दादरी फिर चर्चा में है। मीडिया ने मीडिया धर्म निभाया और दादरी को अखबारों की सुर्खियों में ला दिया है। मीडिया और नेताओं ने दादरी का ‘दर्द भरा सच’ समझने का प्रयास नही किया। अपनी-अपनी व्याख्याएं, अपने-अपने तर्क और अपने-अपने बयान दिये जा रहे हैं। गौतमबुद्घ नगर से भाजपा सांसद और केन्द्रीय मंत्री डा. महेश शर्मा यदि इस घटना को एक ‘हादसा’ कहते हैं तो भी शोर मचता है और मुख्यमंत्री के चहेते आजम खां यहां आकर ‘कुछ बोलते हैं’ तो भी शोर मचता है। अब डा. महेश शर्मा के ‘हादसा’ शब्द को लें, तो उसका सीधा सा अर्थ दुर्घटना या दुखद घटना है, ऐसी घटना जिसके लिए पूर्व से कोई तैयारी नही थी, अचानक उत्तेजना फैली और घटना घटित हो गयी। उसमें एक व्यक्ति की जान चली गयी, उसे क्या कहेंगे? ‘हादसा’ से अलग वह क्या हो सकता है?

बाद की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि यह ‘हादसा’ ही था, दोनों पक्षों के लोगों ने अत्यंत विषम और उत्तेजक परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नही खोया। इसके विपरीत कुछ अच्छे लोग सामने आए और नेताओं व मीडिया के भ्रामक प्रचार के विरूद्घ दोनों पक्षों को एक साथ लेकर खड़े हो गये। लोगों ने कहा कि हम दीवाली और ईद एक साथ मनाते रहे हैं और अब भी मनाएंगे। हमारे भाईचारे को लेकर किसी प्रकार का विवाद न किया जाए, उस पर राजनीति ना की जाए।

इखलाक का परिवार भी सियासत की हरकतों से दुखी है। उसने भी कहा है कि आजमखां इस घटना को लेकर राजनीति ना करें। पर आजम खां हैं कि सपा की ‘सियासत’ और ‘राजनीतिक विरासत’ दोनों को ही मिट्टी में मिलाने पर तुले हैं। आगामी चुनावों में सपा को भारी क्षति उठानी पड़ सकती है। क्योंकि प्रदेश की जनता आजमखां की साम्प्रदायिकता से दुखी है। यहां तक कि मुसलमानों में भी आजमखां के उत्तेजक बयानों को पसंद नही किया जा रहा है। क्योंकि उनके ऐसे बयानों का प्रभाव प्रदेश की शांति-व्यवस्था पर पड़ता है, जिसका परिणाम एक साधारण मुसलमान को भुगतना पड़ता है। अब आजमखां दादरी को बाबरी से जोड़ रहे हैं। और इस प्रकरण को लेकर यू.एन. महासचिव बान की मून को उन्होंने पत्र भी लिखा है, जिसमें भारतवर्ष को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की कुछ लोगों की चाल से यू.एन. महासचिव को अवगत कराया है। आजमखां ने यू.एन. महासचिव को बताया है कि भारत में मुसलमान और ईसाई दोनों खतरे में हैं।

उनका इस प्रकार का आचरण भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय प्रणाली के मुंह पर तमाचा है। आजमखां संविधानेतर कार्य कर रहे हैं और उनकी स्थिति सपा में वैसी ही बन गयी है जैसी मनमोहन सरकार में सोनिया गांधी की थी। लगता है वह सुपर सी.एम. हैं।

बिसाहड़ा में जो कुछ हुआ उसके लिए कौन जिम्मेदार था, कौन सी सोच जिम्मेदार थी, कौन से बयानों ने इस घटना को अंजाम दिलाया, और यहां पर कटने वाला पशु गाय थी या कोई और? इस पर चर्चा या तो रोक दी गयी है, या जानबूझकर की नही जा रही है। नेताओं ने एक पक्षीय रूप से सिद्घ कर लिया है कि जो कुछ हुआ वह एक अफवाह थी और अफवाह को तूल देकर सारा घटनाचक्र घूम गया। हमारा मानना है कि भीड़ को धैर्य और साम्प्रदायिक सौहार्द कायम रखने के लिए प्रेरित करते हुए नेता और मीडिया यदि यह कहते हैं कि जो कुछ हुआ है, उसकी सीबीआई जांच की जाएगी या करायेंगे तो दोनों पक्षों के शांति प्रेमी लोगों को ही अच्छा लगता।

दादरी का भाईचारा देखिए कि साम्प्रदायिक तनाव के रहते भी कहीं कोई उपद्रव नही हुआ, वहीं यहां के लोगों ने यह और कह दिया कि हम दीवाली और ईद साथ मनाते आए हैं और साथ ही मनाएंगे। ऐसे प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चाहिए कि मामले की सीबीआई जांच करायें, और दोषी लोगों के विरूद्घ कानून को अपना काम करने दें। आजम खां की जुबान को रोकें। यह ठीक है कि हर पार्टी को अपने पास एक ‘दिग्विजय’ भी रखना पड़ता है, पर जब लोग ‘दिग्विजयों’ को सुनना नही चाह रहे हों तो उस समय इन्हें पीछे हटा लेना चाहिए। अन्यथा इनके कारण पार्टी को क्षति भी उठानी पड़ जाती है।

मुख्यमंत्री के लिए विचारणीय बात है कि उनके रहते प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों का या घटनाओं का आंकड़ा अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। यदि वह अपने शासनकाल के पहले साम्प्रदायिक दंगे पर कड़ा रूख अपनाते और उसमें कानून को पवित्र हाथों से अपना काम करने देते, तो बाद में जितने साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं वे ना होते और कई अनमोल जानों के चले जाने का ‘पाप’ भी उनके सिर नही लगता।

अभी समय है कि मुख्यमंत्री अपने ‘चचा जान’ आजमखां से कहें कि ‘चचा गाड़ी को थोड़ा ब्रेक दो’। उन्हें बतायें कि सारी व्यवस्था के लिए चुनौती मत बनो। संविधान की सीमाओं में रहकर काम करो। मुख्यमंत्री से ‘बिसाहड़ा’ न्याय मांग रहा है, और मुख्यमंत्री अभी भी सच की अनेदखी कर रहे हैं। क्योंकि मुख्यमंत्री को वही दिखाई दे रहा है जो उन्हें उनके चचा आजम खां दिखा रहे हैं। यदुवंशी कृष्ण के वंशज के रूप में प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान अखिलेश को कृष्ण के न्यायप्रिय, दुष्टों के संहारक और गोपालक स्वरूप का कुछ चिंतन करना चाहिए। प्रदेश की जनता की यह सामूहिक मांग है और इसी मांग को यदि मुख्यमंत्री मान गये तो 2017 भी उनका होगा। ‘चचा आजम’ पर यदि कहीं अन्याय होता है तो उनको सुनना भी आवश्यक है पर ‘चचा आजम’ मुख्यमंत्री से सब पर अन्याय करायें, यह तो राजा का राजधर्म से मुंह फेर लेना ही कहा जाएगा। मुख्यमंत्री जी! राजधर्म का पालन करो। ये शब्द मोदी के लिए ही ‘फिट’ नही थे आपके लिए भी ‘फिट’ हैं।

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