पाकिस्तान में नवाज शरीफ अपने पुराने शत्रु परवेज मुशर्रफ को शांत करने की तैयारी में हैं। जरदारी राष्ट्रपति रहते हुए मुशर्रफ को अपनी पत्नी बेनजीर भुट्टो की हत्या के अपराध में सजा दिलाने के लिए उतावले हैं। इन दोनों नेताओं की इस सोच का प्रभाव पाकिस्तान की सेना पर पड़ना स्वाभाविक है। नवाज शरीफ वर्तमान पाक सेनाध्यक्ष के उत्तराधिकारी के प्रति खासे चिंतित हैं। वह अपने लिए फिर किसी मुशर्रफ को पैदा करना नही चाहेंगे। परंतु मुशर्रफ के साथ जो कुछ होने जा रहा है, उसका प्रभाव सेना पर नही पड़ेगा, यह दावे से कहीं जा सकता। क्योंकि पाकिस्तान की सेना में अभी भी परवेश मुशर्रफ के चाहने वालों की कमी नही है। इसलिए नवाज शरीफ के लिए नये सेनाध्यक्ष का चुनाव करना बड़ा कठिन है। वे ऐसे सेनाध्यक्ष को शायद ही खोज पाएं जो भारत के प्रति सदाशयता रखता हो और पाकिस्तानी आतंकी शिविरों को बंद कराके दोनों मुल्कों के बीच वास्तव में अमन पैदा करने को प्राथमिकता देता हो। पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को सेना का खुला संरक्षण मिलता है, इसलिए कठमुल्ला, आतंकी संगठन और सेना ये तीनों मिलकर वहां की राजनीति को अपने द्वारा नियंत्रित रखते हैं। यह आवश्यक नही है कि इन तीनों के साथ वहां की सरकार भी हो या जनता भी हो। जनता कई बार लोकतंत्र के पक्ष में निर्णय दे चुकी है, परंतु लोकतंत्र का हश्र हमेशा सैन्य शासन के लौटने में ही होता रहा है। इसलिए वहां की सरकार और जनता पर सैन्य शासन का जिन्न हमेशा हावी रहता है। अब भी नवाज शरीफ चाहे जो कहें पर उनकी सरकार पर ऊपरिलिखित तीनों शक्तियों का भारी मनोवैज्ञानिक दबाव है। इसी मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते सीमा पर भारत के पांच सैनिकों की हत्या कर दी गयी। नवाज शरीफ चुप रहे, कश्मीर में उनके आते ही किश्तवाड़ की घटना हो गयी और वह चुप रहे। उनकी चुप्पी बता रही है कि वह फिर उसी आपराधिक तटस्थता को अपना रहे हैं जो उन्होंने कारगिल युद्घ के समय अपनायी थी। वह अच्छे हो सकते हैं, पर वह कभी स्वयं को अच्छा साबित नही कर पाए।
नवाज शरीफ के आते ही चीन की भारत के प्रति शत्रुता पूर्ण चालें बढ़ गयी हैं। वह भारत को पाकिस्तान के साथ मिलकर घेरने की रणनीति पर कार्य कर रहा है। चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत पर आक्रमण करने की रणनीति को अंजाम देना चाहता है। हमारे सामरिक विशेषज्ञों की राय है कि भारत को इस बार दो तरफ से घेरा जा सकता है। चीन पूरे पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से काट सकता है तो पश्चिम में पाक कश्मीर पर हमला बोलकर उसे हड़प सकता है। तब चीन कश्मीर के बड़े हिस्से को हजम कर इस संयुक्त हमले की बड़ी कीमत मांग सकता है। उससे पूर्व ये दोनों शत्रु पड़ोसी देश भारत में आतंक और साम्प्रदायिक समस्या को बढ़ावा देने के लिए और भी अधिक सक्रियता दिखा सकते हैं। इस प्रकार भारत को घेरने से जहां पाकिस्तान को अपने चिर प्रतीक्षित शत्रु भारत के चंगुल से कश्मीर मिल सकता है और वह बांग्लादेश का बदला लेने में सफल हो सकता है वहीं चीन तेजी से उभरते भारत की आर्थिक और सामरिक उन्नति को और वैज्ञानिक विकास को भारी क्षति पहुंचाने में भी सफल हो सकता है। चीन भारत जैसे देश की उन्नति को पचा नही सकता। वह प्रारंभ से ही साम्राज्यवादी है और उसका साम्राज्यवाद भारत के लोकतंत्र के लिए प्रारंभ से ही एक खतरा रहा है।
इधर भारत में एक ऐसा सरदार इस समय गद्दीनशीन है जो स्वयं में कतई बेअसरदार है और जिसने इस समय देश की छवि एक थके मादे से उत्साहहीन और साहसहीन देश की बनायी है। वह स्वयं ‘रिमोट’ से चल रहे हैं और देश को भी ‘रिमोट’ से ही चलाना चाहते हैं। यह सर्वविदित ही है कि जो व्यक्ति स्वयं रिमोट से चलता हो वह देश को कैसे चला सकता है? पर देश चल रहा है, तो इसमें इस सरदार का कोई रोल नही है, बल्कि देश तो रामनाम पर चल रहा है। ये बेअसरदार सरदार ‘जैसे हो वैसे ही रहो’ की यथास्थितिवाद की परेड तो करा सकता है, कभी भी देश को दौड़ा नही सकता। इस समय देश की जनता तो इस बेअसरदार सरदार से छूटना ही चाहती है उनकी स्वयं की पार्टी भ्ी उनसे छूटना चाह रही है। लगता तो ये भी है कि बेअसरदार सरदार इस बार स्वयं भी छूटने के लिए तैयार बैठा है। इस नैराश्यतापूर्ण परिवेश से देश की सीमाओं पर खतरा बढ़ता जा रहा है। हमारे देश के नेताओं की अकर्मण्यता जगजाहिर है और पड़ोसी देश भी संसद में जाकर ऊंघने वाले इन नेताओं को भली प्रकार जानते हैं। आज भी देश की जनता को पूर्व राष्ट्रपति (जब वह उपराष्ट्रपति थे) शंकर दयाल शर्मा के वे शब्द स्मरण हैं, जब उन्होंने राज्यसभा सांसदों को देशद्रोही कहा था। देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति पूर्णत: उदासीनता का भाव प्रदर्शित करना निश्चित रूप से देशद्रोही होने का प्रमाण देने के समान ही होता है।
चीन जितने भोलेपन से स्वयं को 1962 की अपेक्षा अधिक उदार और भारत का गहरा मित्र होने का नाटक कर रहा है, वह उतना है नही। उसे अपने पड़ोस में एक सक्षम और समर्थ लोकतांत्रिक भारत किसी भी कीमत पर नही चाहिए। क्योंकि ऐसा भारत उसके सर्वांगीण हितों के खिलाफ है। चीन दूरगामी नीति पर कार्य कर रहा है और वह पूरे भारत में लालकालीन बिछा देखकर अपनी सेना का स्वागत होता देखना चाहता है। भारत चीनी नेता के स्वागत के लिए जो लाल कालीन बिछाना चाह रहा है, वह चीन की उस धृष्टïतापूर्ण नीति के सामने बहुत ही छोटा है जिसके अंतर्गत चीन पूरे भारत में ही लाल कालीन बिछा देना चाहता है। पता नही हमारे नेता कब चेतेंगे? वैसे इस समय जो परिस्थितियां बन रही हैं वो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं। परंतु हम देश की सीमाओं की सुरक्षा न करके अपने राजनैतिक हितों और स्वार्थों के लिए लड़ रहे हैं, कदाचित यही स्थिति तब थी जब विदेशी आक्रांता यहां आ रहे थे और यहां पृथ्वीराज चौहान व जयचंद आपस में ही लड़ने में मग्न थे।

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