संसार में बुराई का बोलबाला अधिक होने से लोग बुरे लोगों की नकल करते हैं : स्वामी विवेकानंद परिव्राजक


“संसार में बुराई का बोलबाला अधिक है, इसलिए लोग, बुरे लोगों की नकल अधिक करते हैं। अच्छाई को प्रोत्साहन कम मिलता है, इसलिए लोग अच्छा बनने में संकोच करते हैं।”
इस संसार में अच्छाई भी चलती है, बुराई भी चलती है। दोनों अनादि काल से चल रही हैं, और आगे भी अनंत काल तक चलती रहेंगी। न तो अच्छाई को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, और न ही बुराई को।
हर व्यक्ति के अपने अलग-अलग संस्कार हैं। “जिसके संस्कार अच्छे हैं, वह अच्छे काम करता है, भले ही उसके मार्ग में बाधाएं भी बहुत आती हैं। परंतु उसके अच्छे संस्कार उसे बुराई करने से रोकते हैं, अच्छाई करने के लिए ही प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार से इसका विपरीत पक्ष भी उतना ही सत्य है। अर्थात जिसके संस्कार बुरे हैं, वह बुराई करता है। उसके बुरे संस्कार उसे अच्छाई करने से रोकते हैं, और बुराई करने में ही प्रेरित करते हैं।”
अनेक बार व्यक्ति समझता भी है, कि “मैं गलत कर रहा हूं। मैं इससे छूटना भी चाहता हूं, फिर भी वह बुराई के आगे हार जाता है। उससे लड़ नहीं पाता। उससे जीत नहीं पाता। क्योंकि उसके बुरे संस्कार अधिक बलवान होते हैं। फिर भी उसे बुराई से हार नहीं माननी चाहिए। उससे लड़ कर जीतना ही चाहिए। क्योंकि यही सुखदायक है।”
इसके अतिरिक्त उसके पास पड़ोस का वातावरण भी ऐसा ही होता है, जो उसे बुराई करने के लिए प्रेरित करता है। “रेडियो टेलीविजन प्रेस मीडिया इंटरनेट स्कूल-कालेज-सिलेबस सरकार के कानून कहीं कहीं समाज के नियम माता पिता गुरुजनों का प्रशिक्षण शिक्षा पद्धति (गुरुकुल की या कालेज की) इत्यादि अनेक कारण और भी हैं, जो व्यक्ति को अच्छा या बुरा बनने के लिए प्रेरित करते हैं।” इन सब कारणों से अच्छाई-बुराई सदा से चल रही है, और आगे भी चलती रहेगी। अच्छे काम करने वाले लोगों को ईश्वर उनके कर्मानुसार फल तो देता ही है, अर्थात जितना वे पुरुषार्थ करते हैं उसी हिसाब से उनको संपत्ति देता है, और ज्ञान देकर उनकी रक्षा भी करता है। “और जो बुरे लोग पाप कर्म करते हैं उनको ईश्वर उनके कर्मानुसार धन संपत्ति तो देता है, परंतु उनको बुरे कामों में प्रोत्साहन नहीं देता। जब बुरे लोग ईश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करते, तो न्यायकारी होने से ईश्वर उनकी सहायता कम कर देता है। उनकी रक्षा नहीं करता। वे अपनी मूर्खता दुष्टता और असभ्यता आदि दोषों के कारण ईश्वरीय आज्ञाओं का उल्लंघन करते हैं, और ईश्वर के दंड के पात्र बनते हैं।”
कहने का सार यह है, कि “संसार की बुराई से प्रभावित न हों। ईश्वर द्वारा जो बुद्धि आपको मिली है, उसका सदुपयोग करें। अच्छाई को प्रोत्साहन देवें। स्वयं अच्छे काम करें, और उसमें अपनी शक्ति लगाएं।” बाधाएं तो दोनों मार्गो में हैं, चाहे आप अच्छाई के मार्ग पर चलें, चाहे बुराई के मार्ग पर।
“फिर भी अच्छाई के मार्ग पर चलने का परिणाम आपके लिए तथा दूसरों के लिए बहुत अच्छा और सुखदायक होगा। तथा बुराई के मार्ग पर चलने से आपकी और अन्य सब की हानि होगी। आप बुद्धिमान हैं। आप स्वयं सोचिए, कि कौन से मार्ग पर चलना चाहिए।”
स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।

प्रस्तुति : देवेंद्र सिंह आर्य

चेयरमैन:  उगता भारत

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