एंटोनियो माइनो उर्फ सोनिया गांधी की कारस्तानी बरपी है अर्णब पर

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राष्ट्र-चिंतन

*अर्नब से ज्यादा जहरीला तो* *रबिस,बरखा,प्रनब राजदीप आदि हैं*

*विष्णुगुप्त*

आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम चोर कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम दंगाई कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम भ्रष्ट कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जहरीला कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम मुस्लिम विरोधी कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम देश तोड़क कह सकते हैं, आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरेआम देशद्रोही कह सकते हैं, यह सब अभिव्यक्ति की आजादी हैं, आपको इसके लिए जेल नहीं जाना होगा, इसके लिए आपको कोई प्रताड़ना नहीं झेलनी होगी, इसके लिए आपको कोई आपमानजनक परिस्थियों का सहचर नहीं बनना होगा, इसके लिए आपको कोई तिरस्कार नहीं झेलनी होगी, बल्कि आपको ऐसी अमान्य और जहरीली टिप्पणियों के लिए कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जिहादी मानसिकता के सहचरों की ओर से प्रशंसा मिलेगी, इसके लिए आपको फैलोशिप मिलेगी, इसके लिए आपको बडे अखबारों और बडे चैनलों में नौकरी मिल सकती हैं, कांग्रेस की रखैल एनजीओ राजीव गांधी फाउंडेशन जैसे हजारों एनजीओ से कोई न कोई स्टाइपन मिल जायेगा।
पर आप जैसे ही इटली की बूढी बाला एंटोनियों माइनों के खिलाफ एक शब्द भी बोल दिये, उसकी हैसियत पर प्रश्न खड़ा कर दिये, उसकी जेहादी और एनजीओ तथा विदेशी परस्त राजनीति की पोल खोल दी, या फिर उसकी भ्रष्टचार की कहानियां कह दी, भ्रष्ट सोनिया सास के भ्रष्ट दामाद राबेट बढेरा पर कोई भ्रष्टचार-कदाचार पर कोई प्रश्न खड़ा कर दिया, कांग्रेस की मुस्लिम परस्त राजनीति पर प्रश्न खड़ा कर दिया तो फिर आपकी खैर नहीं, आपके दुर्दिन शुरू हो जायेंगे, आपके खिलाफ मनगढंत, तथ्यहीन और भ्रामक आरोप लग जायेंगे, आपकी प्रताड़ना के दौर शुरू हो जायेगी , आपकी जेल की सजा सुनिश्चित कराने के लिए खेल शुरू हो जायेंगे। अगर आपका वर्तमान ठीक है, अगर आपका दामन भी पूरी तरह से ठीक है, आपके पास संपत्ति नाम की कोई चीज नहीं है तो फिर आपको सांप्रदयिक कह कर सार्वजनिक प्रताड़ना की प्रक्रिया चलेगी, कहा जायेगा कि आप पत्रकार नहीं है, आप लेखक नहीं है, आप साहित्यकार नहीं है, आप बुद्धिजीवी नहीं है, आप किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं है, आप तो सिर्फ और सिर्फ आरएसएस के मोहरे हैं, आरएसएस के सांप्रदायिक मोहरे और दंगाई हैं, आपको लेखन कार्य करने का अधिकार नहीं है, आपको पत्रकारिता करने का अधिकार नहीं है, आप अक्षूत ही नहीं बल्कि उपहास और प्रताड़ना तथा अपमान के पात्र बना दिये जायेंगे। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और जिहादी मानसिकता के पत्रकार, राजनीतिज्ञ और जिहादी गठजोड़ ऐसा ही खेल खेलता रहता है, यह कौन नहीं जानता है?

अर्नव गोस्वामी का कसूर क्या था? अर्नब गोस्वामी ने ऐसी कौन सी गुस्ताखी कर दी थी? जिससे बाल ठाकरे का पुत्र उद्धव ठाकरे और एंटोनियों माइनों उसके खिलाफ ऐसे पडे कि कोई एक नहीं बल्कि उस पर दर्जनों मुकदमे डाल-लाद दिये? उद्धव ठाकरे और एंटोनियों माइनों ने अर्नब की कसौटी पर जो जहरीली प्रताड़ना की शुरूआत की है वह जहरीली प्रताड़ना अन्य राज्यों की सरकारों में शुरू हो गयी और वैसा ही खेल शुरू हो गया तो फिर क्या होग?, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के लिए कितनी विकट और खतरनाक परिस्थितियां होगी, पत्रकारिता की अर्थी निकल जायेगी, एंटोनियों माइनों और उद्धव ठाकरे की इस करतूत का दुष्परिणाम ईमानदार और कर्तव्यशील पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को झेलना होगा, खासकर एनजीओ चलाने वाले पत्रकार और तथाकथित सक्रियतावादी सिर्फ प्रताड़ना के ही शिकार नहीं होगे बल्कि उनकी जगह जेल होगीे। क्या यह सही नहीं है कि पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी के भेष में अधिकतर कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और जिहादी लोग एनजीओ चलाते हैं, देश को बेचकर विदेशों से पैसा लेते हैं और अपना जीवन ऐशोआराम से व्यतित करते हैं, उनकी पहली प्राथमिकता पंच सितारा और अपसंस्कृति होती है। कहना गलत नहीं होगा कि फिर ऐस पुनरावृति बढ़ने पर ऐसी संस्कृति के लोग जेल में ही होंगे?

सुनिश्चित तौर पर अर्नब गोस्वामी को एंटोनियों माइनों से उलझने का दुष्परिणाम मिला है। सोनिया गांधी को सरेआम एंटोनियों माइनों कहने और प्रश्न पूछने की गुस्ताखी की थी अर्नब गोस्वामी ने। आज तक सोनिया गांधी को इस भाषा में कौन पुकारने और ललकारने का साहस किया था? क्या सोनिया गांधी का असली नाम एंटोनियों माइनों नहीं है? एंटोनियों माइनों का नाम परिवर्तन कर सोनिया गांधी बन जाना और उनकी नागरिकता को लेकर आज भी प्रश्न खड़े किये जाते हैं। एंटोनियों माइनों की नागरिकता को लेकर ही कभी राष्टपति ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था जबकि उस समय सोनिया गांधी के पास बहुमत भी नहीं था, उन्ही की पार्टी के वरिष्ठ सदस्य और आज कांग्रेस के गठबंधन दल के नेता शरद पवार की टोली ने एंटोनिया माइनों को प्रधानमंत्री बनने से रोका। शरद पवार की टोली में पीए संगमा और मुलायम सिंह यादव शामिल थे। मुलायम सिंह यादव से सोनिया गांधी आज भी दुश्मनी रखती है। सोनिया गांधी अपने दुश्मनों को कभी भलूती नहीं है और हमेशा अपने दुश्मनों का मटियामेट करने की सपना देखती रहती है। इसका उदाहरण जितेन्द्र प्रसाद हैं। जितेन्द्र प्रसाद ने सोनिया गांधी को चुनौती दी थी, अध्यक्ष पद की दावेदारी ठोकी थी। कांग्रेस कार्यालयों में प्रचार के लिए जितेन्द्र प्रसाद को घंुसने तक नहीं दिया जाता था। कांग्रेस के सभी कार्यालय जितेन्द्र प्रसाद के लिए बंद कर दिये गये थे और कांग्रेसी लोग जितेन्द्र प्रसाद को देखते ही भाग खडे होते थे। जितेन्द्र प्रसाद चुनाव हार गये। फिर भी जितेन्द्र प्रसाद की प्रताड़ना बंद नहीं हुई थी। एंटोनिया माइनों टोली द्वारा दी गयी प्रताड़ना से जितेन्द्र प्रसाद की ब्रेन हैमरेज से मौत हो गयी थी। सीतराम केसरी का प्रश्न तो और भी जहरीला है, अलोकतांत्रिक हैं और क्रूरतापूर्ण है। एक निर्वाचित अध्यक्ष को एंटोनियों माइनों ने लात मार कर हटायी थी और अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गयी थी। सीताराम केसरी की इस सदमें में मौत हो गयी। सीताराम केसरी के दाह संस्कार में भी एटोनियों माइनों शामिल तक नहीं हुई थी। आज तक कांग्रेस सीताराम केसरी की कभी जयंती तक मनाती है। ये उदाहरण साबित करते हैं कि एंटोनियों माइनों कितनी क्रूर हैं और कितनी अलोकतांत्रिक है।
अर्नब ने एंटोनियो माइनों ने प्रश्न क्या पूछा था? वह प्रश्न क्या जहरीला था? प्रश्न तो जहरीला कदापि नहीं था। पालधर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की हत्या पर बयान देने के लिए एंटोनियों माइनों को ललकारा भर था। प्रश्न पूछता था कि पालधर घटना पर एंटोनियों माइनों का खानदान सांइलेंट क्यों हैं? पालधर की घटना एक लोमहर्षक घटना थी। इतनी लोमहर्षक घटना लोगों को दहला कर रख दी थी। इस घटना में ईसाई मिशनरियों की साजिश थी। ईसाई मिशनरियों की पहुंच एंटोनियों माइनों तक थी। यही कारण था कि अर्नब एटोनियों माइनों से जवाब लेने के लिए उत्तेजित पत्रकारिता पर उतर आये थे। यहां यह प्रश्न उठता है कि मुस्लिमों की छोटी-छोटी और आम हत्याओं पर भी एंटोनियों माइनों का खानदान हाय तौबा मचाता है। गौ हत्या का आरोपी और जिसके घर से गौ मांस प्राप्ति का प्रमाण साबित हुआ था उस अखलाक के लिए एंटोनियों माइनों का खानदान ने किस प्रकार से राजनीति उबाल पैदा की थी, यह भी जगजाहिर है। जब एंटोनियों माइनों का खानदान मुस्लिम-ईसाइयों की आम घटनाओं पर भारत सरकार को जिना हराम कर देता है तो फिर हिन्दू साधुओं की हत्या पर एक बयान तक सामने नहीं आना, यह आश्चर्यजनक ही नहीं बल्कि चिंता की बात है। हिन्दुओं के साथ इस तरह के अक्षुत व्यवहार पर एक पत्रकार द्वारा एंटोनियों माइनों को ललकारना और जवाब मांगना कहां तक गलत है? एंटोनियों माइनों से जवाब मांगने पर कांग्रेस किस प्रकार से उफान मचायी थी यह भी जगजाहिर है। कांग्रेसियों ने इसे एंटोनियों माइनों का अपमान माना था और देश भर में कई मुकदमें भी दर्ज कराये थे। उद्धव ठाकरे की सरकार ने भी एंटोनियों माइनों को खुश करने के लिए अर्नब के खिलाफ क्रूरता शुरू कर दी थी।
उद्धव ठाकरे की सरकार तथ्यहीन और बदलेपूर्ण कार्रवाई का उदाहरण यहां प्रस्तूत है। टीआरपी कांड में ही मुबई पुलिस कमिशनर की क्रूरता और मूर्खता देख लीजिये। टीआरपी कांड के एफआईआर में रिपब्लिक टीवी का कहीं नाम नहीं था। नाम आज तक का और अन्य चैनलों का था। पर मुबंई पुलिस कमिशनर ने प्रेस कांर्फेंस में बदनाम रिपब्लिक टीवी को किया। बाद में एफआईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम जोडा गया। यह प्रमाणिक तथ्य है। जिस मामले में अर्नब को जेल भेजा गया है उस मामले की भी सच्चाई देख लीजिये। महराष्ट पुलिस ने उस केस में पहले ही क्लोजर रिपोर्ट जमा कर चुकी थी। एंटोनियों माइनों की क्रूरता सामने आने पर उद्धव ठाकरे ने फिर से उस केस की जांच के नाम पर हथकंडा अपनाया और परिणाम सामने है। जब कोई अन्य अपराध साबित करने में असफलता हुई तो फिर उस कथित आत्महत्या के बंद मामले को मोहरा के तौर पर प्रस्तुत कर दिया गया और इस प्रकार उद्धव ठाकरे अर्नब की प्रताड़ना और एंटोनियों माइनों को खुश करने में कामयाब हो गये।
उद्धव ठाकरे ने जिस प्रकार की क्रूरता दिखायी है और जिस प्रकार की प्रताड़ना नीति अपनायी है वह कभी एंटोनियों माइनों खानदान के लिए भी भारी पडने वाला है। आपको सुकन्या केश याद होगा। सुकन्या प्रकरण राहुल गांधी से जुड़ा हुआ है। सुकन्या प्रकरण में राहुल गांधी पर बलात्कार के आरोप थे। पुलिस और सीबीआई पर उस प्रकरण के रफा-दफा करने के आरोप लगे थे। सुकन्या कौन थी और वह अभी कहां हैं? इसकी कोई खबर नहीं है। उद्धव ठाकरे की राह पर अगर योगी आदित्यनाथ चल निकले तो फिर राहुल गांधी की खैर नहीं, राहुल गांधी का भी वही हाल हो सकता है जो हाल उनके मोहरे उद्धव ठाकरे ने अर्नब का किया है। अगर योगी आदित्यनाथ ने सुकन्या बलात्कार कांड फिर से खोल दिया और अपनी सत्ता की शक्ति से पुलिस को दबाव डालकर बलात्कार की बात सच करा दी तो फिर राहुल गांधी को भी जेल जाना ही होगा? इसी प्रकार दिल्ली में हुए सिख दंगों और अन्य दूसरे मामलों में हो सकता है।
अर्नब से ज्यादा जहरीला और उफान पैदा करने वाले पत्रकार तो रबिस कुमार, बरखा दत्त है और राजदीप सरदेसाई है। राजदीप सरदेसाई पर गाजियाबांद के एक डाॅक्टर को ब्लैकमेल कराने के भी आरोप है जिसमें उनकी जगहंसाई कोर्ट में जारी है। राजदीप सरदेसाई कांग्रेस, एनजीओ और जिहादी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। रबिस कुमार अपने को छोड़ कर अन्य सभी चैनलों को नहीं देखने का आह्वान करने में शर्म नहीं करते हैं, दिन-रात मोदी सरकार को कोस-कोस कर कांग्रेसी हितैषी बन गये, राहुल गांधी का प्रत्यारोपित साक्षात्कार कराते हैं। रबिस कुमार का भाई कांग्रेस से चुनाव तक लड़ता है। रबिस कुमार के भाई पर एक दलित लडकी के साथ बलात्कार करने के आरोप हैं। टूटपूजियां पत्रकार प्रनब राॅय कैसे खरबपति बन गया, उस पर दूरदर्शन के टैप बेच कर और अन्य माध्यमों से भ्रष्टचार के आरोप है, प्रनब राॅय पर आयकर की जांच जारी है। बरखा दता टूजी भ्रष्टचार में रंगे हाथ पकडी जाती है। बरखा दत्त सीधे तौर पी चिदम्बरम और कपिल सिब्बल से जुडी रही है। कपिल सिब्बल के चैनल में वह सर्वेसर्वा थी। बाद में कपिल सिब्बल की पत्नी ने अपने चैनल से बरखा दत्त को कई अरोप लगाकर निकाल बाहर की थी। कपिल सिब्बल का वह चैनल बंद हो चुका है।
वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी कीड़े टाइप के पत्रकारों ने बहुत ही खुशी मनायी हैं और इन्होंने ऐसा प्रदर्शन किया मानों ये पत्रकारिता के निष्पक्ष प्रहरी है। वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारिता ने किस तरह से एंकाकी और प्रत्यारोपित खेल-खेला है, यह भी जगजाहिर है। वांमपंथी, कांग्रेसी और जिहादी मानसिकता के पत्रकारों को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। उद्धव ठाकरे ने जो एक रास्ता दिया है वही रास्ता वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी मानसिकता के पत्रकारों पर खतरनाक और हिंसक रूप से भारी पडने वाला है। अब देश भर में भाजपा की सरकारें भी वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारों के पुराने और नये कुकर्मों, भ्रष्टाचारों और अन्य अमान्य गतिविधियों को खोल कर जेल में डालेंगी। इसलिए वामपंथी, कांग्रेसी और जिहादी पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों की यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं है।
निश्चित तौर पर उद्धव ठाकरे ने एंटोनियों माइनों को खुश करने और अपनी गठबंधन की सरकार को पूरे समय तक चलाने के लिए इंतजाम कर लिया है। पर उद्धव ठाकरे के इस कू्ररता के रास्ते से एंटोनियों माइनों का खानदान और कांग्रेसी, वामपंथी तथा जिहादी मानसिकता के पत्रकार भी शिकार होंगे। फिर तथाकथित अभिव्यक्ति की आवाज देने वाले भी प्रताड़ना के शिकार होने से नहीं बचेंगे। इस खतरे को पहचानों।

*संपर्क …..*
*विष्णुगुप्त*
*मोबाइल नंबर …* 9315206123

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