सपने साकार होते हैं तो कैसा लगता है आसमान

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अमिताभ स.

सयाने बताते हैं कि जिंदगी में स्वप्न और बीज की सबसे बड़ी अहमियत है। हालांकि दोनों बेशक एक मामूली विचार बिंदु बन कर मन में उभरते हैं, लेकिन इनमें बहुत बड़ा करने की असीम सम्भावनाएं होती हैं। वास्तव में, दोनों का चरित्र या प्रकृति एक समान है। अमेरिकी लेखक नेपोलियन हिल इसे यूं समझाते हैं, ‘जिंदगी में जो भी अवसर चाहिए, वह पहले कल्पना में उपजते हैं। कल्पना इनसान के मस्तिष्क की कार्यशाला होती है, जो मन की ऊर्जा को सिद्धि और फिर धन में तबदील करने का दमखम रखती है।’ यानी हर सफलता और धन-समृद्धि अर्जित करने का जन्म एक बीज रूपी सूक्ष्म विचार से होता है। इसलिए अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को हासिल करने के लिए एक निश्चित योजना बनाएं और तुरंत ही इसे क्रियान्वित करने में जुट जाएं।

सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, ‘आपके पास कोई योजना है, यह अच्छी बात है। लेकिन आपके पास किसी मकसद का होना ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर आपके पास कोई मकसद है, तो योजनाएं खुद-ब-खुद बनेंगी और जाहिर होती जाएंगी।’ सुखी या दुखी जीवन इनसान के विचारों का ही नतीजा है। कह सकते हैं कि विचारों में इनसान की ज़िंदगी बदलने की क्षमता होती है। यदि दिमाग़ पुराने विचारों से भरा है, और विचार आपके नहीं, किसी और के हैं तो दिमाग़ को बदलिए। यही विकास लाएगा। उद्योगपति डी. आर. टाटा का मानना है, ‘सफलता की राह में हमारी अधिकतर समस्याएं योजना के ख़राब अमल, ग़लत वरीयताओं और बेहद कठिन लक्ष्यों के कारण होती हैं।’ इसलिए समझदारी यही है कि छोटे-छोटे लक्ष्य तय करते जाएं और उन्हें हासिल करने के बाद, फिर नए लक्ष्य निर्धारित करते जाएं। जैसे सबसे बड़े वृक्ष भी एक छोटे-से बीज से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही सबसे बड़े विचार, प्रारंभ में सबसे सरल होते हैं। केवल अतीत पर गर्व करना तब तक व्यर्थ है, जब तक उससे प्रेरणा लेकर भविष्य का निर्माण न किया जाए।

इसीलिए कहते हैं कि मंशा होने की अहमियत है। अपनी सम्भावनाओं में विकसित होने के लिए कतई जरूरी नहीं कि कोई जबरदस्त जानकारी, योग्यता और क्षमता से सम्पन्न हो, बल्कि इसके लिए बस इतना चाहिए कि जो भी करें, उसके प्रति पूर्णतः समर्पित हों। सच है कि बीज उगाते ही फल नहीं लगते। निरंतर आगे बढ़ते रहें, पहले से बेहतर करते रहें। कभी न कभी स्वयं का बेहतर रूप जरूर बन जाएंगे। सच है कि दिलोदिमाग़ में ख़ूबसूरत ख्याल बोने से ही अपना जीवन खुशनुमा बना सकते हैं। ज्यादातर लोग अपनी नौकरी, कार, घर, दोस्त और अपना हमसफर समेत हर चीज बदलते रहते हैं। लेकिन खुद के विचारों को नहीं बदलते, न बदलने की कोशिश करते हैं। नतीजतन सुकून उड़ जाता है, घोर चिंताओं की दलदल में धंस जाते हैं और हर पहलू के प्रति नकारात्मक रवैया बनने लगता है। कबीर के दोहे का यही सार है ‘चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह/जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहंशाह।’ वास्तव में, बाहरी नहीं, बल्कि अंदरुनी विचारधारा के बदलावों की जरूरत होती है।

लोहे को कोई नष्ट नहीं कर सकता, सिवाय उसके अपने जंग के। इनसान को भी केवल उसकी मानसिकता तबाह करती है। सारी परेशानियां हालात से ज्यादा इनसानी सोच से उत्पन्न होती हैं। इसीलिए ख्यालात या विचार बदलते ही हालात बदलने लगते हैं। ओशो यूं समझाते हैं कि बुद्धि एक चाकू की माफिक होती है – जितनी ज्यादा पैनी हो, उतनी अच्छी है। लेकिन जब आप अपने जीवन के हर पहलू को अपनी बुद्धि से चलाने की कोशिश करते हैं तो यह वैसे ही है, जैसे कि आप अपने कपड़ों को चाकू से सीने की कोशिश कर रहे हैं।

महात्मा बुद्ध के शब्दों में-हर इनसान अपनी आरोग्यता या बीमारी का स्वयं रचयिता होता है। इसलिए हालात जैसे हैं, चिंताएं पाले बिना खुश रहिए। अगर मामूली-सी सुबह की चाय की प्याली से खुशी मिलती है, तो इसे पूरे शौक और शानदार ढंग से बनाएं। कप खरीदें, किस्म-किस्म की चाय पत्तियों से चाय बना-बना कर पीएं। ऐसी छोटी-छोटी सस्ती-सस्ती खुशियों को अपना जुनून बना लें। यही आपके भीतर से अनचाहे ख्यालात का सफाया करेंगी और फिर आसपास की हर चीज खुशनुमा लगने लगेगी।

विचार के बाद लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध नजरिए का भी महत्व कम नहीं है। क्षमता और प्रतिभा के तभी मायने हैं, जब प्रतिबद्ध नजरिए से आगे बढ़ें। जब तक प्रतिबद्धता को सक्रिय नहीं किया जाए, तब तक काबिलियत का कोई मूल्य नहीं है। सद‍्गुरु जग्गी वासुदेव की राय में, अगर आप शरीर, मन, भावनाओं और ऊर्जा के साधनों को अपनी इच्छानुसार इस्तेमाल करना सीख लेते हैं, तो आप स्वाभाविक तौर पर बेहद प्रभावशाली इनसान बन जाएंगे। मशहूर शायर अल्लामा इक़बाल ने फरमाया है ‘खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।’

इंफोसिस के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति कहते हैं, ‘दरअसल, कामकाज करने से ही पहचान बनती है, पहचान से मान-सम्मान बढ़ता है और मान-सम्मान से शक्ति अर्जित होती है।’ उधर स्वामी विवेकानंद का मानना है कि अगर आप स्वयं को कमजोर मानेंगे तो आप कमजोर बन जाएंगे और यदि आप खुद को ताकतवर मानेंगे, तो ताकतवर बन जाएंगे। सच ही है कि जीवन में वही लोग सफल होते हैं जो जानते हैं कि वे सफल होंगे।

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