कितना बदल (गिर) गया इंसान? – अब राजनीति से प्रेरित होते हैं बलात्कार भी

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राजनीति से प्रेरित बलात्कार पर मचता शोर

 

                                     प्रतीकात्मक

जब भी देश के किसी भी कोने में चुनाव होने को होते हैं, विपक्ष सरकार की नाकामी पर प्रहार करने की बजाए कभी #me too, #intolerance, #award vapasi, #not in my name, #mob lynching और #freedom of expression आदि गैंग जनता को भ्रमित करने सडकों पर उतर आते हैं। क्योकि मोदी सरकार का विरोध करने लायक इनके पास कोई मुद्दा ही नहीं है। जबकि मुद्दे बहुत हैं, परन्तु विपक्ष को डर है कि कहीं सत्ता पक्ष उन्ही मुद्दों पर विपक्ष को ही घेर कर कहीं का न छोड़े। इन्ही लोगों के कांड जानने के लिए नीचे दिए लिंक का गंभीरता से मनन कर वास्तविकता से रूबरू हों।  

ये वही विपक्ष है जब अखिलेश यादव के कार्यकाल में बलात्कार होने पर मुलायम सिंह ने कहा था कि “बच्चों से गलती हो जाती है”, किसी के विरोधी स्वर नहीं निकले, सब मुंह में दही जमाए बैठे रहे। दूसरे, उत्तर प्रदेश की घटनाओं पर इतना अधिक हंगामा करने वाले अपने शासित राज्य राजस्थान में चुप्पी साध लेते हैं। क्यों? आखिर इस दोगली नीति से कब तक जनता को भ्रमित किया जाता रहेगा?   

 

वर्तमान विपक्ष जनता को यह भी बताए कि उनके कार्यकाल में क्या बलात्कार नहीं हुए? लेकिन कोई शोर नहीं मचा। पार्षद नौकरी दिलाने अथवा स्थायी करवाने के महिला अध्यापिकाओं को देर रात घर बुलाकर अपनी रातें रंगीन करते थे। विश्वास न हो 80 दशक के पंजाब केसरी का अवलोकन करें। तंदूर कांड और न जाने कितने कांड हुए। कुछ प्रकाश में आ गए और कुछ ठंठे बस्ते में दफ़न हो गए।

लेकिन अब पिछले कुछ दिनों से अपहरण और बलात्कार की जिन घटनाओं ने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है, वे पहली बार हुई हों ऐसा तो नहीं है और आगे भी वे नहीं होंंगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। हमें तो बचपन से सिखा दिया जाता है कि लड़की लडके में फर्क तो ईश्वर ने ही कर दिया है तभी तो वह शारीरिक रूप से कमजोर है, कि वह तो घर की इज्जत है। उसे किसी ने छू लिया या उसका दैहिक शोषण किया तो घर की इज्जत तो गई ही उस लड़की का लोक परलोक भी गया; मुंह छिपा कर जीने के सिवाय उसके पास और कोई उपाय है क्या ? इसके बावजूद आजतक किसी भी मां-बाप या उसके अध्यापक ने उसे अच्छी बुरी छुवन का फर्क समझाना भी कभी जरूरी नहीं समझा; कुल मिला कर इन सब का नतीजा यह निकला कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखा। हमारे आसपास ऐसे हादसे रोज होते रहे और हम यह सोच कर मुंह ढांप कर सोते रहे कि छोड़ो यार हमारे साथ ऐसा थोड़े न हुआ है !

भले ही कुछ दिनों से अपहरण और बलात्कार की जिन घटनाओं ने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है, वे पहली बार हुई हों ऐसा तो नहीं है और आगे भी वे नहीं होंंगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। हमें तो बचपन से सिखा दिया जाता है कि लड़की लडके में फर्क तो ईश्वर ने ही कर दिया है तभी तो वह शारीरिक रूप से कमजोर है, कि वह तो घर की इज्जत है। उसे किसी ने छू लिया या उसका दैहिक शोषण किया तो घर की इज्जत तो गई ही उस लड़की का लोक परलोक भी गया ; मुंह छिपा कर जीने के सिवाय उसके पास और कोई उपाय है क्या ? इसके बावजूद आजतक किसी भी मां-बाप या उसके अध्यापक ने उसे अच्छी बुरी छुवन का फर्क समझाना भी कभी जरूरी नहीं समझा; कुल मिला कर इन सब का नतीजा यह निकला कि हमने इतिहास से कभी कोई सबक नहीं सीखा। हमारे आसपास ऐसे हादसे रोज होते रहे और हम यह सोच कर मुंह ढांप कर सोते रहे कि छोड़ो यार हमारे साथ ऐसा थोड़े न हुआ है !

गनीमत है कि जागरूक और जिम्मेदार मीडिया ने 1972 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर की एक आदिवासी लड़की मथुरा का केस उछाल दिया वरना इस देश में आदिवासी और दलित लड़कियों/महिलाओं की भी भला कोई इज्जत होती है !!! जब चाहो चुटकियों में मसल दो, कोई आंख तक उठा कर नहीं देखेगा । दो स्थानीय सिपाहियों ने बलात्कार किया था उस आदिवासी लड़की मथुरा का। पर असल बात तो अभी बताई ही नहीं। ऐसा जघन्य अपराध करने के बावजूद सरकार उन पर मुकदमा नहीं चलाती, बल्कि शाबासी देते हुए उनका केस लड़ती है ! सरकारी पक्ष अदालत में इसे उचित ठहराते हुए दलील देता‌ है कि मथुरा को तो अलग अलग मर्दों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की ‘आदत’ है। सरकारी वर्दीधारी आरोपी हों और जबरदस्ती बनाए गए सरकारी गवाह, तो‌ फैसला क्या होगा अनुमान लगाना कठिन नहीं है ! देखते ही देखते बरी हो गए वे दोनों सिपाही जिला अदालत से। हाई कोर्ट की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया और मामले का निपटारा आज 46 साल के बाद भी नहीं हुआ।

1973 में एक क्रूरतम बलात्कार का शिकार हुई थी केरल की नर्स अरुणा शानबाग जिसकी मौत 42 साल कोमा में रहने के बाद हुई। चूँकि उस समय तक सोडोमी को कोई अपराध ही नहीं माना जाता था, इसलिए आरोपी पर बलात्कार कानून के तहत न तो कोई केस चला और न हीं कोई सजा हुई।

बलात्कार के घृणित मामलों में भी जाति और वर्ण कितनी अहम भूमिका निभाता है इसका एहसास एक बार फिर 1992 में हुए भंवरी देवी मामले में हुआ। छोटी सी सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी राजस्‍थान के भतेरी गांव में काम कर रही थीं। उसने जब बाल विवाह के खिलाफ बोलना शुरू किया तो यह ऊंची जाति के लोगों को सहन नहीं हुआ। उसे सबक सिखाने के लिए पांच लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया। बहुत दिनों तक मीडिया में बने रहने के बावजूद भंवरी देवी को छोटी जाति का होने की वजह से आज तक न्याय नहीं मिल सका।

1996 में सामने आया 25 साल की प्रियदर्शिनी मट्टू का मामला जो दिल्ली में कानून की पढ़ाई कर रही थी। सतोष कुमार सिंह नामक शख्स ने उसी के घर में बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी थी। इस केस में भी स्‍थानीय अदालत ने संतोष कुमार सिंह को बरी कर दिया था।

2005 में हुए इमराना रेप ने तो अलग धर्म के लिए अलग कानून की नई समस्या ही देश के सामने खड़ी कर दी । इस मामले में उत्तर प्रदेश के एक गांव में इमराना का बलात्कार उसके अपने ससुर ने ही किया था। फिर भी गांव के बुजुर्गों ने इसे आपसी सहमति का मामला माना और इमराना को फरमान सुनाया कि वह अपने पति को छोड़ कर अब से अपने ससुर को ही पति मान ले। लेकिन जागरूक मीडिया ने खबर खोद निकाली और नतीजतन मामला कोर्ट में पहुंचा और पीड़िता इमराना को न्याय देते हुए अदालत ने ससुर को 10 साल की सजा सुनाई।

2012 में सबसे ज्यादा भयानक और क्रूरतम रेप केस दिल्ली रेप केस निर्भया का माना जाता है जिसने देश को दहला कर रख दिया जिसके चलते संसद को एक कड़ा भी बनाना पड़ा। इसमें छः लोग शामिल थे जिनमें से एक नेआत्महत्या कर ली, चार को फांसी और एक नाबालिक को सुधार गृह भेजा गया।

लेकिन हुआ क्या? आज भी किसी न किसी जगह पर एक घंटे में चार रेप होते हैं; घरों में बाप और दूसरे रक्त संबंधी इन्हीं पाक रिश्तों की आड़ में उसे अपना शिकार बनाते हैं, पुलिस स्टेशनों तक में भी उनसे रेप किया जाता है !

क्या महिला सुरक्षित है?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही साल 2013 से ले कर आज तक रोजाना 88 रेप और गैंगरेप की वारदातें होती हैं, यानी एक घंटे में चार ! ये तो वो आंकड़े हैं जिनकी रिपोर्ट हुई ! बहुत से मामलों में तो अलग अलग वजहों से रिपोर्ट तक नहीं होती ! कानून तो यह भी कहता है बिना सहमति पत्नी से शारीरिक संबंध बनाना भी रेप है ! लेकिन होता है और कोई महिला मुंह तक नहीं खोल पाती ! घर के अंदर ही नजदीकी रक्त संबंधी ही बच्चियों से बलात्कार कर जाते हैं लेकिन घर की बड़ी बूढ़ियाएं घर की इज्जत के नाम पर मामले को वहीं का वहीं दबा देती हैं! किससे फरियाद करें ये बेचारी बच्चियां?

घर भी अगर उनके लिए सुरक्षित स्थान नहीं है तो और कहां होगा ?इस अवधि के दौरान तो किरण खेर जैसे सांसद बलात्कार को भारतीय संस्कृति का अंग तक बताने लगे हैं ! बलात्कारियो के समर्थन में तिरंगा लेकर जलूस तक निकलने लगे हैं ! धर्म (न्याय) से धड़ा प्यारा की नीति पर चलने वाली भाजपा सरकार के लिए हत्या, डकैती, बलात्कार जैसे अपराध तो जैसे अर्थहीन हो गए बशर्ते उन्हें करने वाले लोग आंख मूंद कर उसका समर्थन करते हों ! कथुआ, उन्नाव, अहमदाबाद से होते हुए हाथरस/ बलरामपुर तक एक लंबा सफर तय कर लिया है इन संगीन अपराधों ने ! मीडिया, अदालत, दूसरी सांविधिक संस्थाओं पर जबरदस्त पकड़ के बावजूद सरकार न तो‌ इसके खिलाफ जनमत ही खड़ा कर पाई है और न ही इस पर लगाम लगा पाने में कामयाब हो सकी है ! कई बार तो यह भी लगता है जैसे वह यौन अपराधों से मुंह ही मोड़ चुकी है और चुपचाप अपराधियों के साथ खड़ी हो गई है !

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