जब हुआ था बांग्लादेश का जन्म

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16 दिसंबर 1971 के दिन भारतीय सेनाओं के पराक्रम और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दृढ़ संकल्प की बदौलत 24 वर्षों से दमन और अत्याचार सह रहे तत्कालीन ईस्ट पाकिस्तान के करोड़ों लोगों को मुक्ति मिली थी। भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 13 दिन के भयानक युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ।

 

अंग्रेजों द्वारा जातीय आधार पर किए गए बंटवारे के आधार पर बंगाल का एक बड़ा हिस्सा ईस्ट पाकिस्तान के नाम से पाकिस्तान के शोषण और अत्याचारों को सह रहा था।

तीन दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की ओर से भारतीय ठिकानों पर हमले के बाद भारतीय सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया पाकिस्तान के पास ढाका की रक्षा के लिए अब भी 26400 सैनिक थे जबकि भारत के सिर्फ़ 3000 सैनिक ढाका की सीमा के बाहर थे, लेकिन पाकिस्तानियों का मनोबल गिरता चला जा रहा था।

बांग्लादेश में आजादी की लहर शुरू हुई 1970 के आम चुनाव से जिसमें पूर्व पाकिस्तानी अवामी लीग ने कुल 169 सीटों में से 167 सीटें जीतकर मजलिस-ए-शूरा (पाकिस्तानी संसद के निचले सदन) की 313 सीटों पर बहुमत हासिल कर लिया। अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान ने पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनने और सरकार बनाने का दावा किया।

इसके तुरंत बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का जुल्फिकार अली भुट्टो ने मुजीबुर रहमान का दावा खारिज करते हुए राष्ट्रपति याह्या खान से पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य शासन लागू करने की सिफारिश की। पश्चिम पाकिस्तानियों द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए और वहां फैल रहे असंतोष को दबाने के लिए कठोर सैन्य कार्यवाही शुरू कर दी। 25 मार्च 1971 को अवामी लीग को भंग कर शेख मुजेबुर रहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तान ले जाया गया।

पाकिस्तानी सेना के एक मेजर जियाउर्ररहमान ने मुजीबुर रहमान की और से बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उन्होंने मुक्ति बाहिनी का गठन किया और पश्चिमी पाकिस्तान की सेना का मुकाबला किया। सैन्य कार्यवाही में बेतहाशा कत्लेआम हुआ। पाक सेना द्वारा अल्पसंख्यक हिन्दुओं और बांग्लाभाषियों पर किए जा रहे जुल्मों के चलते लाखों शरणार्थियों ने भारत की ओर रुख किया।

भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मौके की नजाकत को भांपते हुए पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप का निर्णय लिया। इंदिरा गांधी ने अपने फिल्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को लड़ाई के लिए तैयार रहने को कहा। पाकिस्तान द्वारा पश्चिम सेक्टर में 3 दिसंबर 1971 को हमला कर दिया गया जिसका जवाब देने के लिए भारतीय सेना पूरी तरह तैयार थी। 13 दिनों तक चली लड़ाई के बाद ढाका में पाकिस्तानी जनरल नियाजी ने पाकिस्तान के समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किए।

इस युद्ध की सफलता का श्रेय पूरी तरह इंदिरा गांधी, भारतीय सेना और बांग्लादेश की मुक्तिबाहिनी को जाता है। अमेरिका और चीन द्वारा भारी दबाव में भी इंदिरा गांधी जरा भी नहीं डरी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस अदम्य संकल्प और साहस को देख दुनियाभर ने इंदिरा गांधी को आयरन लेडी का खिताब दिया था। तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा की संज्ञा देते हुए उनका सम्मान भी किया था। काश आज के नेता भी ऐसी ही इच्छाशक्ति वाले होते तो भारत को वर्तमान की महाशक्ति बनने से कोई भी रोक नहीं सकता था।
( सोशल मीडिया से साभार)

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