पुस्तक समीक्षा :  ‘अथ विश्वविद्यालय गाथा’

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‘अथ विश्वविद्यालय गाथा’ के लेखक प्रोफेसर किशोरी लाल व्यास नीलकंठ हैं,। जिन्होंने यह  उपन्यास आज के विश्वविद्यालयों की यथार्थ स्थिति को चित्रित करते हुए बहुत ही सुंदर शैली में लिखा है।  वास्तव में शिक्षा के केंद्रों से जब गिरी हुई पतित शिक्षा मिलने लगे तो स्थिति बहुत चिंताजनक हो जाती है और यह पुस्तक बस इसी बात को स्पष्ट करने के लिए लिखी गई है।
विद्वान लेखक ‘पुरोवाक’ में ही स्पष्ट लिखते हैं कि जिस शिक्षा में सारे मूल्य समाप्त हो चुके हैं ,चाकू -छुरे, पिस्तौल, दादागिरी, मारामारी, गुटबाजी, जबरदस्ती, नेतागिरी, खानपान, भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार का बोलबाला ही रह गया है, उस शिक्षा के लिए करोड़ों रुपयों का धन खर्च करना कहां तक उचित है ?जहां ग्रामीण स्कूलों में बच्चों के सिर पर छत नहीं पानी पीने की व्यवस्था नहीं, बाथरुम नहीं, अध्यापकों की व्यवस्था नहीं, बच्चे बच्चियां व्यवस्था के अभाव में पढ़ना छोड़ देते हैं, ऐसे में उच्च शिक्षा पर करोड़ों का खर्च कर उन्हें मुफ्त में सारी सुविधाएं मुहैया कराना कहां तक न्यायोचित है ?”
    इन शब्दों से स्पष्ट होता है कि नीलकंठ जी ने इस उपन्यास में समाज की दुखती रग पर हाथ रखा है। वास्तव में इस समय देश के प्रत्येक चिंतनशील व्यक्ति को विश्वविद्यालयों की बिगड़ती हुई व्यवस्था पर कुछ ऐसा ही अनुभव हो रहा है जैसा कि लेखक ने कहा है। किस प्रकार झूठी डिग्रियां बांटी जाती हैं ? किस प्रकार शोधपत्र चोरी करके पढ़ दिया जाते हैं ? कैसे पीएचडी की डिग्री मिल जाती है या किस किस प्रकार की धांधलेबाजियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी विद्यालयों में या विश्वविद्यालय में रहकर समझ लेते हैं ? इस उपन्यास को पढ़कर यह बहुत गहराई से स्पष्ट हो जाता है। सचमुच चिंता का विषय है कि जहां उच्च शिक्षा के नाम पर ऐसी तुच्छ बातें सीखने समझने को मिल रही हों वहां का भविष्य कैसा होगा ?
  वास्तव में साहित्य उसी को कहते हैं जो देश – धर्म की रक्षा करने वाला हो, समकालीन नेतृत्व और समाज के लोगों को जगाने वाला हो ,मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वाला हो और जो कुछ पवित्र है उसको सबके लिए स्वीकार्य और जो अपवित्र है उसे सबके लिए त्याज्य घोषित करने की क्षमता रखता हो।
इस दृष्टिकोण से समझने पर इस पुस्तक के विषय में यह कहा जा सकता है कि प्रोफ़ेसर किशोरी लाल व्यास ‘नीलकंठ’ जी अपने मंतव्य को लोगों तक पहुंचाने में पूर्णतया सफल रहे हैं। उनकी अनेकों पुस्तकें उपन्यास के रूप में इससे पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं। लेखक के द्वारा बहुत ही सहज सरल भाषा में अपनी बात को उपन्यासात्मक शैली में प्रकट करने का सफल प्रयास किया गया है। जिसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।
  यह पुस्तक ग्रंथ विकास सी-37 बर्फखाना , राजा पार्क, जयपुर द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक प्राप्ति के लिए 0141- 2322 382 व 2310785 दूरभाष पर संपर्क किया जा सकता है। पुस्तक कुल 126 पृष्ठों में लिखी गई है। पुस्तक का मूल्य ₹250 हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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