16 संस्कारों में से एक यज्ञोपवीत संस्कार का वैज्ञानिक रहस्य

images (32)

डॉ. ओमप्रकाश पांडे

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। सप्ताह में सात दिन होते हैं तो नौ त्योहार होते हैं। सभी त्योहारों को हम सामान्य तौर पर चार विभागों में बाँट सकते हैं। कुछ त्योहार राष्ट्रीय प्रकृति के होते हैं, कुछ सामाजिक प्रकृति के, कुछ पारिवारिक और कुछ व्यक्तिगत प्रकार के त्योहार होते हैं। इन भेदों के आधार पर ही उन्हें पर्व, उत्सव, सम्मेलन और समारोह कहा जाता है। राष्ट्रीय त्योहार पर्व कहे जाते हैं, सामाजिक त्योहार उत्सव कहे जाते हैं, पारिवारिक त्योहार सम्मेलन होते हैं और व्यक्तिगत त्योहार समारोह कहे जाते हैं। राष्ट्रीय त्योहार यानी कि पर्व भी चार प्रकार के हैं – आत्ममूलक, शक्तिमूलक, अन्नमूलक और देहमूलक। आत्ममूलक पर्व श्रावणी पर्व है जिसे सामान्य जगत में रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है। इस दिन श्रावणी उपाकर्म किया जाता है। इसी दिन बालक विद्यालय या गुरुकुल में प्रवेश पाता था। शारदीय नवरात्र शक्तिमूलक पर्व है। इसमें अस्त्र-शस्त्र की पूजा होती है। दीपावली अन्नमूलक पर्व है। इसमें धन-धान्य देने वाली लक्ष्मी की पूजा की जाती है। होली या रंगोत्सव देहमूलक पर्व है। इसमें शरीर के स्वास्थ्य के लिए रंगोपचार करते हैं। ये चार ही राष्ट्रीय पर्व हैं। आज मनाए जाने वाले स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि राष्ट्रीय कहे जाने वाले पर्व वास्तव में राजनैतिक त्योहार हैं। भारतीय संस्कृति और धार्मिक आधार पर रक्षा बंधन, शारदीय नवरात्र, दीपावली और होली ही राष्ट्रीय पर्व हैं।
पर्वों की श्रृंखला में पहला आत्ममूलक पर्व श्रावणी उपाकर्म है। चूँकि इस समय विद्यार्थी गुरुकुल जाता है तो उसको इस समय यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। यज्ञोपवीत के लिए पारस्कर गृह्यसूत्र के दूसरे कांड के दूसरे अध्याय का 11वां मंत्र है – यज्ञोवीतम् परमंपवित्रम्, प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रम् प्रतिमुञ्चशुभ्रम्, यज्ञोपवीतम् बलमस्तुतेज:।। इसका तात्पर्य है कि यज्ञोपवीत शुभ्र यानी सफेद होना चाहिए, पीला या केसरिया रंग का नहीं। साथ ही कहा गया है कि यज्ञोपवीत साधारण पवित्र नहीं, बल्कि परमपवित्र है। प्रजापति ने भी इसे धारण किया था और उस समय से ही इसे धारण करने की प्रथा चल रही है। प्रजापति ब्रह्मा तो किसी रूप-आकार में है नहीं, तो उसने इसे कैसे धारण किया था?
हम जानते हैं कि यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे यानी जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में भी है। ब्रह्मांड में प्रजापति ने संवत्सर यानी वर्ष को धारण किया है। इसलिए उसे संवत्सर प्रजापति कहा गया है। सूर्य इसका मस्तक है, अंतरिक्ष उसका हृदय है और भूमि उसकी कटि या पाद स्थान है। हालांकि सूर्य स्थिर है, परंतु पृथिवी की परिक्रमा के कारण सूर्य की तीन गतियां हैं। एक तो वह उत्तरायण होता है, फिर वर्ष में दो बार वह समभाव में रहता है यानी दिन-रात बराबर होते हैं और तीसरी गति में सूर्य दक्षिणायन होता है। यह सारी गति 48 अंश कोण में ही होती है। सूर्य के विषुव रेखा से 24 अंश ऊपर और 24 अंश नीचे ही यह सारी गति होती है। सूर्य जब एकदम उत्तर में होता है और वहाँ से नीचे आता है तो वह दक्षिणायन गति होती है और जब मकर राशि से उत्तर की ओर गति करने पर उसे उत्तरायण कहते हैं जिसे मकर संक्रांति त्योहार के नाम से मनाया भी जाता है।
संवत्सर को यज्ञस्वरूप कहा गया है। यह पवित्र है। इससे ही दिन और रात होते हैं। यज्ञस्वरूप होने के कारण इसमें अग्नि और सोम दोनों होंगे। यहाँ सूर्य अग्नि है और चंद्रमा सोम है। संवत्सर यज्ञ में इन दोनों का संयोग होता है। पृथिवी द्वारा सूर्य के परिक्रमा के पथ को क्रांति वृत्त कहा जाता है। उसमें 12 महीने और 12 राशियां होती हैं। हरेक महीने में सूर्य दूसरी राशि में जाता दिखता है। इसे ही क्रांति कहते हैं। हरेक महीना तीस अंश का होता है। चंद्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता है और उसका परिक्रमा पथ 27 नक्षत्रों में बांटा गया है। इसे दक्षवृत्त कहा जाता है। इसलिए इन नक्षत्रों को दक्ष की कन्याएं कहा जाता है। संवत्सर प्रजापति अयण, ऋतु, माह, वार और तिथियों के क्रम से ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि को समेटते हुए एक सूत्र को धारण करता है। यही प्रजापति का यज्ञोपवीत है। हमारा यज्ञोपवीत भी प्रतीक रूप में इन सभी को धारण करता है।
संवत्सर प्रजाप्रति में सूर्य मस्तक है, अंतरिक्ष हृदय है और पृथिवी कटिस्थान है। मनुष्य यज्ञोपवीत धारण करता है तो वह भी स्कंध पर से हृदय से होते हुए कटि स्थान पर रहता है। स्कंध शीर्ष है और साथ ही भार वहन करने का आधार भी है। हृदय संकल्प और श्रद्धा का स्थान है। कटि कटिबद्धता का प्रतीक है और गांठ प्रतिज्ञा का सूचक है। संकल्प, श्रद्धा, कटिबद्धता और प्रतिज्ञा के साथ समाज का भार वहन करने को ही यज्ञोपवीत परिभाषित करता है।
दक्षवृत्त में उत्तर, मध्यम और दक्षिण रूपी तीन विभाग होते हैं। इन्हें ही मार्ग कहा गया है। दक्षिण मार्ग सबसे छोटा है, इसलिए यह चार अंशों का होता है, मध्यम मार्ग आठ अंश का और उत्तर मार्ग 12 अंश का होता है। हर मार्ग में तीन-तीन गलियां हैं जिन्हें वीथी कहा जाता है।। प्रत्येक वीथी में तीन-तीन नक्षत्र हैं। उत्तर मार्ग में पहली वीथी का नाम है नाग वीथी और इसमें तीन नक्षत्र हैं – अश्विनी, भरणी और कृतिका। दूसरी वीथी का नाम है गज और इसमें तीन नक्षत्र हैं – रोहिणी, मार्गशिर्ष और आद्रा। तीसरी ऐरावत वीथी है और इसमें तीन नक्षत्र हैं – पुनर्वसु, पुष्य और अश्लेषा। मध्य मार्ग के तीन वीथी हैं। पहली है आर्ष वीथी और इसमें नक्षत्र हैं – मघा, पूर्व फाल्गुनी और उत्तर फाल्गुनी। दूसरी गोवीथी में तीन नक्षत्र हैं – हस्त, चित्रा और स्वाति। तीसरी जरद् गव वीथी में तीन नक्षत्र हैं – विशाखा, अनुराधा और ज्येष्ठा। दक्षिण मार्ग की पहली वीथी को अज कहते हैं और इसमें तीन नक्षत्र हैं – मूल, पूर्व आषाढ़, उत्तर आषाढ़। दूसरी मृग वीथी में तीन नक्षत्र हैं – श्रवण, धनिष्ठा और शतविशा। तीसरी वैश्य-वानर वीथी में तीन नक्षत्र हैं – पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती।
दक्षवृत्त भले ही अलग-अलग वीथियों में बंटा हो, पर मूलत: एक ही रेखा है। इसी प्रकार मनुष्य द्वारा पहने जाना वाला यज्ञसूत्र भी एक ही सूत्र होगा। फिर जिस प्रकार संवत्सर सूत्र में तीन मार्ग हैं, ठीक उसी प्रकार यज्ञसूत्र को भी तीन गुणा कर किया जाता है। तीन मार्गों में नौ वीथियां हैं। इसलिए सूत्र को भी तीन गुना कर दिया जाता है जिससे इसमें नौ धागे हो जाते हैं। नौ वीथियों में 27 नक्षत्र होते हैं, इसी प्रकार तीन बार त्रिगुणित किए गए नौ धागे वाले एक सूत्र के तीन लपेटे लिए जाने से इसमें 27 धागे हो जाते हैं और यह 27 नक्षत्रों का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार यह यज्ञसूत्र संवत्सर प्रजापति का प्रतीक बन जाता है। यहाँ हमे यह ध्यान रखना चाहिए कि यज्ञसूत्र हमेशा तीन सूत्रों का ही होना चाहिए। आज बहुधा लोग छह सूत्रों का पहन लेते हैं, यह गलत है। वे वस्तुत: स्त्रियों के बदले में भीयज्ञसूत्र धारण कर लेते हैं जोकि सरासर गलत है।
यज्ञसूत्र का एक सूत्र 96 अंगुल का होता है। इसका माप यही है कि 96 अंगुल का सूत कातकर उसका त्रिगुणीकरण किया जाए। कहा गया है – तिथिवारश्च नक्षत्रम्, तत्वंवृत्तभाग मार्गत्रयम्। कालत्रयं च मासश्च, ब्रह्मसूत्र हि षडषडनव। तिथियां 15 होती हैं, वार सात हैं, 28 नक्षत्र (27 नक्षत्र + एक अपराजिता नक्षत्र), तत्व 24 हैं, वृत्तभाग चार होते हैं (360 अंश के 90-90 अंश के चार भाग)। एक भाग पर चित्रा नक्षत्र, दूसरे पर रेवती, तीसरे पर श्रवण और चौथे पर पुनर्वसु नक्षत्र होता है। इसे ही एक वेदमंत्र में कहा गया है – स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा: स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:। स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमि: स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ पूरब दिशा में वृद्धश्रवा चित्रा नक्षत्र है, पश्चिम दिशा में रेवती, उत्तर में श्रवण और दक्षिण दिशा में पुनर्वसु है। पुनर्वसु वृहस्पति का नक्षत्र है। चार वृत्तभाग के बाद मार्गत्रय यानी तीन मार्ग, तीन काल, 12 महीने हैं। इन सभी अंकों को जोडऩे से 96 भाव हो जाता है। यही 96 भाव के 96 अंगुल का एक सूत्र है।
इस प्रकार यज्ञोपवीत संवत्सर का प्रतीक है। जब आप सूर्य के सम्मुख होते हैं तो बायां हिस्सा उत्तर और दायां दक्षिण दिशा होता है। जिस समय सूर्य उत्तरायण होंगे, उस समय संवस्तर प्रजापति के बाएं भाग में होगा। इसी प्रकार यज्ञोपवीत का शीर्ष स्थान मनुष्य के बाएं कंधे पर होगा और दाहिने कटि पर उसकी ग्रंथि होगी। जब सूर्य दक्षिणायण होगा, तब यज्ञोपवीत दाहिने कंधे पर रहेगा और उसकी ग्रंथि बाएं कटि पर होगी। उत्तरायण को हमने देवकाल और दक्षिणायण को पितरकाल माना है। पितरकाल में यज्ञोपवीत हमेशा दाहिने कंधे पर होता है और देवकाल में बाएं कंधे पर होता है। जब वह बाएं कंधे पर होगा और दाहिने कटि पर उसकी ग्रंथि होगी, तब उसे हम उपवीत कहते हैं। अभी यज्ञ को छोड़ दें। यह वास्तव में उपवीत है। उप यानी समीप और वीत यानी प्राप्त होना। जब यह दाहिने कंधे पर होगा तो उसे प्राचीनावीत कहते हैं। पितर तो प्राचीन होते हैं, इसलिए प्राचीनावीत। जब सूर्य समभाव में होगा तो उस समय खेती के सभी श्रमिक कार्य कर लेते हैं। जब हम मनुष्य कर्म करते हैं, तब न उत्तरायण होता है न दक्षिणायण। उस समय सूर्य मध्य भाग में विषुव पर होता है। इसलिए उस समय यज्ञोपवीत न तो दाएं कंधे पर होगा और न ही बाएं कंधे पर, बल्कि वह माला की भांति गले में धारण किया जाएगा। जिस समय हम मानुषी परिश्रम का कार्य करते हैं, तो उस समय यज्ञोपवीत माला की भांति गले में पहना जाएगा। उसे नीवीतम् कहा जाता है।
तैत्तिरीय ब्राह्मण के दूसरे कांड के पाँचवे अध्याय के ग्यारहवें प्रपाठक का पहला (2/5/11/1) मंत्र है नीवीतम् मनुष्याणां, प्राचीनावीतंपितृणां, उपवीतं देवानां। प्रजापति के संवत्सर सूत्र के अनुसार ही मनुष्य भी इस यज्ञसूत्र को धारण करता है। इसलिए प्राकृतिक भाव में जो गति है, ठीक उसी प्रकार यज्ञोपवीत का भी हम स्थान परिवर्तित करते हैं। आज लोग इस विज्ञान को नहीं जानने के कारण केवल बाएं कंधे पर वर्ष भर धारण किए रहते हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि इसके तीन नाम हैं – उपवीत, प्राचीनावीत और नीवीत। ये तीनों यज्ञ के लिए ही हैं। यज्ञ का काफी व्यापक अर्थ है। मानुषी श्रम भी एक यज्ञ है, पितरों यानी पूर्वजों के लिए चिंतन तथा कर्म करना भी एक यज्ञ है और प्राकृतिक शक्ति के लिए किया जाने वाला कर्म भी यज्ञ है। इन सभी यज्ञों में इसे धारण किया जाता है और उसे तीनों अवसरों पर तीन अलग प्रकार से पहना जाता है और उसके तीन नाम भी हैं। यह वास्तव में यज्ञसूत्र है। अज्ञानतावश इसे यज्ञोपवीत कह दिया जाता है, परंतु यह यज्ञसूत्र है और इसके तीन नाम हैं। नामों के अनुसार इसे तीन प्रकार से पहना जाता है। यही इसका वैज्ञानिक आधार है।
देश में जब जातिभेद इतना प्रबल नहीं था, तो इसे सभी वर्गों के लोग धारण किया करते थे। हमें स्मरण होगा कि आज से 40-50 वर्ष पहले तक खेतों में काम करने वाले मजदूर आदि भी गले में सूत्र धारण किया करते थे। चूँकि वे शारीरिक श्रम कर रहे होते थे, इसलिए उनका गले में धारण करना उचित था। शारीरिक श्रम करते समय गले से कमर तक लटका सूत्र बाधा बनता है। इसलिए उसे उस समय गले में ही पहनना होता है। इसी प्रकार वैदिक काल में स्त्रियां भी इसे धारण करती थीं। वास्तव में यज्ञसूत्र तो मनुष्य मात्र के लिए है। जबसे हमारे यहाँ आक्रांताओं का आगमन हुआ, तबसे हमारा परंपरागत ज्ञान छिन्न-भिन्न हो गया। तब से ही ये परंपराएं संकुचित होने लगीं।
चूँकि यह यज्ञसूत्र पूरे संवत्सर का प्रतीक है इसलिए यह ज्ञान से जुड़ा और गुरुकुलों में प्रवेश के समय इसे पहनना आवश्यक बना दिया गया। संवत्सर पुरुष प्रजापति की ही भांति मनुष्य भी सामाजिक दायित्वों का वहन करे, यही इस यज्ञसूत्र की शिक्षा है। इसलिए ही ब्रह्मचारियों को यह सूत्र धारण करवाया जाता था और उसे इसको धारण करने के तरीके की भी शिक्षा दी जाती थी। इस शिक्षा से वह ब्रह्मांड का पूरा विज्ञान जान-समझ जाता था। यही इस यज्ञसूत्र का शैक्षणिक महत्व है।

Comment:

vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betnano giriş
vdcasino
Vdcasino giriş
vdcasino giriş
ngsbahis
ngsbahis
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
casibom giriş
casibom giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
runtobet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş