जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के प्रयासों में भी सम्मिलित रहे थे सरदार पटेल

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अवधेश कुमार

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में जम्मू-कश्मीर से कार्यसमिति के सदस्य तारिक हामिद कर्रा ने जिस तरह सरदार पटेल की आलोचना करते हुए कहा कि कश्मीर पर वह उदासीन थे और यह कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने त्वरित पहल नहीं की होती तो वह पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता, उससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता। हैरत की बात है कि तारिक हामिद ने जब बोलना शुरू किया तो किसी ने उन्हें टोका तक नहीं। हां, उनके बोलने के बाद कुछ सदस्यों ने जरूर कहा कि ऐसी बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि सरदार पटेल हैदराबाद से लेकर जूनागढ़ तक के देसी रियासतों के विलय को अंजाम दे रहे थे।

बेतुका आरोप
पटेल जैसे व्यक्ति पर कश्मीर के प्रति उदासीन होने का आरोप लगाना उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को ही कटघरे में खड़ा करना है। हालांकि लंबे समय से एक तबका यह साबित करने का प्रयास करता रहा है कि पटेल जम्मू-कश्मीर को भारत में रखना ही नहीं चाहते थे। सर्वपल्ली गोपाल ने पं. नेहरू की आत्मकथा पुस्तक में यही साबित करने का प्रयास किया था। राजेंद्र सरीन ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान- द इंडिया फैक्टर’ में लिखा है कि पटेल ने पाकिस्तान के मंत्री सरदार अब्दुल रब निश्तार से बात करते हुए कहा कि ‘भाई, हैदराबाद और जूनागढ़ पर बातचीत छोड़ो…। कश्मीर ले लो और मुद्दे को सेटल करो।’ सरीन ने पाकिस्तान संविधान सभा के एक सदस्य सरदार शौकत हयात को उद‌्धृत किया है, जो उनके अनुसार लॉर्ड माउंटबेटन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच बातचीत के समय उपस्थित थे। इसके अनुसार माउंटबेटन ने लियाकत अली को पटेल का यह संदेश दिया कि पाकिस्तान हैदराबाद से बाहर हो जाए तो भारत कश्मीर छोड़ देगा। इसके अनुसार जून 1947 में माउंटबेटन ने कश्मीर के महाराजा हरि सिंह से कहा कि अगर वह पाकिस्तान में विलय कर लेते हैं तो भारत इसका विरोध नहीं करेगा, हमें पटेल ने स्वयं इसके लिए आश्वस्त किया है।

गृहमंत्री, सूचना व प्रसारण मंत्री और राज्यों से संबंधित मामलों का मंत्री होने के नाते सरदार पटेल जम्मू-कश्मीर मामले को भी देखते थे। बाद में जम्मू-कश्मीर मामले को प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू स्वयं देखने लगे। जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पं. रामचंद्र काक को 3 जुलाई, 1947 को लिखे पत्र में पटेल कहते हैं, ‘मैं कश्मीर की विशेष कठिनाइयों को समझता हूं, किंतु इतिहास और पारंपरिक रीति-रिवाजों आदि को ध्यान में रखते हुए मेरे विचार से जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ही नहीं है।’
भविष्य का ध्यान रखते हुए सरदार पटेल ने महाराजा हरि सिंह के साथ अच्छे संबंध बनाए थे और उन्हीं की सलाह से महाराजा ने पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मेहरचंद महाजन को रामचंद्र काक की जगह प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। जम्मू-कश्मीर के सामरिक महत्व को देखते हुए सरदार पटेल उसका भारत में विलय चाहते थे। माउंटबेटन ने जरूर यह आश्वासन दिया कि यदि कश्मीर पाकिस्तान के साथ विलय करना चाहे तो भारत समस्या खड़ी नहीं करेगा। सरदार पटेल ने ऐसा आश्वासन नहीं दिया था। बस, योजनाबद्ध तरीके से वह चुप रहे क्योंकि उस समय यही समयोचित था। आगे स्वयं कांग्रेस के नेताओं ने यह मत प्रकट किया कि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती तो हैदराबाद की तरह यह समस्या भी स्थायी रूप से सुलझ जाती। सरदार पटेल ने एच.वी. कामत को बताया था कि ‘यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप न करते और उसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह ही इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा लेता।’

जब स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तानी कश्मीर में घुसैपठ करने जा रहे हैं और सेना को भी घुसाने की योजना है तो 27 सितंबर, 1947 को नेहरू जी ने सरदार से कहा, ‘मैंने प्रधानमंत्री महाजन को भी परिस्थिति से अवगत करा दिया है, किंतु उनके मन में क्या है इसका पता नहीं चल सका है। महाराजा और महाजन के लिए आपकी सलाह अधिक प्रभावी रहेगी।’ सरदार पटेल ने महाराजा हरि सिंह और प्रधानमंत्री महाजन को समझाया कि आपके पास भारतीय संघ में विलय का ही विकल्प है। इस बीच समाचार मिला कि पाकिस्तानी हमलावरों ने कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया है और आगे बढ़ रहे हैं। भारत सरकार ने इस पर सेना को कश्मीर भेजने का निर्णय लिया।
सेना भेजने के निर्णय में पटेल की भूमिका को नकारा जाता है। एस. गोपाल ने लिखा है कि सेना भेजने का निर्णय मंत्रिमंडल का था। हालांकि लगभग पूरा मंत्रिमंडल अनिर्णय की स्थिति में था। बक्शी गुलाम मोहम्मद शेख अब्दुल्ला के सहायक थे और दिल्ली की बैठक में उपस्थित थे। वह लिखते हैं कि ‘लॉर्ड माउंटबेटन की अध्यक्षता में हुई बैठक में पंडितजी, सरदार पटेल, रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ सर राय बुकर, कमांडर-इन-चीफ जनरल रसेल, आर्मी कमांडर और मैं उपस्थित थे। जनरल बुकर ने जोर देकर कहा कि उनके पास संसाधन इतने कम हैं कि राज्य को सैनिक सहायता देना संभव नहीं। माउंटबेटन ने निरुत्साहपूर्ण झिझक दर्शाई। पंडितजी ने तीव्र उत्सुकता और शंका प्रकट की।
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दो टूक फैसला
बक्शी के अनुसार पटेल चुपचाप सब कुछ सुन रहे थे। सहसा सरदार हिले और कठोर एवं दृढ़ स्वर में अपना विचार व्यक्त किया, ‘जनरल हर कीमत पर कश्मीर की रक्षा करनी होगी। संसाधन हैं या नहीं, आपको यह तुरंत करना चाहिए। सरकार आपकी हर प्रकार की सहायता करेगी। यह अवश्य होना और होना ही चाहिए।’ जनरल के चेहरे पर उत्तेजना के भाव दिखाई दिए। जनरल की इच्छा आशंका जताने की रही होगी, किंतु सरदार चुपचाप उठे और बोले, ‘हवाई जहाज से सामान पहुंचाने की तैयारी सुबह तक कर ली जाएगी।’
इस तरह जम्मू-कश्मीर की रक्षा सरदार पटेल की चारित्रिक दृढ़ता और त्वरित निर्णय लेने और सबको निर्णय के साथ रहने के लिए तैयार करने की उनकी क्षमता के कारण संभव हो सकी। वह हर हाल में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय चाहते थे और प्रधानमंत्री द्वारा इस मामले को अपने हाथों में ले लिए जाने के बावजूद उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।

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