चीन के नेतृत्व में काम कर रहे आरसीईपी गुट में शामिल न होने से भारत को लाभ या नुकसान ?

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त्योहार के इस मौसम में ये पता लगाना दिलचस्प होगा कि भारत ने चीन से कितना माल आयात किया. अमेज़न और फ़्लिपकार्ट पर व्हाइट गुड्स की ऑनलाइन शॉपिंग करने वालों को अंदाज़ा हो गया होगा कि ऑर्डर किए गए अधिकतर सामान पर ‘मेड इन चाइना’ की मुहर लगी हुई थी.

चीन के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अक्तूबर में भारत ने चीन से पिछले साल अक्तूबर की तुलना में अधिक सामान आयात किया.

यानी मई में घोषित भारत सरकार की आत्मनिर्भरता की नीति अब तक असरदार साबित नहीं हो सकी है.

इससे ये सवाल भी पैदा होता है कि जिस कारण से मोदी सरकार ने पिछले साल नवंबर में ‘द रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप’ यानी आरसीईपी वार्ता से बाहर होने का एलान किया था – वो फ़ैसला सही था या नहीं.

ये फ़ैसला भारत को आत्मनिर्भर करने और घरेलू बाज़ार को बाहर की दुनिया से सुरक्षित और ज़्यादा मज़बूत बनाने की वजह से लिया गया था.

भारत को डर इस बात का था कि कहीं चीन के सस्ते सामान भारतीय बाज़ारों में आसानी से हर जगह उपलब्ध न हो जाएँ जिससे भारतीय कारख़ानों और उद्योगों को समस्या हो.

उस समय भारत के इस फ़ैसले से आरसीईपी वार्ता में शामिल देश हैरान हुए थे क्योंकि भारत शुरुआत से ही इस वार्ता में आगे था.

एकता में ताक़त एक पुरानी कहावत है और ये कहावत महामारी से जूझ रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए और भी सही साबित होती है.इसलिए जब रविवार को आरसीईपी के सभी 15 देशों ने ‘दुनिया की सबसे बड़ी ट्रेड डील’ पर सहमति जताई तो सदस्य देशों के नेताओं ने ख़ुशी का इज़हार किया.

इस मौक़े पर वियतनाम के प्रधानमंत्री न्यून-शुअन-फ़ूक ने इसे ‘भविष्य की नींव’ बतलाते हुए कहा, “आज आरसीईपी समझौते पर हस्ताक्षर हुए, यह गर्व की बात है. यह बहुत बड़ा क़दम है कि आसियान देश इसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं और सहयोगी मुल्कों के साथ मिलकर उन्होंने एक नए संबंध की स्थापना की है जो भविष्य में और भी मज़बूत होगा. जैसे-जैसे ये मुल्क तरक़्क़ी की तरफ़ बढ़ेंगे, वैसे-वैसे इसका प्रभाव क्षेत्र के सभी देशों पर होगा.”

आरसीईपी देशों के बीच हुआ समझौता एक मुक्त व्यापार समझौता है जिसका उद्देश्य आपस में टैरिफ़ और दूसरी बाधाओं को काफ़ी कम करना है. ये देश दुनिया की आबादी का 30 प्रतिशत हिस्सा हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इनका योगदान 30 प्रतिशत है. इनमें चीन और जापान जैसी दूसरी और तीसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. ये यूरोपीय संघ से भी बड़ा ट्रेडिंग ब्लॉक है.

आरसीईपी में 10 दक्षिण-पूर्व एशिया (आसियान) के देश हैं. इनके अलावा दक्षिण कोरिया, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी इसमें शामिल हुए हैं. आसियान के 10 सदस्य देश ये हैं: ब्रूनेई, इंडोनेशिया, वियतनाम, बर्मा, फ़िलीपीन्स, सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया और लाओस. आसियान देशों के साथ दक्षिण कोरिया, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पहले से लागू हैं. भारत का भी आसियान देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हैं लेकिन चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ नहीं हैं.

तो क्या मोदी सरकार ने आरसीईपी से बाहर निकल कर ग़लती कर दी? क्या अब चीन के नेतृत्व वाले आरसीईपी समझौते से क्षेत्र में चीन का असर और भी बढ़ेगा?

भारत की प्रतिक्रिया का इंतज़ार

भारत सरकार की तरफ़ से अब तक आरसीईपी डील पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आयी है लेकिन समाचार एजेंसी एएनआई को सरकारी सूत्रों ने बताया कि आरसीईपी पर मोदी सरकार का फ़ैसला पीएम मोदी की मज़बूत लीडरशिप दर्शाता है. रिपोर्ट में मोदी सरकार के फ़ैसले के पक्ष में कई तरह के आँकड़े भी दिए गए हैं और कहा गया है कि इस फ़ैसले के पीछे इंडस्ट्री और किसानों के हित की सुरक्षा करना था.

लेकिन दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं कि उन्होंने भारत सरकार के फ़ैसले को उसी समय ग़लत कहा था जब पिछले नवंबर को आरसीईपी से अलग होने का निर्णय लिया गया था.

उनकी राय में ‘भारत उस वक़्त अपनी माँगों को मनवाने के लिए आरसीईपी से और समय ले सकता था’.

डॉक्टर अहमद कहते हैं, “भारत को आरसीईपी में फिर से प्रवेश के लिए बातचीत करनी चाहिए वरना हमारी व्यापार लागत बहुत अधिक बढ़ जाएगी.

“आरसीईपी के सदस्य ग़ैर-सदस्य देशों के साथ साझेदारी करने के बजाय आपस में और एक-दूसरे के साथ अधिक व्यापार करेंगे. भारत के आसियान देशों, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय व्यापार समझौते हैं. लेकिन चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ इसका कोई व्यापारिक समझौता नहीं है.”

उदाहरण के लिए, अगर न्यूज़ीलैंड कोई ऐसा सामान भारत से खरीदता आया है जो किसी आरसीईपी सदस्य देश में भी उपलब्ध है तो अब वो भारत से सामान खरीदने के बजाय आरसीईपी वाले देश से हासिल करने को तरजीह देगा क्योंकि वो उसे कम टैरिफ़ की वजह से कम दाम में मिल जाएगा. यानी भारत के निर्यात पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.

भारत के लिए दरवाज़े अब भी खुले हैं

रविवार को आरसीईपी देशों की वर्चुअल बैठक में ये समझौता वियतनाम की राजधानी हनोई में हुआ जहाँ बैठक के अंत में ये भी कहा गया कि भारत के लिए दरवाज़े खुले हैं.

हनोई में ‘वियत थिंक टैंक लिमिटेड’ के अध्यक्ष डॉक्टर हा होआंग होप ने बीबीसी से कहा, “पीएम मोदी के पास आरसीईपी पर हस्ताक्षर नहीं करने के कई कारण हैं और मुझे नहीं लगता कि भारत जल्द आरसीईपी में शामिल होने पर विचार करेगा.”

चीन के सिचुआन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के एसोसिएट डीन प्रोफेसर हुआंग यूंगसॉन्ग के मुताबिक़ अगर भारत RCEP में शामिल होना चाहे तो चीन इसका विरोध नहीं करेगा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “अगर भारत चीन से डर की अपनी मानसिकता को दूर करता है और अपनी सामान्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए आवश्यक उपाय करके ग्रुप की रूपरेखा को अपनाता है तो इसके लिए आरसीईपी को गले लगाना काफ़ी आसान होगा. चीन सहित आरसीईपी के सभी सदस्यों ने खुले तौर पर भारत को इसमें शामिल करने की इच्छा व्यक्त की है. भारत को इससे फ़ायदा उठाना चाहिए.”

आम विचार ये है कि भारत जल्दबाज़ी में कोई क़दम नहीं उठाएगा. लेकिन दूसरी तरफ़ भारत की गहरी नज़र उस रुझान की तरफ़ भी रहेगी जो कोरोना महामारी के बाद की वैश्विक व्यवस्था की तरफ़ इशारा करेगा.

भारत के पास दूसरे विकल्प भी हैं. उदाहरण के तौर पर भारत ‘कॉम्प्रिहेन्सिव एंड प्रोग्रेसिव ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप’ (सीपी-टीपीपी) नाम की व्यापारिक संधि में शामिल हो सकता है जिसमें भारत के मित्र देश जैसे ऑस्ट्रेलिया, जापान और वियतनाम शामिल हैं.

विकल्प है समय नहीं

विकल्प तो है लेकिन समय शायद कम है. कोरोना एक नई विश्व व्यवस्था का कारण बन रहा है और कई पुराने रिश्ते टूट रहे हैं और नए रिश्ते जन्म ले रहे हैं.

आरसीईपी पर बातचीत पहले से चल रही थी लेकिन महामारी की वजह से इस में तेज़ी आई है. डॉक्टर फ़ैसल कहते हैं कि आरसीईपी के महत्व को समझने के लिए कुछ साल पीछे जाना होगा.

इसकी पहल चीन ने 2012 में उस समय की जब अमेरिका के नेतृत्व में ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप (टीपीपी) नाम की एक व्यापारिक संधि के निर्माण पर ज़ोर दिया गया. चीन को इसमें शामिल नहीं किया गया जबकि चीन के कई पड़ोसी देश इसके सदस्य थे. इसे चीन के ख़िलाफ़ एक व्यापारिक ग्रुप की तरह से देखा गया.

राष्ट्रपति ओबामा ने इसे काफ़ी आगे बढ़ाया लेकिन 2017 में राष्ट्रपति बनने के कुछ समय बाद ही डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को इस संधि से बाहर ले गये.

इसके बाद जापान के कहने पर दूसरे सदस्य देशों ने कहा कि अमेरिका के बग़ैर ही इस ग्रुप को आगे बढ़ाना चाहिए और इस तरह 2018 में इस पर सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किए और इसे टीपीपी से ‘कॉम्प्रीहेन्सिव एंड प्रोग्रेसिव ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप’ या सीपी-टीपीपी का नाम दिया गया.

बीबीसी से साभार

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