मनुष्य इस दुनिया का एक हिस्सा है या उसका स्वामी ?

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हमने मैदानों का परिवेश तो बिगाड़ा ही, अब पहाड़ों पर भी विनाश करने को तत्पर है। पहाड़ों पर न केवल बसने को लालायिक है बल्कि वहां उद्योग लगा रहे हैं, होटल व्यवसाय पनपा रहे हैं। इसका असर पहाड़ों पर साफ तौर पर दिखने लगा है।

मनुष्य इस दुनिया का एक हिस्सा है या उसका स्वामी ? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है क्योंकि मनुष्य के कार्य-व्यवहार से ऐसा मालूम होने लगा है, जैसे इस धरती पर जितना अधिकार उसका है, उतना किसी और का नहीं है- न वृक्षों का, न पशुओं का, न पक्षियों का, न नदियों-पहाड़ों का। मौजूदा समय में जब प्रकृति का दोहन एवं पशुओं पर बढ़ती क्रूरता चिंता का विषय बन गई है और वन क्षेत्र सिमटने से वन्यजीवों के समक्ष एवं ग्लेशियर के टूटने से मनुष्य जीवन का प्रश्न खड़ा हो गया है। अक्सर हम समाचार पत्रों में विभिन्न शोध-अनुसंधान रिपोर्ट के आंकड़ों को देखते हैं कि किस तरह गिद्धों, कोवों, गौरैया, जुगनूओं आदि पक्षियों की संख्या लगातार घट रही हैं। यही हाल मधुमक्ख्यिों का हो रहा है। शोध बताते हैं कि यूरोपीय मधुमक्खियों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। मनुष्य अपने लोभ एवं लालच के लिये न केवल प्रकृति का दोहन कर रहा है, बल्कि प्रकृति, वन्यजीवों एवं पर्यावरण का भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

जंगल काटे जा रहे हैं। वन्यजीवों के रहने की जगहें उनसे छिनती जा रही हैं। उसी कारण वन्यजीवों की संख्या भी काफी कम हो चुकी है। इससे कुल मिलाकर प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। जिसके कारण प्राकृतिक आपदाओं का आये दिन हमें सामना करना पड़ता है। ये वन्यजीव प्रकृति का हिस्सा है। अगर हम उन्हें नष्ट करते हैं तो जैव विविधता का समस्त तंत्र ही गड़बड़ा जाएगा। पशुओं को भी इस दुनिया में मनुष्यों की ही तरह खुलकर जीने का अधिकार है, इस सोच को आगे बढ़ाने की जरूरत है। अगर हमने पर्यावरण, वन्यजीवों एवं पक्षियों की हिफाजत नहीं की तो धरती पर बड़ा संकट आ सकता है।

प्रकृति, पर्यावरण एवं वन्यजीवों से जुड़े एक शोध में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि मनुष्य ने 1970 से 2014 के पैंतालिस वर्षों में धरती से साठ प्रतिशत वन्य जीव, जंतु, कीट-पतंग लुप्त हो चुके हैं। अमेजन के जंगलों में बीस प्रतिशत भाग महज पिछले पचास वर्षों में मनुष्य आबादी में तब्दील हो चुका है। एक अन्य शोध के अनुसार तीन करोड़ वर्षों में समुद्र इतना तेजाबी नहीं हुआ जितना हाल के वर्षों के दौरान हुआ है। शोधकर्ता के कहने का आशय था कि इस धरा पर मनुष्य की मौजूदगी बीस लाख वर्षों से है। लेकिन बढ़ती आबादी, शहरीकरण, जंगलों का सिकुड़ते, समुद्र का दूषित होते जाना इन वन्य जीव, जंतु, कीट-पतंग के विलुप्ति की वजह बना है।

प्रकृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी चीजों का उपभोग स्वयं नहीं करती। जैसे-नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते, फूल अपनी खुशबू पूरे वातावरण में फैला देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती, लेकिन मनुष्य जब प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ एवं दोहन करता है तब उसे गुस्सा आता है। जिसे वह समय-समय पर सूखा, बाढ़, सैलाब, चक्रावात, ग्लेशियर का टूटना, तूफान के रूप में व्यक्त करते हुए मनुष्य को सचेत करती है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तरह-तरह के प्राकृतिक हादसों की आशंकाएं लगातार जताई जाती रही है, हाल ही में उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही जितनी दुखद है, उतनी ही चिंताजनक भी।

हमें इस दुखद घड़ी में फिर एक बार प्रकृति, वन्यजीवों एवं पक्षियों के साथ हो रहे खिलवाड़ पर विचार करना चाहिए। यह बार-बार कहा जाता रहा है कि धरती गर्म हो रही है। ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन हमें चुनौती दे रहा है। हिमालय को वैसे भी बहुत सुरक्षित पर्वतों में नहीं गिना जाता। पिछले दशकों में यहां ग्लेशियर तेजी से पिघलते चले जा रहे हैं। नदियों के अस्तित्व पर सवाल खड़े होने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ग्लेशियर को पिघलने से रोकने के लिए जितनी कोशिश होनी चाहिए, नहीं हो पा रही है। इतना ही नहीं, पहाड़ों पर उत्खनन और कटाई का सिलसिला लगातार जारी है। पहाड़ों पर लगातार निर्माण और मूलभूत ढांचे, जैसे सड़क, सुविधा निर्माण से खतरा बढ़ता चला जा रहा है। बहुत दुर्गम जगहों पर मकान-भवन निर्माण से जोखिम का बढ़ना तय है। जब पहाड़ों पर सुविधा बढ़ रही है, तब वहां रहने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है।

हमने मैदानों का परिवेश तो बिगाड़ा ही, अब पहाड़ों पर भी विनाश करने को तत्पर है। पहाड़ों पर न केवल बसने को लालायिक है बल्कि वहां उद्योग लगा रहे हैं, होटल व्यवसाय पनपा रहे हैं। इसका असर पहाड़ों पर साफ तौर पर दिखने लगा है। जहां पहाड़ों पर हरियाली हुआ करती थी, वहां कंक्रीट के जंगल नजर आने लगे हैं, नतीजा सामने है। समय-समय पर पहाड़ और ग्लेशियर हमें रुलाने लगे हैं। इस हादसे के बाद हमें विशेष रूप से पहाड़ों और प्रकृति के बारे में ईमानदारी से सोचने की शुरुआत करनी चाहिए। पर्यावरण रक्षा के नाम पर दिखावा अब छोड़ देना चाहिए।

प्रकृति और मनुष्य के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मनुष्य के लिए धरती उसके घर का आंगन, आसमान छत, सूर्य-चांद-तारे दीपक, सागर-नदी पानी के मटके, वन्यजीव संतुलित पर्यावरण और पेड़-पौधे आहार के साधन हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य के लिए प्रकृति से अच्छा गुरु नहीं है। आज तक मनुष्य ने जो कुछ हासिल किया वह सब प्रकृति से सीखकर या प्रकृति से पाया है। न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिकों को गुरुत्वाकर्षण समेत कई पाठ प्रकृति ने सिखाए हैं तो वहीं कवियों ने प्रकृति के सान्निध्य में रहकर एक से बढ़कर एक कविताएं लिखीं। इसी तरह आम आदमी ने प्रकृति के तमाम गुणों को समझकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव किए। दरअसल प्रकृति हमें कई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाती है। जैसे-पतझड़ का मतलब पेड़ का अंत नहीं है। इस पाठ को जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में आत्मसात किया उसे असफलता से कभी डर नहीं लगा। ऐसे व्यक्ति अपनी हर असफलता के बाद विचलित हुए बगैर नए सिरे से सफलता पाने की कोशिश करते हैं। वे तब तक ऐसा करते रहते हैं जब तक सफलता उन्हें मिल नहीं जाती। इसी तरह फलों से लदे, मगर नीचे की ओर झुके पेड़ हमें सफलता और प्रसिद्धि मिलने या संपन्न होने के बावजूद विनम्र और शालीन बने रहना सिखाते हैं। उपन्यासकार प्रेमचंद के मुताबिक साहित्य में आदर्शवाद का वही स्थान है, जो जीवन में प्रकृति का है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि प्रकृति में हर किसी का अपना महत्व है। एक छोटा-सा कीड़ा भी प्रकृति के लिए उपयोगी है, जबकि मत्स्यपुराण में एक वृक्ष को सौ पुत्रों के समान बताया गया है। इसी कारण हमारे यहां वृक्ष पूजने की सनातन परंपरा रही है। पुराणों में कहा गया है कि जो मनुष्य नए वृक्ष लगाता है, वह स्वर्ग में उतने ही वर्षों तक फलता-फूलता है, जितने वर्षों तक उसके लगाए वृक्ष फलते-फूलते हैं।

प्रकृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी चीजों का उपभोग स्वयं नहीं करती। जैसे-नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती, पेड़ अपने फल खुद नहीं खाते, फूल अपनी खुशबू पूरे वातावरण में फैला देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती, लेकिन मनुष्य जब प्रकृति से अनावश्यक खिलवाड़ करता है तब उसे गुस्सा आता है। जिसे वह समय-समय पर सूखा, बाढ़, सैलाब, तूफान के रूप में व्यक्त करते हुए मनुष्य को सचेत करती है।

वन्यजीवों एवं जंगलों में कुछ जादुई संसार एवं रोमांच होता है। जीवन के अनेकानेक सुख, संतोष और रोमांच में से एक यह भी है कि हम कुछ समय के लिए अपने को भुलाकर जंगलों में कहीं खो जाएं, लेकिन इसका अर्थ जंगलों को विनाश की आग में झोंक देना कत्तई न हो। यह एक हकीकत है कि दुनिया में बहुत सारे पशु-पक्षी हैं, जिनके कारण इंसान का जीवन न केवल आसन बनता है, बल्कि उनका होना मनुष्य जीवन में अभिन्न रूप से जुड़ा है। चौंकाने वाला तथ्य है कि धरती का मात्र पच्चीस प्रतिशत भाग ऐसा बचा है, जहां मनुष्य की गतिविधि न के बराबर है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि सन् 2050 में घटकर यह क्षेत्र दस प्रतिशत रह जाने वाला है। पृथ्वी की अपनी अलार्म घड़ी है, जो पूरी मानवजाति को जगाने की कोशिश कर रही है। अब भी हम अगर नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ी को कैसी बदसूरत दुनिया विरासत में देकर जाएंगे, यह सोचकर ही सिहरन होती है।

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