“गाय का मिटना और हमारा मरना”

calf-cowराकेश कुमार आर्य
भारत के पूर्व कृषि मंत्री रहे डा. बलराम जाखड़ ने कहा था कि ”गाय का गोबर मल नही खाद है, जिसका मूल्य भारतीय किसान भली प्रकार जानता है। कृषि वैज्ञानिकों ने अन्वेषण करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है कि गोबर के सेन्द्रिय खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। इसके विपरीत रासायनिक खाद के प्रयोग से उस समय तो अच्छी फसल हो जाती है, परंतु भूमि की उर्वराशक्ति धीरे-धीरे क्षीण हो जाती है। फलस्वरूप हर वर्ष अधिकाधिक खाद तथा कीटनाशक दवाइयों की आवश्यकता होती है, जिससे खाद्यान्नों के उत्पादन की लागत बढ़ती चली जाती है और किसान को अंत में मिट्टी की उत्पादन क्षमता की हानि होती है।”
पूर्व कृषिमंत्री के इस कथन से सिद्घ होता है कि देश की सरकारों को वास्तविकता का बोध तो रहता है, परंतु व्यवहार में वास्तविकता लुप्त हो जाती है। सरकार की नीतियों में नीयत की विकृति का दोष होता है और उसका परिणाम देश और समाज की नियति पर पड़ता है। एक समय था जब हम विश्व में गो दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर होते थे। इस प्रथम स्थान को हमसे सर्वप्रथम अमेरिका ने छीना और हमें दूसरे स्थान पर कर दिया। बहुत देर तक प्रतियोगिता चलती रही कि फिर हम पहले स्थान पर आ जाएंगे। सरकार ने अपनी घोषित नीतियों में यह दर्शाया कि 21वीं शदी के प्रारंभ होने से पूर्व ही भारत विश्व का सबसे अधिक गो दुग्ध उत्पादन करने वाला देश बन जाएगा। परंतु अघोषित नीतियों के अंतर्गत देश में पशुवधशालाओं के ‘लाइसेंस’ जारी करने पर ढिलाई बरतनी आरंभ कर दी। फलस्वरूप देश में 1984 में जहां प्रति व्यक्ति 185 ग्राम दूध उपलब्ध था वह 2010 के आते-50-60 ग्राम से भी कम रह गया, और यह आंकड़ा भी वो है जिसमें मिलावटी दूध भी सम्मिलित है। अब देश में मिलावटी दूध की नदियां बह रही हैं। जिसके विरूद्घ देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी कड़ा दृष्टिकोण अपनाना पड़ा है। लोगों के स्वास्थ्य के खिलवाड़ करते लोगों के विरूद्घ कड़ा कानून लगाने और कड़ा दण्ड दिलाने की इच्छा सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्त की है। हम प्रयास तो आगे बढऩे का कर रहे थे और हट गये पीछे। किसी ने कारण खोजने तक का प्रयास भी नही किया।
तनिक कल्पना करें कि जब विश्व में डीजल-पेट्रोल के भण्डार समाप्त हो जाएंगे तो जहां-जहां डीजल-पेट्रोल के प्रयोग से कार्य किया जा रहा है। वहां-वहां क्या होगा? बैलों को समाप्त करके हमने विनाश को आमंत्रित किया है, यदि टै्रक्टर इंजन आदि भी डीजल के अभाव में खड़े रह गये तो क्या होगा? खेती का सर्वनाश हो जाएगा। बलराम जाखड़ हमें बताते हैं कि सन 1989 में प्रकाशित किये गये आंकड़ों के अनुसार डेरी उद्योग से प्रति हेक्टेयर 4548 रूपये की उत्पत्ति हुई जो कि धान गेंहूं रूपये 2443 मूंगफली-गेंहू रूपये 1870 गेंहू कपास रूपये 1798 तथा मक्का गेंहूं रूपये 1788 की अपेक्षा कहीं अधिक थी। इसी दिशा में और अधिक परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि भैंस वंश फार्मिंग की अपेक्षा गौवंश फार्मिंग में अधिक लाभ हुआ। आंकड़ों के अनुसार डेरी उद्योग के अंतर्गत भी गौवंश पर आधारित फार्मिंग में प्रति रूपये 100 की लागत पर रूपये 117 की आय हुई जबकि भैंस वंश फार्मिंग में रूपये 114 की आय हुई।”
कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि गाय, बैल की 100 किलोग्राम गोबर से तीन टन गोबर की कंपोस्ट खाद तैयार हो सकती है। एक गाय के वार्षिक गोबर से लगभग 80 टन खाद एक वर्ष में तैयार हो सकती है जिसकी कीमत यूरिया की 50 किलो की बोरी के मूल्य रूपये 250 से आंकी जाए तो लगभग दो लाख रूपये होती है। इसका अभिप्राय है कि एक बैल या गाय के गोबर से ही एक वर्ष में दो लाख के यूरिया खाद की बराबर का मूल्य वसूला जा सकता है। जिससे एक व्यक्ति की मासिक आय अपने एक बैल या गाय के गोबर से ही लगभग 16000 रूपये हो सकती है।
आवश्यकता सही दिशा में कार्य करने के लिए लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने की है। नई पीढ़ी को कुत्ते के मल से घृणा नही है, परंतु गाय के गोबर से घृणा है। भारत जैसे देश में लोगों की सोच में यह परिवर्तन रातों रात नही आ गया है। इस परिवर्तन को लाया गया है, जिसके पीछे एक सुनियोजित षडय़ंत्र है।
हमारे देश में यदि मीडिया अपना राष्ट्रधर्म निभाए और देश के किसानों को उनकी भाषा में ये समझाने लगे कि गोबर की खाद ही वास्तव में धरती का स्वाभाविक और प्राकृतिक भोजन है और इसी के संतुलित प्रयोग से धरती की उर्वरा शक्ति को बनाये रखा जा सकता है, तो सोच में आया विकार दूर हो सकता है। लाखों वर्षों से हमारे देश की धरती में गाय का गोबर मिलता रहा है इसलिए इस धरती की उर्वरा शक्ति अंधाधुंध रासायनिक खादों के प्रयोग के उपरांत भी बनी हुई है। यद्यपि हम इन रासायनिक खादों से लाखों हेक्टेयर भूमि को बंजर बनाकर बड़ी क्षति भी उठा चुके हैं।
श्री चोथमल जी गोयनका हमें बताते हैं कि यदि गोवंश की अवहेलना न होती, उनकी निर्मम हत्याएं न की जातीं, उनके गोबर गोमूत्र का समुचित उपयोग सही और आधुनिक ढंग से किया जाता, उसके गुणों के विषय में शोध की जाती, उनके उपयोग के लिए नयी तकनीक विकसित की जाती तो आज कृषि उत्पादन की स्थिति ही बहुत भिन्न होती देश में महंगाई नही बढ़ती, क्योंकि किसान जो साथ-साथ गोपाल भी है, उन्हें खेती करने में कोई लागत ही नही लगानी पड़ती, उसका उत्पादन अपने परिश्रम और प्राकृतिक सूत्रों से स्वत: ही होता है। खेती में लागत न आने के कारण अनाज और अन्य उत्पादन महंगे नही होते। सरकार को किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता खाद पर या अनाज पर नही देनी पड़ती, जनता पर करों का बोझ नही पड़ता जिसके परिणाम स्वरूप गरीबी और महंगाई दोनों ही नियंत्रण में रहते और विकास के साथ देश में समृद्घि भी बढ़ती।
वास्तव में गोयनका जी ने जो अपना विचार यहां प्रस्तुत किया है, इसी से हम सहमत हैं और इसी विचार से एक दिन देश की सरकारों को भी सहमत होना पड़ेगा। देश के अधिकांश लोगों की राय का प्रतिनिधित्व गोयनका जी करते हैं, परंतु देश का लोकतंत्र कुछ ऐसा रचा गया है कि यहां बहुमत पर अल्पमत शासन करता है। जिससे लोकतंत्र की वास्तविक भावना ही लुप्त हो रही है। सारे देश को अल्पमत ने अंधेरी सुरंग में छिपा दिया है और अंधेरे में लाठी घुमा घुमाकर ये प्रदर्शित किया जा रहा है कि देखिए! हम कितना परिश्रम और पुरूषार्थ कर रहे हैं? इन कथित परिश्रम और पुरूषार्थ करने वालों के लिए अंधेरे में से ही कहीं किसी कोने से तालियां बज जाती हैं, यद्यपि यह किसी को पता नही है कि तालियां बजाने वाले कौन हैं, ये स्वयं या कोई और? कुछ ही लोगों को पता है कि तालियां बजाने वाले वही हैं जो देश का नेतृत्व कर रहे हैं। अपनी पीठ अपने आप थपथपाकर देश को हांका जा रहा है, फलस्वरूप गाय मिट रही है और हम मर रहे हैं। गाय के मिटने के साथ-साथ हमारा मरना निश्चित है। जिस दिन देश का नेतृत्व इस सत्य को या फलितार्थ को समझकर अपनी कृषि नीतियों को बनाना आरंभ कर देगा उसी दिन से गोवंश की रक्षा का सार्थक प्रयास आरंभ हुआ माना जाएगा।

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