…और अंतिम क्षणों में गोडसे ने गांधी से कहा था-‘नमस्ते, गांधी जी’

राकेश कुमार आर्य

30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि मनाई गयी है। इस अवसर पर कुछ विचारणीय बातें हैं, जिन्हें इतिहास से ओझल करने का प्रयास किया गया है। उदयवीर ‘विराज’ की पुस्तक ‘तीन गांधी हत्याएं’ इस विषय में हमारे सामने बहुत कुछ स्पष्ट करती है। उक्त पुस्तक के अध्ययन से कई तथ्य स्पष्ट हुए जिससे नाथूराम गोडसे का ‘सिर फिर’ गया और उन्होंने गांधी हत्या का जुर्म कर दिया।

अमानुल्लाह खान के लिए लिखवाया पत्र

उक्त पुस्तक के लेखक से ज्ञात होता है कि एक बार महात्मा गांधी जी ने मौ. अली से अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्लाह खान के लिए पत्र लिखवाया था, कि तुम हिंदुस्तान पर हमला करो हम तुम्हें सहयोग करेंगे। गांधीजी अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए यहां पर फिर से विदेशी मुस्लिम शासन स्थापित कराने के लिए तैयार थे।

निजाम हैदराबाद को सत्ता सौंप दो

1914 में प्रथम विश्व युद्घ चल रहा था, अंग्रेज युद्घ में फंस गये थे इसलिए भारत की ओर से उन्हें पूरी तरह आश्वस्त करते हुए गांधी जी ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वे अपने विश्वास पात्र निजाम हैदराबाद को सत्ता सौंप दें, और जब युद्घ में विजयी हो जाएं तो वापिस आकर सत्ता ले लें। गांधी जी का इतना प्रेम नेपाल के राणा के प्रति नही था, यद्यपि नेपाल के राणा वंश के तत्कालीन शासक भी अंग्रेजों के प्रति कम वफादार नही थे।

सुभाष से विरोध का असली कारण

नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के लोकप्रिय अध्यक्ष थे, उनके रहते गांधी जी की आभा कमजोर होती थी। द्वितीय विश्व युद्घ 1939 में आरंभ हुआ, तब गांधी जी ने अंग्रेजों के विषय में कहा कि हमें इस समय अपने शत्रु की विपत्ति का लाभ नही उठाना है, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष नेताजी सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि यही उत्तम अवसर है जब हमें अपने संग्राम को तेज करना चाहिए और शत्रु को परास्त कर अपनी स्वतंत्रता हथिया लेनी चाहिए। सुभाष चंद्र बोस के इस उत्साह को गांधी जी ने अपने खिलाफ उनका दुस्साहस माना और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के अगले चुनाव में डा. पट्टाभिसीतारमैया को  सुभाष बाबू के सामने खड़ा कर दिया। जिसमें सुभाष बाबू की जीत हुई और गांधी जी के प्रत्याशी डा. पट्टाभिसीतारमैया को हार का सामना करना पड़ा, जिसे गांधी जी ने अपनी व्यक्तिगत हार मान लिया। गांधीजी ने सुभाष बाबू के उत्साह को ठंडा करने के लिए उनसे बोलना चालना छोड़ दिया, यही रास्ता नेहरू ने सुभाष के प्रति अपना लिया। परिणामस्वरूप सुभाष ने कांग्रेस तो छोड़ी ही साथ ही देश भी छोड़ दिया।

गांधी जी की अहिंसा

गांधी जी का अहिंसावाद बहुत ही सराहनीय माना गया है परंतु उक्त पुस्तक के अनुसार गांधीजी पतंजलि के योगदर्शन में उल्लिखित अहिंसा के पुजारी नही थे, ना ही वह किसी अन्य भारतीय धर्म, ग्रंथ में दी गयी अहिंसा की परिभाषा के अनुसार  अहिंसावादी थे। गांधी जी अहिंसा की परिभाषा को अपने अनुसार गढ़ रहे थे, उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी को उनकी बीमारी के समय 1944 में पैनीसिलिन का इंजेक्शन लगवाने से भी इसलिए मना कर दिया था कि इससे भी उन्हें हिंसा होती दीख रही थी। जबकि सरकार ने यह इंजेक्शन ब्रिटेन से विशेष रूप से मंगवाया था।

देश को मानसिक हिंसा से गुजरने के लिए विवश किया

जब-जब गांधीजी ये देखते थे कि उनकी बात मानी नही जा रही है, तब-तब वह अनशन का सहारा लेते थे। उक्त पुस्तक के लेखक का मानना है कि गांधीजी उस पिता की तरह थे जो अपने बच्चे को किसी बात पर डांटता है और उसकी पिटाई करने पर उसे रोने भी नही देता, बच्चा सुबकता है तो सुबकने भी नही देता। ऐसे चांटे गांधी जी देश पर अपने अनशन का चक्र चलाकर बार-बार मारते थे। पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपया न देने के बारे में देश के मंत्रिमंडल ने निर्णय ले लिया कि जब तक पाकिस्तान भारत के काश्मीर से अपनी सेनाएं वापिस नही बुला लेता है तब तक उसे यह धनराशि नही दी जाएगी। देश की सरकार का मानना था कि यदि पाकिस्तान को पचपन करोड़ रूपया दिया जाता है तो इस धन का प्रयोग वह भारत के खिलाफ युद्घ सामग्री खरीदने में करेगा। इस पर गांधीजी और माउंटबेटन का कहना था कि पाकिस्तान इस धनराशि का क्या करता है? यह उसका काम है। भारत को चाहिए कि उसे यह धनराशि तत्काल दी जाए। जब सरकार ने गांधी जी बात नही मानी तो गांधीजी ने 13 जनवरी 1948 से अनशन करना आरंभ कर दिया। देश की सरकार ने अगले दिन ही घुटने टेक दिये और गांधीजी ने बच्चे को पीटते-पीटते रोने न देने की उपरोक्त बात को सच कर दिया।

इस प्रकार गांधीजी देश पर मानसिक हिंसा करते रहे और देश उसे बर्दाश्त करता रहा। पाकिस्तान से आए विस्थापितों ने गांधीजी के लिए नारे लगाये कि गांधी मरता है तो मरने दो।

मुस्लिमों के प्रति दृष्टिकोण

गांधीजी का दृष्टिकोण मुस्लिमों के प्रति हिंदुओं की अपेक्षा नरम था, परंतु इसके बावजूद वह मुस्लिमों के नेता नही बन पाए। 1945 में देश की राष्ट्रीय असेम्बली के लिए जो चुनाव हुए थे उनमें मुस्लिम लीग को देश के सत्तानवे प्रतिशत मुस्लिमों ने पाकिस्तान बनाने के लिए अपना मत दिया था। ये चुनाव हुए ही इस बात के लिए कि देश का बंटवारा हो या ना हो। देश के 97 प्रतिशत मुसलमानों ने देश के बंटवारे के लिए अपना समर्थन दिया। तब गांधीजी ने लगभग तीन करोड़ मुसलमानों को देश में रखने के लिए जिद की और उन्हें देश न छोडऩे के लिए प्रेरित किया।

छह अगस्त 1946 को ब्रिटिश सत्ताधीशों ने नेहरू को सरकार बनाने का आमंत्रण दिया। तेरह अगस्त को नेहरू जी ने सरकार बनाने के लिए हां कह दी। दो सितंबर को उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया। मुस्लिम लीग नही चाहती थी कि सरकार में सम्मिलित हुआ जाए परंतु पंद्रह अक्टूबर को वह सरकार में शामिल हो गयी। लियाकत अली को देश का वित्तमंत्री बना दिया गया। लियाकत अली ने सरकार के कार्यों में रोडा अटकाने के लिए अपने पद का जी भर कर दुरूपयोग किया, और उन्होंने आर्थिक रूप से सरकार को असहाय करके रख दिया। जब मुसलमानों ने इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम लीग का समर्थन किया था और लियाकत अली देश की सरकार को इस प्रकार असहाय बना रहे थे तभी गांधीजी को समझ लेना चाहिए था कि वह मुस्लिमों के नेता नही हैं और मुस्लिमों पर उनके अहिंसावाद का कोई प्रभाव भी नही है।

गांधीजी मतांध, जिद्दी और अहंकारी थे

अनशन पर बैठना गांधीजी का जिद्दी स्वभाव दर्शाने  वाला एक निश्चायक प्रमाण है। स्वामी श्रद्घानंद ने कांग्रेस छोड़ते समय गांधीजी के इस जिद्दी स्वभाव की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें भरी सभा में यह कहा था कि गांधीजी! अंतरात्मा आपकी बपौती नही है, यह हमारे पास भी है और हम भी आत्मा के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं, और जब मैं ऐसा कर रहा होऊं तो समझना कि मैं आपका ही अनुकरण कर रहा हूंगा।

यह कहकर स्वामी श्रद्घानंद ने कांग्रेस छोड़ दी थी।

पाकिस्तान में जाकर शांतिमार्च करने का कार्यक्रम

1947 में जब देश का बंटवारा हो गया तो सारा देश प्रसव पीड़ा में हुए अधिक रक्तस्राव से आहत होकर कष्ट अनुभूूति कर रहा था। तब गांधीजी ने पाकिस्तान को भारत सरकार से 55 करोड़ रूपये दिलवाकर पाकिस्तान की बहुत वाहवाही लूटी। इससे उत्साहित होकर उन्होंने पाकिस्तान जाकर शांति मार्च निकालने का कार्यक्रम बनाया जिसके लिए सुशीला नायर को पाकिस्तान भेज दिया गया कि वह जाकर गांधीजी की यात्रा की तैयारी करायें। इससे गांधीजी के विरूद्घ एक नाथूराम गोडसे का ही नही बल्कि लाखों देशवासियों का सिर फिर गया था।

हिंदुओं को मस्जिद में नही जाना चाहिए था

दिसंबर, जनवरी के महीने में उत्तर भारत में अक्सर बर्षा होती है उस वर्ष भी ऐसा ही हुआ। पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थी यों ही खुले आकाश के नीचे पड़े थे। उनके शिविरों के कपड़े कट गये थे, और उनमें से पानी टपक कर लोगों को परेशान करने लगा था। तब कुछ  लोगों ने पड़ोस में एक मस्जिद में जाकर शरण ले ली। इस पर मुस्लिमों ने आपत्ति की। तब गांधीजी ने मुस्लिमों की आपत्ति को सही मानते हुए कहा कि यह हिंदुओं की गलती थी और उन्हें किसी भी परिस्थिति में मस्जिद में नही जाना चाहिए था।

जब हमारे लोग पाकिस्तान से उजड़कर भारत आ रहे थे तो उनके लिए भी गांधीजी का कहना था कि उन्हें भारत में नही आना चाहिए था बल्कि वहीं अपने शत्रुओं के हाथों मर जाना चाहिए। 5 नवंबर 1947 को उनसे एक पत्रकार ने पूछा कि मुस्लिमों के अत्याचारों के विरूद्घ हिंदुओं केा क्या करना चाहिए तो उन्होंने उपरोक्त जवाब देते हुए कहा कि उन्हें प्रतिकार नही करना चाहिए  और चुपचाप मर जाना चाहिए।  16 अगस्त 1946 को जब सुहरावर्दी ने बंगाल में ‘सीधी कार्यवाही दिवस’ मनवा कर हजारों हिंदुओं को मरवा दिया तो भी गांधीजी ने सुहरावर्दी को एक ‘भले आदमी’ का खिताब दिया। बंगाल की घटना की प्रतिक्रिया जब बिहार में हुई तो वहां पलड़ा हिंदुओं का भारी रहा। परंतु उस पर गांधीजी का वैसा दृष्टिकोण नही था जैसा बंगाल के उक्त हत्याकाण्ड के बारे में उनका था।

गोडसे और उनके साथी

‘हिंदू राष्ट्र’ नाम का एक अखबार गोडसे और उनके साथी नारायण आप्टे निकाल रहे थे। इसके संपादक नाथूराम गोडसे थे और प्रबंधक नारायण आप्टे थे। तेरह जनवरी को गांधीजी जब अनशन पर बैठे तो गोडसे ने अपना उत्तराधिकार पत्र लिख दिया जिसमें अपनी सभी बीमा पालिसियों के बारे में उन्होंने अपने व्यक्ति नामित कर दिये।

गोडसे ने अपनी टीम बनानी आरंभ की जिसमें गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, दिगंबर बडग़े और नौकर शंकर शामिल थे। बीस जनवरी को गांधीजी को मारने के लिए  योजना बनी। मदनलाल पाहवा ने बम विस्फोट किया पर यह योजना असफल रही। तब नाथूराम गोडसे ने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और अन्य साथियों को पीछे कर दिया।

9, 10 अगस्त 1947 को हिंदू महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आहूत की गयी। जिसमें गोडसे और उन जैसे अन्य युवाओं ने प्रस्ताव रखा कि देश के विभाजन को लेकर कांग्रेस से सीधा टकराव किया जाए। लेकिन इससे वीर सावरकर असहमत थे वह परिस्थितियों के अनुसार इस टकराव को उचित नही मान रहे थे। तब गोडसे और उनके साथियों ने मन बना लिया कि सावरकर और उन जैसे अन्य वरिष्ठ नेताओं को पीछे छोड़ दिया जाए और अपना ‘मिशन’ अपने आप पूर्ण किया जाए। गोडसे ने तीस जनवरी की गांधीजी की प्रार्थना सभा में जाकर अपना कार्य पूर्ण करने की योजना बनाई। गांधीजी अपनी प्रार्थना सभा में जाने से पहले सरदार पटेल से मिले। वह अपनी प्रार्थना के लिए दस मिनट लेट हो गये, तब वह तेजी से अपने प्रार्थना स्थल की ओर बढ़े। उनकी पोती मनु उनके साथ उनका सहारा बनकर चल रही थीं। तब गोडसे भीड़ को हटाते हुए गांधीजी के निकट आ गये और जैसा कि बाद में उन्होंने गांधीजी के विषय में अपने बयानों में बताया मैंने गांधीजी की देशभक्ति को नमन करने के लिए पहले यह विचार किया कि उन्हें गोली मारने से पहले नमस्ते की जाए। तब गोडसे ने गांधीजी से कहा-‘नमस्ते, गांधीजी’। इससे पहले कि गांधीजी गोडसे की नमस्ते का जवाब देते गोडसे ने अपनी गोलियां गांधीजी के सीने में दाग दीं। गांधीजी अ….अ….अ….करते हुए जमीन पर गिर पड़े। इस अ….अ….अ…. का अर्थ ‘हे राम’ निकाला गया। जबकि गांधीजी ने ऐसा कहीं कुछ नही कहा था। एक देशभक्त हमसे जुदा हो गया। गोडसे और उनके साथियों पर लालकिले में मुकदमा चला। आत्माचरण मुकदमे के न्यायाधीश थे, गोडसे ने अपने बयानों में 150 बिंदु ऐसे गिनवाए जिन्हेांने उसे गांधी हत्या के लिए प्रेरित किया। लेकिन ये बयान प्रकाशित न करने का आदेश न्यायाधीश ने दिया। अपीलीय न्यायालय के न्यायाधीश जी.डी. खोसला ने कहा था कि यदि उस समय उपस्थित दर्शकों को ज्यूरी के रूप में गठित कर दिया जाता तो वे गोडसे को भारी बहुमत से निर्दोष घोषित कर देते।

15 नवंबर 1949 को गोडसे व आप्टी को अंबाला जेल में फांसी दी गयी। गोडसे ने अपनी भस्म के बारे में कहा था कि उसकी भस्म गंगा में प्रवाहित न करके संभालकर रखा जाए जब तक कि उसे अखण्ड भारत में बह रही सिंधु नदी में प्रवाहित न किया जा सके। यह गोडसे का सपना था और उसकी वसीयत भी। 

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