भारत का वास्तविक राष्ट्रपिता कौन ?- श्रीराम या …. … पुरातन काल के राष्ट्रों के आधुनिक नाम

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पुरातन काल के राष्ट्रों के आधुनिक नाम

पूज्य महानंद जी , भगवन ! जिसको आपने अभी-अभी पातालपुरी कहा था वहां रावण पुत्र अहिरावण राज्य करते थे उसे आधुनिक काल में अमेरिका कहते हैं। और जिसको आपने सोमभूम नाम से पुकारा सोमकेतु राष्ट्र जो त्रेता काल में था उसे रूस कहते हैं। जिसको आपने इंद्रपुरी कहा और जिसको रावण के पुत्र ने विजय किया पुरातन काल में त्रिपुरी कहते थे। और आधुनिक काल में उसका अपभ्रंश होकर तिब्बत हो गया है।
जिसको आपने चिरंगित नाम का राष्ट्र निर्णय कराया उसे आधुनिक काल में चीन कहकर पुकारा जाता है।
तो भगवान यह मैंने आपसे आधुनिक काल के नामों का कुछ प्रतिपादन किया।”
( यौगिक प्रवचन माला भाग – 1 से साभार,)
यदि हम आधुनिक इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य और रावण के साम्राज्य की तुलना करें तो रावण का अत्याचारी शासन अंग्रेजों से भी अधिक बड़े भूभाग पर फैला हुआ था । अमेरिका, चीन, रूस जैसे महादेशों पर उसके शासन के होने से पता चलता है कि अंग्रेजों की भांति उसके राज्य में भी सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। इतने बड़े विशाल साम्राज्य को पाकर रावण अहंकारी हो गया था। यद्यपि रावण का शाब्दिक अर्थ ‘दया करने वाला’ होता है परंतु व्यवहार में रावण अत्यंत निर्दयी हो गया था। जिससे वह लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा था। इतना ही नहीं वह ऋषियों के सात्विक यज्ञीय कार्यों में भी विघ्न डालता था। जिससे उस समय न केवल जनसाधारण अपितु बुद्धिजीवी ऋषि मंडल भी उसके विरोध में हो गया था । वे सभी उसके आतंकपूर्ण शासन से भयभीत रहने लगे थे।
एक छोटे से अयोध्या नाम के राज्य से निकला राजकुमार इतने बड़े आतंकी साम्राज्य के विनाश का कारण बना। जैसे ही उसने यह समझा कि सारा भूमंडल इस समय रावण नाम के राक्षस राजा की अतुलनीय निर्दयता से उत्पीड़ित है ,वैसे ही वह उस राक्षस राजा का अंत करने के लिए कटिबद्ध हो गया।
आज के इतिहास को देश की युवा पीढ़ी को यह बताना चाहिए कि हमने प्राचीन काल से तुर्क, मुगल और ब्रिटिश साम्राज्य के क्रूर शासकों के पूर्ववर्तियों से लड़ना सीखा है। हमने संसार को आजादी का सबसे पहला पाठ पढ़ाया है । उसके लिए कैसे लड़ा जाता है ? – कैसे राक्षस शक्तियों का अंत किया जाता है ?- यह केवल हमने संसार को सिखाया है । इसी रूप में रामचंद्र जी का वर्णन होना चाहिए।
रामचंद्र जी ने उस समय के ऋषि मंडल के सहयोग से कितनी गुप्त और महान योजना पर कार्य किया ? जिससे रावण जैसे आतंकी का विशाल साम्राज्य उखाड़ने में वह सफल हुए । इतिहास का यह कौतूहल बच्चों के दिमाग में आना चाहिए। यदि इस कौतूहल से पर्दा हट सका और हमारी आज की युवा पीढ़ी को यह समझ में आ सका कि रामचंद्र जी ने अपने समय में सशस्त्र क्रांति करते हुए अनेकों राक्षसों का संहार किया था तो आज के इतिहास की उस भ्रांति का भी निवारण हो जाएगा जिसके चलते एक ऐसे व्यक्ति को अनावश्यक ही ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है जिसने कभी भी कोई सशस्त्र क्रांति नहीं की और दूसरों की सशस्त्र क्रांति का फल वह अपने सिर लेकर इस पद पर आसीन हो गया। तब हमको यह भी पता चल जाएगा कि वास्तविक राष्ट्रपिता हमारा कौन है ? मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम या फिर गांधी ?
इस संदर्भ में हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि रामचंद्र जी महाराज ने कभी भी किसी राक्षस के सामने हथियार नहीं डाले और ना ही यह उद्घोष किया कि आप मेरे एक गाल पर चांटा मारते हो तो मैं दूसरा भी आपके सामने कर दूंगा। ना ही उन्होंने ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नाम पर अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए अनेकों नारियों का यौनशोषण किया बल्कि ऐसा करने वाले रावण और उसके साथियों का अंत करने के लिए कटिबद्ध हो गए । ना ही उन्होंने देश के विभाजन के लिए किसी प्रकार की हठधर्मिता को अपनाया । रामचंद्र जी महाराज ने विदेशी शक्तियों को सम्मान की दृष्टि से देखने का भी प्रयास नहीं किया। उनकी दृष्टि में केवल एक ही बात थी कि मर्यादाओं की स्थापना हो और राक्षस राज्य का विनाश हो।
निश्चय ही रामचंद्र जी महाराज का आदर्श जीवन राष्ट्रीय संदर्भ में आज की सरकारों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है । यदि रामचंद्र जी के आदर्श जीवन से प्रेरणा लेकर आज की सरकारें काम करें तो भारतीय राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता को मजबूत करने में अतीव सफलता मिल सकती है।
हमें यह आशा करनी चाहिए कि आने वाला समय भारत का समय है । भारत अपने अतीत के साथ खड़ा होना चाहता है और उसकी पवित्र और गौरवमयी परंपराओं और स्मृतियों को अपने लिए आदर्श बनाकर चलने के लिए कटिबद्ध है । भारत श्रेष्ठ था, है और सदैव रहेगा। इसमें दो मत नहीं हैं। ‘भारत भारती’ में मैथिलीशरण गुप्त जी ने भारत के इसी स्वरूप का बहुत सुंदर शब्दों में वर्णन किया है :- 

“भूलोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगा जल कहां ?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।”

(हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा : भगवान श्री राम” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹ 200 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

  • डॉ राकेश कुमार आर्य
    संपादक : उगता भारत एवं
    राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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