के निमित्त राष्ट्र-संस्कृति-सभ्यता-धर्म हितार्थ विभिन्न आयोजनों के माध्यम से ईश्वर प्रदत्त अनुकम्पा प्राप्त कर पुण्यार्जित करने का प्रयास करना चाहिए, और उनके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रेषित करते हुए यह प्रण लिया जाना चाहिए कि इस धरा पर निवास करते हुए कभी भी आततायी शक्तियों के आगे समर्पण नहीं किया जायेगा व हर मूल्य पर वेदों के द्वारा प्रतिपादित मानवीय धर्म की रक्षा की जायेगी।

पौराणिक मान्यताओं में ऋतुओं में सर्वप्रधान मानी जाने वाली हेमंत और ग्रीष्म के बीच की ऋतु वसंत ऋतु माघ के दूसरे पक्ष से प्रारम्भ होकर चैत के प्रथम पक्ष तक की मानी गई है। माघ सुदी अर्थात शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाने वाला वसंतपंचमी का पर्व इस ऋतु के आगमन का सूचक होता है। इसे वसंतोत्सव, मदनोत्सव आदि नाम से भी जाना जाता है।
उल्लेखनीय है कि आध्यात्मिक रस से परिपूर्ण शालीनता के वातावरण में हवन-यज्ञ में वैदिक मंत्रों से जड़ व चेतन देवों की पुष्टि के निमित्त श्रद्धा पूर्वक आहुतियाँ अग्नि देव को समर्पित कर समारोहपूर्वक मनाई जाने वाली समारोह वसंतोत्सव है।
आध्यात्मिकता व देवत्व भाव लिए भौतिकता के इस अद्भुत समन्वयक वसंतोत्सव में हवि आदि अन्न समिधा की सामग्रियों की आहुति से तृप्त प्रकृत्ति के द्वारा ऐसी सुखप्रद वातावरण उपलब्ध कराने के प्रत्ति धन्यवाद ज्ञापन प्रदर्शन करने के लिए भारत में अतिप्राचीन वैदिक परिपाटी है। ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 17, मंत्र 8 में कहा गया है-
सरस्वती या सरथं ययाथ स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ति।
आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयसवानमीवा इष आ धेह्यस्मे।।
– ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 17, मंत्र 8
अर्थात- ये जो अंतरिक्षस्थ वाणी निरंतर वेद स्तवन के साथ गतिमान रहती है, ये दिव्य वाणी है। और ये हवि आदि अन्न तथा यज्ञ देवों के साथ अपना भाग लेकर तृप्त होती हुई अपना कार्य करती है। यही वाणी हमारे यज्ञ अर्थात अंतरिक्ष में स्थित होकर चराचर जगत को वर्षा के द्वारा तृप्त करती है और हम सबक़ों रोगमुक्त अन्न देती है। वसंत ऋतु में यही प्रकृति में व्याप्त वर्षा रुपी अमृत स्थावर वनस्पतियों में ऊपर तक रस भर देता है एवं जंगम प्राणियों में नव रक्त का संचार करके उमंग भर देता है। इसी उद्देश्य के निमित वेद मंत्रों में निहित भावों के उच्चारण के साथ घृत व सुगंधित पदार्थों से निर्मित सामग्री से अग्नि में उचित परिमाण के साथ आहुतियाँ देने का प्रावधान है ताकि समग्र आभा मंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो जाये और नकारात्मक प्रभावों का तिरोहण हो जाये। यह भी ध्यातव्य है कि वसंत ऋतु में पतंग उर्ध्वगामिता एवं यज्ञ कुंड के प्रतीक के रुप में उड़ायी जातीं हैं। वैदिक समाजवाद के उद्घोष- समाना प्रपा सह वो अन्न-भाग: समाने योक्रे सह वा युनज्मि । अर्थात राष्ट्र के सब प्राणियों को एक-सा खाने को मिले, एक-सा पीने को मिले, किसी को किसी बात की कमी ना रहे। वसंत काल में समता का यह भाव मनुष्य में ईश्वर द्वारा रचित सृष्टि के आत्म-तत्व के अवलोकन से सहज रुप में भर जाता है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय उपखंड के देशों की षडऋतुओं में से एक वसंत ऋतु आंग्ल कैलेंडर के अनुसार फरवरी- मार्च और अप्रैल के मध्य अपना अनुपम सौन्दर्य बिखेरते हुए पदार्पण करती है। फाल्गुन व चैत्र मास वसंत ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार वर्ष का अंत और प्रारंभ वसंत में ही होता है। वसंत के पदार्पण के साथ ही सर्दी अपनी शीत चादर समेटने लगता है, मौसम रंगीन व सुहावना होने लगता है, पेड़ों में नवीन कोंपलें आने लगती हैं, आम के बृक्ष आम्रमंजरों से लद जाते हैं और खेत खलिहान सब सरसों के फूलों से भरे पीलामय दृष्टिगोचर होने लगते हैं। इसीलिए राग- रंग और उत्सव मनाने के लिए इस काल को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए इसे ऋतुराज की संज्ञा प्रदान की गई है। ऋतुओं का राजा वसंत का प्रारम्भ माघ महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी से माना गया है। इस दिन वसंत का मुख्योत्सव मनाया जाता है। कला, ज्ञान व विद्या के देवी वाक् सरस्वती की आराधना- उपासना भी इस दिन की जाती है।
वसन्त ऋतु में वातावरण का तापमान प्रायः सुखद रहता है। भारत में यह फरवरी से मार्च तक होती है। अन्य देशों में यह विभिन्न समयों पर हो सकती है। इस ऋतु की विशेषता ही यह है कि मौसम गरम होने लगता है, फूल खिलने लगते हैं, पौधे हरे- भरे लगने लगते हैं और पहाड़ों में वर्फ पिघलना शुरू हो जाते हैं। भारत का मुख्य त्योहार होली भी वसन्त ऋतु में मनाया जाता है। तापमान की दृष्टि से सन्तुलित इस मौसम में चतुर्दिक हरियाली होती है, पेड़ों पर नए पत्ते उग आते हैं और मौसम के शौक़ीन जन उद्यानों और तड़ागों में क्रीड़ाशील रहते हैं।

पुरातन ग्रन्थों में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है। वसंत ऋतु का वर्णन करते हुए पुराणों में कहा है कि रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति झूम उठती है, पेड़ उसके लिए नव पल्लव का पालना डालते है, फूल वस्त्र पहनाते हैं पवन झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है। षोडश कलायुक्त योगीश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा श्रीमद्भागवद्गीता में स्वयं को ऋतुओं में वसंत होने का उद्घोष किये जाने से ही वसंत की महता का पता चलता है। इस ऋतु में वसंत पंचमी, शिवरात्रि तथा होली आदि पर्व मुख्यतः मनाये जाते हैं। भारतीय संगीत साहित्य और कला में इसे महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हुए संगीत में एक विशेष राग वसंत के नाम पर बनाया गया है जिसे राग बसंत कहते हैं। संगीत में छः मुख्य रागों में से एक जो विशेष रूप से वसंत ऋतु में गाया जाता है। वसंत राग पर चित्र भी बनाये जाते हैं। स्वच्छ आकाश वाले वसंत ऋतु में वायु सुहावनी, अग्नि अर्थात सूर्य रुचिकर, जल पीयूष समान सुखदाता और धरती साकार सौंदर्य की देवी की साक्षात दर्शन कराने वाली प्रतीत होने लगती है। ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु वसंत काल में पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं। ठंड से ठिठुरे विहंग जहाँ इस ऋतू में उड़ने का बहाना ढूंढते हैं वहीं कृषक लहलहाती जौ की बालियों और सरसों के फूलों को देखकर फूले नहीं समाते। धनी जहाँ प्रकृति के नवसौंदर्य को देखने की लालसा प्रकट करने लगते हैं, तो निर्धन शिशिर की प्रताड़ना से मुक्त होने के सुख की अनुभूति करने लगते हैं। सच ही, पुनर्जन्म होने के कारण समस्त प्रकृति ही वसंत ऋतु में उन्मादी हो जाती है। श्रावण की पनपी हरियाली शरद के बाद हेमन्त और शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है, तब वसंत उसका सौन्दर्य पुनः वापस लौटा देता है, नवगात, नवपल्ल्व, नवकुसुम के साथ नवगंध का उपहार देकर वसंत प्रकृति को विलक्षणा बना देता है। ऐसे में वसंत का स्वागत्त हवि आदि अन्न समिधा की सामग्रियों की आहुति से करना प्रकृत्ति के द्वारा ऐसी सुखप्रद वातावरण उपलब्ध कराने के प्रत्ति धन्यवाद ज्ञापन प्रदर्शन एक आध्यात्मिकता व देवत्व भाव और भौतिकता का समन्वय ही है।

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