राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की परिकल्पना से देश में आ सकती है आर्थिक समृद्धि

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इतिहास गवाह है – भारत में दूध की नदियां बहती थीं, भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, भारत का आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पूरे विश्व में बोलबाला था, भारतीय सनातन धर्म का पालन करने वाले लोग सुदूर इंडोनेशिया तक फैले हुए थे। भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग सम्पन्न थे। कृषि उत्पादकता की दृष्टि से भी भारत का पूरे विश्व में डंका बजता था तथा खाद्य सामग्री एवं कपड़े का निर्यात तो भारत से पूरे विश्व को होता था। जब भारत का वैभव काल चल रहा था तब भारत के नागरिकों में देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी रहती थी, जिसके चलते ग्रामीण इलाकों में नागरिक आपस में भाई चारे के साथ रहते थे एवं आपस में सहयोग करते थे। केवल “मैं” ही तरक्की करूं इस प्रकार की भावना का सर्वथा अभाव था एवं “हम” सभी मिलकर आगे बढ़ें, इस भावना के साथ ग्रामीण इलाकों में नागरिक प्रसन्नता के साथ अपने अपने कार्य में व्यस्त एवं मस्त रहते थे।

भारत में आज की सामाजिक स्थिति सर्वथा भिन्न नजर आती है। “हम” की जगह “मैं” ने ले ली है। नागरिकों की आपस में एक दूसरे के प्रति हमदर्दी कम ही नजर आती है। ऐसे में, भारत को पुनः यदि उसके वैभव काल में ले जाना है तो देश की धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं को आगे आकर नागरिकों में देश प्रेम की भावना का संचार करना अब जरूरी हो गया है। दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात जापान में वहां के नागरिकों में देश प्रेम की भावना का विकास कर ही जापान ने आर्थिक विकास के नए पैमाने गढ़े हैं। जापान ने दूसरे विश्व युद्ध में देश की बर्बादी के बाद विश्व की सबसे मज़बूत आर्थिक शक्ति, अमेरिका से टक्कर लेते हुए आर्थिक क्षेत्र में न केवल अपने आप को पुनः खड़ा किया है बल्कि अपने आप को विश्व की महान आर्थिक शक्तियों में भी शामिल कर लिया है। देश के नागरिक यदि देश के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए देश को अपना मानने लगेंगे तो उनमें प्रसन्नता की भावना बलवती होती जाएगी एवं इससे उनकी उत्पादकता में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। अब समय आ गया है कि इस कार्य में सरकारों के साथ साथ धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा भी अपनी विशेष भूमिका अदा की जाय।

भारत में पिछले 96 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के नागरिकों में देशप्रेम की भावना का संचार करने का लगातार प्रयास कर रहा है। वर्ष 1925 में संघ के कार्य की शुरुआत ही इस कल्पना के साथ हुई थी कि देश के नागरिक स्वाभिमानी, संस्कारित, चरित्रवान, शक्तिसंपन्न, विशुद्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत और व्यक्तिगत अहंकार से मुक्त होने चाहिए। आज संघ, एक विराट रूप धारण करते हुए, विश्व में सबसे बड़ा स्वयं सेवी संगठन बन गया है। संघ के शून्य से इस स्तर तक पहुंचने के पीछे इसके द्वारा अपनाई गई विशेषताएं यथा परिवार परंपरा, कर्तव्य पालन, त्याग, सभी के कल्याण विकास की कामना व सामूहिक पहचान आदि विशेष रूप से जिम्मेदार हैं। संघ के स्वयंसेवकों के स्वभाव में परिवार के हित में अपने हित का सहज त्याग तथा परिवार के लिये अधिकाधिक देने का स्वभाव व परस्पर आत्मीयता और आपस में विश्वास की भावना आदि मुख्य आधार रहता है। “वसुधैव कुटुंबकम” की मूल भावना के साथ ही संघ के स्वयंसेवक अपने काम में आगे बढ़ते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा 96 वर्ष पूर्व की गई परिकल्पना को भारत में अन्य धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों द्वारा भी अपनाकर पूरे देश में इस परिकल्पना को साकार करने का आज प्रयास होना चाहिए। विशेष रूप से कोरोना महामारी के इस काल में उक्त परिकल्पना धरातल पर साकार होती दिखी भी थी जब इस वैश्विक संकट के काल में भारत ने अपनी “वसुधैव कुटुंबकम्” की प्राचीन परंपरा का निर्वाह करते हुए शुरूआती दौर में आवश्यक दवाइयों की आपूर्ति विश्व में कई देशों को की। फिर, वैक्सीन मैत्री अभियान के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सहयोग का हाथ बढ़ाया। कोरोना महामारी के इस काल में दुनिया भर की अनेक हस्तियों एवं विशेषज्ञों ने भारत की एकात्म दृष्टि और उस पर आधारित दैनंदिन जीवन पद्धति के महत्व को स्वीकार भी किया है।

वहीं दूसरी ओर, अभी हाल ही में अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर निर्माण करने हेतु निधि समर्पण अभियान, जो पूरे विश्व में अपने आप में एक सबसे बड़ा सम्पर्क अभियान सिद्ध हुआ है, के माध्यम से संघ ने पूरे देश के नागरिकों को जोड़ने का प्रयास किया है। 44 दिनों तक चले इस अभियान के अंतर्गत 5.5 लाख से अधिक नगर-ग्रामों के 12 करोड़ से अधिक परिवारों से, भव्य मंदिर निर्माण के लिये समर्पण निधि एकत्रित करने के उद्देश्य से, सम्पर्क किया गया है। समाज के सभी वर्गों और मत-पंथों ने इस अभियान में बढ़चढ़कर सहभागिता की है। ग्रामवासी-नगरवासी से लेकर वनवासी और गिरिवासी बंधुओं तक, सम्पन्न से सामान्य जनों तक सभी ने इस अभियान को सफल बनाने में अपना भरपूर योगदान दिया। इस तरह के अभियान देश में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में अपनी मुख्य भूमिका निभाते हैं। देश के नागरिक यदि आपस में कटुता का त्याग कर मेल जोल बढ़ाते हैं तो इससे भी देश की आर्थिक स्थिति को सशक्त करने में मदद मिलती है।

भारत के आर्थिक विकास को गति देने एवं देश के नागरिकों में प्रसन्नता का भाव विकसित करने के लिए देश के गावों में आर्थिक प्रगति को दर्शाना ही होगा क्योंक आज भी भारत की लगभग 60 प्रतिशत आबादी ग्रामों में निवास करती है जो अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर करती है। जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र लगभग 16 से 18 प्रतिशत के बीच ही रहता है। इसी कारण से देश के ग्रामीण इलाक़ों में अधिक गरीबी देखने में आती है। दूसरे, देश में रासायनिक खाद के अधिक उपयोग के चलते कृषि योग्य भूमि की उर्वरा शक्ति का तेज़ी से क्षरण हुआ है। आज भारत में 30 प्रतिशत भूमि अवनत हो चुकी है।

उक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर तथा ग्राम विकास और कृषि क्षेत्र में विशेष दृष्टि रखते हुए संघ ने अभी हाल ही में 13 अप्रेल 2021 से भूमि सुपोषण अभियान की शुरूआत की है। इस अभियान के अंतर्गत कृषि योग्य भूमि की उर्वरा शक्ति में आई कमी को दूर करने का प्रयास किया जायेगा। हालांकि संघ ने इस अभियान को आगे बढ़ाने हेतु, इस क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठनों एवं संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करने का निर्णय लिया है। परंतु, पूरे देश में फैले संघ के स्वयंसेवकों के नेटवर्क का संगठित उपयोग कर इस अभियान को बहुत सफल बनाया जा सकेगा, ऐसी उम्मीद की जा रही है। इस अभियान को एक सामाजिक अभियान के रूप में भारत के सभी राज्यों में, जिलों में, ग्रामों में चलाया जा रहा है।

भूमि सुपोषण अभियान के अंतर्गत मुख्य रूप से देश के ग्रामीण इलाकों में कृषकों के बीच जागरण अभियान चलाने के साथ साथ धरातल स्तर पर भी कई प्रकार के कार्य किये जायेंगे ताकि विशेष रूप से (1) गावों में मिट्टी के क्षरण को रोका जा सके; (2) मिट्टी के संवर्धन हेतु व्यवस्थित तरीक़े से उपाय किए जा सकें; (3) रासायनिक खाद, रासायनिक दवाईयों एवं कीटनाशकों के उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके; (4) कृषि सिंचाई में पानी के अपव्यय को समाप्त किया जा सके; (5) मेढ़ पर पेड़ लगाये जा सकें; (6) भूमि के लिए हानिकारक पदार्थ, जैसे प्लास्टिक, थर्मोकोल आदि, के उपयोग को समाप्त किया जा सके; साथ ही, (7) भूमि के लिए हानिकारक पदार्थों का निबटारा भी सुयोग्य पद्धति से किया जा सके; (8) कागज एवं अन्य वस्तुएं जिन्हें बनाने के लिए वृक्षों का संहार होता है, उनके उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके; साथ ही (9) इन वस्तुओं के पुनः उपयोग के प्रति भी सचेत रहा जा सके एवं (10) वृक्षारोपण गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से सहभागी बना जा सके।

आज देश में आवश्यकता इस बात की है कि भारत की अपनी परम्पराओं का पालन करते हुए किस प्रकार कृषि कार्य के साथ साथ अन्य आर्थिक गतिविधियों को सम्पन्न किया जा सकता है, इस बात पर बहुत ही गम्भीर विचार किये जाने की आवश्यकता है। इस हेतु विभिन्न स्तरों पर सरकारों के साथ साथ अन्य धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों को भी आगे आना होगा। तभी इस देश से गरीबी को समूल नष्ट करना सम्भव होगा एवं नागरिकों में मुस्कराहट का संचार किया जा सकेगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस ओर अपने कदम, भूमि सुपोषण अभियान की शुरुआत कर, बढ़ा दिये हैं। अब बारी अन्य संगठनों के आगे आने की है।

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