समन्वय बैठक को लेकर पतंगबाजी

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

किसी भी राष्ट्र की प्राण चेतना उसके समाज में ही होती है। उसको निरंतर सींचते रहना चाहिए, ताकि वह निर्जीव न हो जाए। यदि समाज निर्जीव हो जाएगा तो राष्ट्र भी निर्जीव हो जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उसी समाज चेतना को सशक्त करने के प्रयास में लगा है। राजनीति, समाज के एक पक्ष की अभिव्यक्ति मात्र है। राजनीति किसी भी समाज का पूर्ण स्वरूप नहीं माना जा सकता। समन्वय बैठक में समाज के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाले और वहां निरंतर कार्य करने वाले कार्यकर्ता एकत्रित होते हैं। इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन मीडिया धीरे-धीरे स्वयं ही संवादहीनता का शिकार हो गया लगता है। शायद यही कारण है कि उसे संघ और भाजपा की संवाद की भाषा समझ नहीं आतीज्पिछले दिनों दिल्ली में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले अनेक संगठन तीन दिन के लिए एकत्रित हुए और उन्होंने जमीनी स्तर पर अपने अनुभवों की चर्चा की। इन संगठनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग तो थे ही, लेकिन उसके अतिरिक्त छात्रों, श्रमिकों, किसानों के क्षेत्र में लंबे अरसे से कार्य कर रहे विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ के कार्यकर्ता भी मौजूद रहे। इसी प्रकार विश्व हिंदू परिषद, स्वदेशी जागरण मंच के लोग भी इस समन्वय बैठक में अपने अनुभवों को साझा कर रहे थे।इन सामाजिक क्षेत्रों में काम करने के अतिरिक्त राजनीतिक क्षेत्र में अपने अनुभव समेटे हुए भारतीय जनता पार्टी से संबंधित भी कुछ कार्यकर्ता भी थे। इन सब संगठन आपस में बातचीत करते हुए, अपने-अपने क्षेत्रों में हुए अनुभवों को आधार बनाकर आगे की चर्चा की। संघ परिवार की इस प्रकार की समन्वय बैठकें आम तौर पर निश्चित अंतराल के बाद होती रहती हैं। यह परिवार से जुड़े हुए संगठनों के लिए बहुत ही सामान्य और सहज प्रक्रिया है। ऐसी समन्वय बैठकों के जरिए जहां अलग-अलग संगठनों में कार्य कर रहे लोगों की समझ का विस्तार होता है वहीं दूसरी तरफ एक दूसरे के कार्यों से परिचित होने के बाद आशा का नया संचार भी होता है। मीडिया कभी इस प्रकार की बैठकों की ओर ध्यान नहीं देता, लेकिन इस बार माजरा अलग ही नजर आया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए तो यह बैठक तीन दिन तक चर्चा का मुख्य विषय बना रहा। इसका कारण शायद इस समन्वय बैठक में भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं का भाग लेना ही कहा जाएगा, परंतु समन्वय बैठकों में तो पहले भी भाजपा के लोग हिस्सा लेते रहे हैं। तब तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसका कारण यह था कि अब तक भाजपा सत्ता में नहीं थी। अब पहली बार केंद्रीय सरकार में हिस्सेदारी निभा रहे भाजपा के कार्यकर्ता बैठक में आए थे।संघ और भाजपा की समन्वय बैठक किसी भी दृष्टि से सरकार और लोकतंत्र का अतिक्रमण नहीं हुआ। सरकार की गोपनीयता संघ से साझा नहीं की गई और न ही संघ ने सरकार का एजेंडा किया है। ऐसे में भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा इस बैठक में उपस्थिति पर फिजूल की हाय तौबा मचाना समझ से परे है। प्रधानमंत्री भी इस बैठक में उपस्थित हुए। मीडिया को उत्तेजित करने के लिए यही पर्याप्त था। इसलिए वह अपनी पूरी टीमों के साथ बैठक स्थल के आसपास घूमता रहा। लेकिन मीडिया और दूसरे राजनीतिक दलों के लोग इस बैठक पर जिन कारणों से आपत्ति कर रहे थे, वे अत्यंत रुचिकर हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार का संवाद ही तानाशाही वृत्ति का प्रतीक है। इस संवाद से भारतीय जनता पार्टी पर नाजायज दबाव पड़ता है।लोकतंत्र में संवाद ही इस शासन पद्धति का सबसे बड़ा आधार है। संवाद के बिना लोकतंत्र चल ही नहीं सकता। उसी के अनुरूप तीस के लगभग कार्यकर्ता संवाद रचना में व्यस्त थे। संवाद से जो शासन चलता है, वही सही अर्थों में लोकमत का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। गुरु नानक देव जी ने कितना सटीक कहा है-किछु कहिए, किछु सुनिए नानक। अपनी सुनाओ और दूसरों की सुनो। सुनने-सुनाने से ही दृष्टि का विस्तार होता है। संकीर्णता समाप्त होती। जो न तो किसी की सुनना चाहते हैं और न ही किसी के साथ अपने अनुभव साझा करते हैं, उनकी सोच के चहुं ओर एक अपारदर्शी दीवार खड़ी हो जाती है और उसमें देर-सवेर संकीर्णता का पलना तय हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्राय: विरोध के लिए ही विरोध किया जाता है। विरोध की लत पड़ जाने के बाद विरोधी किसी सार्थक चीज का भी विरोध करने लगते हैं। वे समन्वय बैठक जैसी सहज और आवश्यक संवाद रचना को ही जन विरोधी बताने लगते हैं। विरोधी दलों की यही वृत्ति फासीवादी कहलाती है, जिससे तानाशाह उभरते हैं।्रविभिन्न वर्गों में काम करने वाले संगठनों में आपसी बातचीत से एक दूसरे को अपने कार्य की गुणवत्ता बढ़ाने में ही सहायता मिलती है।  भारतीय किसान संघ और भारतीय मजदूर संघ से संवाद रचना से ही भूमि अधिग्रहण बिल पर पुनर्विचार संभव हुआ, लेकिन मीडिया भी और अन्य राजनीतिक दल भी संवाद रचना का विरोध करते हैं। वह संघ के भीतर होते संवाद और संवाद प्रक्रिया से अनजान ही हैं। इसका कारण दूसरे राजनीतिक दलों में संवाद का अभाव ही कहा जाएगा। भारत की राजनीति में जो संवादहीनता पैदा हो रही है, वह इन राजनीतिक दलों के भीतर उत्पन्न हो गई तानाशाही वृत्तियों के कारण ही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के भीतर तानाशाही नहीं, बल्कि संवाद की स्थिति बनी रहती है।भाजपा सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रहे सामाजिक संगठनों से भी संवाद करती रहती है, ताकि वह लोक आकांक्षाओं से दूर न हो जाए। सत्ता का यदि सजगता के साथ नहीं किया जाए तो वह मद पैदा करती है और इसी कारण  आम तौर पर संवाद से दूर भी करती है।

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