भारतवर्ष की एकता फंडामेंटल है

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कृष्ण गोपाल

आज जब हम देश की स्थिति को देखते हैं, तो बहुत सी ऐसी चीजें दिखती हैं जिससे लगता है कि देश में बहुत से अच्छे परिवर्तन हुए हैं। उदाहरण के लिए देखा जाए तो देश की साक्षरता में तेजी से सुधार आया है, आजादी के समय देश की साक्षरता बहुत कम थी। हालांकि हम ये भी जानते है कि अंग्रेजों के आने से पहले इस देश की साक्षरता का स्तर कहीं दूसरा था। धर्मपाल जी नाम के गांधीवादी विद्वान ने ब्रिटिश आर्काईव्ज में जाकर अध्ययन किया कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में देश में साक्षरता का स्तर कैसा था। जब उन्होंने दस्तावेजों का अध्ययन किया तो पता चला कि मद्रास प्रेसिडेंसी और बंगाल प्रांत में साक्षरता का स्तर 90 प्रतिशत तक था। लेकिन अंग्रेजों के वक्त ये साक्षरता दर 14 प्रतिशत रह गई। आर्थिक स्थिति के बारे में भी हम सब जानते हैं। विश्व की जीडीपी में भी भारत का योगदान बहुत ऊंचा था। 2000 साल पहले भारत का योगदान 32-33 प्रतिशत था, अंग्रेजों के आने के समय 24 प्रतिशत और अंग्रेजों के जाने के समय सिर्फ एक प्रतिशत रह गया। ये बातें इसलिए उल्लेख की जा रही हैं ताकि वर्तमान में भूतकाल के कुछ तथ्य हमारे ध्यान में होने चाहिए। अंग्रेज 14 प्रतिशत साक्षरता छोड़ कर गया था। लेकिन देश ने करवट ली और आज हम 72-73 प्रतिशत साक्षरता की ओर बढ़ रहे हैं। जब अंग्रेज गए तो देश में अकाल पड़ता था। ऐसे अकाल जिनकी पूरे विश्व में चर्चा होती थी। एक-एक अकाल में लाखों लोगों के प्राण चले जाते थे। हमारी सुजलाम-सफलाम मातृभूमि पर अंग्रेजों ने ऐसा खेल किया कि साक्षरता और आर्थिक क्षेत्रा ही नहीं, जानबूझकर पैदा किये गए अकाल में करोड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ी।
जब देश आजाद हो रहा था तो ब्रिटिश पार्लियमेंट में बहस हुई, उस बहस की दो बातें यहां बताना चाहता हूँ। उस बहस में एक बात कही गई कि ये देश भूख से मर जाएगा। भारत के पास खाद्यान्न नहीं हैं, करोड़ों लोग अकाल में मर जाएंगे और उनकी जिम्मेदारी हमारी होगी। हम इस देश को स्वतंत्रा तो कर रहे हैं पर ये देश चल नहीं पाएगा। आज परिस्थितियां हमारे समाने हैं, ये देश जिस दिन आजाद हुआ तब 4-5 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पन्न करता था और आज हम 28 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पन्न कर रहे हैं। हमारी आबादी 3-4 गुणा बढ़ गई हैं, लेकिन हम 3-4 करोड़ टन ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने में सक्षम हैं। गरीब देशों को दान भी देते हैं और कुछ देशों को बेचते भी हैं। हम स्वावलंबी बने और विदेशियों की ये कल्पना कि ये देश भूखों मर जाएगा मिथ्या साबित हुई। उनके राज में हम 20-25 करोड़ लोगों को नहीं खिला पाते थे, आज 125 करोड़ की आबादी को खिलाने के बावजूद भी खाद्यान्न बच जाता है। इस देश के वैज्ञानिकों ने नई-नई वैरायटी पैदा कीं, किसान ने मेहनत की, नदियों का पानी खेत तक पहुंचाया, ट्यूबवेल का पानी आया और देश खाद्यान्न में स्वावलंबी बना। हमने अपमानजनक पीएल-480 समझौते किये थे। इस समझौते का धन अमेरिका के माध्यम से पूर्वोत्तर में आतंकवाद को बढ़ावा देने में लगना था। हमारे देश ने अच्छे इंजीनियर्स पैदा किये। आज हर देश में भारतीय इंजीनियरों की बड़ी डिमांड है। इसरो ने बेहतरीन वैज्ञानिक दिए। यूरोप का कोई देश आज ऐसा नहीं जो हमसे सैटेलाइट का प्रक्षेपण न करवाना चाहता हो। मिसाइल टेक्नोलॉजी, एटॉमिक टेक्नोलॉजी में भी भारत का महत्वपूर्ण स्थान है। मेडिकल के क्षेत्रा में भी भारत ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। ऐसे बहुत से क्षेत्रा हैं जिसमें हमारा स्थान गरिमामय है।
चर्चिल ने दूसरा बिंदु जो ब्रिटिश संसद मे रखा कि ये देश टूट जाएगा, बिखर जाएगा, एक नहीं रह पाएगा। किंतु आज इंग्लैंड से कोई पूछे कि क्या वह एक रह सकता है। स्कॉटलैंड भी अलग होना चाहता है, वेल्स अलग जाना चाहता है। इंग्लैंड की अपनी एकता पर आज खतरा मंडरा रहा है। पांच प्रतिशत मतदान कम हो गया, वरना अलग हो गए होते। सोवियत संघ टूट गया, 14-15 देश अलग हो गए। भारत का एक भी राज्य अलग होने की मांग नहीं करता है। हमारी एकता फंडामेंटल हैं। 1947 से आज तक देश वैसा ही है। दुनिया को आश्चर्य होता है कि इतनी भाषाएं, इतने सम्प्रदाय, इतने जलवायु वाला ये देश एक कैसे है? पर हमको आश्चर्य नहीं है। हमारी एकता मात्रा राजनीतिक एकता नहीं है। देश में बहुत कुछ ऐसा है जो हमें एक सूत्रा में बांधे रखता है। हमारे देश के बारे में तमाम धारणाएं मिथ्या हैं।
इस देश का एक पक्ष ऐसा है जो हमें गौरवान्वित करता है, हमारे डॉक्टर, हमारे इंजीनियर, विदेशों में परचम लहराने वाले हमारे उद्योगपति, हमारे खिलाड़ी, सभी हमें गौरव का एहसास कराते हैं। लेकिन इसी देश का एक दूसरा पक्ष भी है कुछ लोगों ने बहुत उन्नति की है, अच्छे-अच्छे संस्थान खुले है, नए-नए बिजनेस शुरू हुए हैं। लेकिन इसी देश में भयंकर गरीबी भी हैं। यह भी हमारे देश का एक पक्ष है। तमाम कमेटियां बनाई गई कि देश में गरीबी रेखा क्या होनी चाहिए। लेकिन कोई भी रेखा खींची पर इतना तो हो जाए कि सबको दो वक्त का भोजन मिल जाए। कोई कहता है 37 प्रतिशत इस रेखा के नीचे हैं, कोई कहता है 45 प्रतिशत नीचे है। कुछ भी हो लेकिन मोटे अनुमान के मुताबिक 50 करोड़ लोग आज भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। किसी भी देश जिसमें 50 लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हों, उसके लिए अच्छी स्थिति नहीं है, ये एक दुख की बात है। चिकित्सा बहुत महंगी है। हर साल 4-5 करोड़ लोग वर्तमान चिकित्सा व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप के कारण गरीबी रेखा के नीचे आ जाते है। महंगी चिकित्सा व्यवस्था झेल नहीं पाते, अपने मकान, दुकान, जमीन बेचनी पड़ती है और गरीबी रेखा के नीचे चल जाते है। 60 प्रतिशत महिलाएं एनेमिक है, दिल्ली में 20 प्रतिशत लोग स्लम में रहते है, मुंबई में 50 प्रतिशत, देश के अंदर स्लम में रहने वालों की आबादी दस करोड़ हो गई है। गांव खाली हो रहे है। ग्रामीण आबादी पलायन कर रही है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10-20 सालों में तीन लाख कृषक आत्महत्या कर चुक हैं। जो पूरे देश का पेट भरता है वह आत्महत्या करने को मजबूर है औसतन 40 किसान प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं। ये भयावह है। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या अपने आप में एक अलग समस्या है। 100 स्थान रिक्त होते हैं तो उसके लिए तीन लाख आवेदन आ जाते हैं। भ्रष्टाचार विकराल रूप धरता जा रहा है। कोई भी सरकारी काम हो पाएगा या नहीं हो पाएगा हम बता नहीं सकते। हर व्यक्ति पर संदेह की दृष्टि आ जाती है। यह दृश्य सिर को झुकाने वाला है।
इस परिस्थिति से निकलने का रास्ता क्या है? हम कहां के लिए चले थे और कहां पहुंच गए? जब देश आजाद हुआ तो जवाहर लाल नेहरू ने मध्यरात्रि के भाषण में कहा था कि इस राष्ट्र की दमित आत्मा अभिव्यक्ति पाएगी। ये देश की आत्मा क्या है? वह दमित क्यों हुई? दमित करने वाले कारक और कारण क्या थे? इस देश की एक आत्मा कुछ हैं, जिससे इसकी हस्ती मिटती नहीं, जिसके भाव से ये देश जीता है, जिसके भाव से पूरे विश्व में जाना जाता है, उस आत्मा को पहचानने, बनाए रखने की जो कोशिश होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। ये बात सच है कि हमने अच्छे डॉक्टर पैदा किए, वैज्ञानिक पैदा किए इंजीनियर पैदा किए, अच्छे मैनजर मिले, 100 में से 100 अंक लाने वाले श्रेष्ठ विद्यार्थी भी हमारे पास आज है। किंतु ये शिक्षा भौतिक जगत की शिक्षा है। इसमें इस देश की आत्मा विराजमान नहीं है। इस एजूकेशन में भारत की आत्मा का प्रकाश दिखता नहीं है। जब तक इस शिक्षा व्यवस्था में भारत की आत्मा का तेजस्वी आध्यात्मिक रूप नहीं होगा। तब तक कुछ सही परिवर्तन नहंी होगा। प्रशासनिक अधिकारी अपनी विलक्षण बुद्धि और प्रतिभा से पद पर पहुंचते हैं। देश की पूरी व्यवस्था इनके हाथ में होती है। व्यवस्था का कौन सा ऐसा भाग है जो इनके हाथ में नहीं है। लेकिन फिर भी वह क्यों नहीं परिवर्तन ला पा रहे हैं? कौनसी ऐसी परीक्षा ली जाती जिससे से परिवर्तन ला पाते? दरअसल इनके अंदर आध्यात्मिक सत्व और आध्यात्मिक सत्य दोनों का अभाव था।
बर्टन्ड रसेल एक ब्रिटिश विद्वान थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान एजूकेशन सिस्टम व्यक्ति के अंदर क्षमता देता है, सामर्थ्य पैदा करता है, इसको एक्सपर्ट बनाता है और ये सब धीरे-धीरे उसके अंदर इगो पैदा कर देती हैं। उसका एक व्यक्तित्व निर्माण होता है जिसके अंदर इगो आकंठ भरा होता है। मैं कुछ हूं, ये अहं उनके अंदर बड़ा होता चला जाता है। और आगे रसेल कहते हैं कि ऐसी इगो भरी शक्तियां जब चारों ओर खड़ी हो जाती हैं तो बिलियर्ड की गेंद की तरह एक दूसरे से टकराकर एक दूसरे से दूर भागती हैं। एक साथ नही आ सकतीं। कितना सटीक उदाहरण दिया है उन्होंने। ये विलक्षण क्षमता से भरे आधुनिक शिक्षा से शिक्षित युवा अपने-अपने इगो में डूबे हुए हैं और केवल आपस में टकरा रहे हैं।
135 करोड़ का ये विशाल देश, क्या नहीं है हमारे पास। दुनिया का सबसे उपजाऊ क्षेत्रा हमारे पास है, सबसे अच्छी ऋतुएं हमारे पास है? सबसे ज्यादा युवा शक्ति हमारे पास है, आध्यात्मिक ज्ञान के मालिक हम हैं, लेकिन फिर भी हम संघर्ष कर रहे हैं, भटक रहे हैं, मार्ग खोज रहे हैं। हमारे लोग भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। हमारे ऋषियों ने बताया है कि आपस में समान मन के साथ चलो, मिलकर चलो, सबको साथ लेकर चलो और अंत में ऋषि कहते हैं कि आपस में मिलकर नहीं चले तो सर्वनाश को प्राप्त हो जाओगे। हमें मिलकर चलना भी नहीं आता क्योंकि हम अध्यात्म से विरक्त हो गए। हमने अध्यात्म को रिलीजन में बांध दिया। अध्यात्म का अर्थ पोंगापंथी हो गया, अध्यात्म का अर्थ पिछड़ापन हो गया। सेकुलरिज्म के इस नारे ने हमको कहां भेज दिया।
स्वतंत्राता प्राप्ति के कुछ वर्षों के बाद ही जवाहरलाल नेहरू को इस चिंता ने घेर लिया कि ये देश किस दिशा में जाने लगा। उन्होंने एक कमेटी बनाई ’नेशनल इमोशनल इंटिग्रेशन कमेटी’। संपूर्णानंद जी को उसका अध्यक्ष बनाया। यह कमेटी शिक्षा व्यवस्था की दिशा के बारे में भी तय करने वाली थी। संपूर्णानंद जी कांग्रेस के बहुत विद्वान नेता थे, उन्होंने इसकी रिपोर्ट की शुरूआत में लिखा कि कैसा दुर्भाग्य इस देश का था कि आजादी के बाद देश का कोई लक्ष्य ही तय नहीं हुआ। जब देश का ही लक्ष्य तय नहीं था तो शिक्षा का क्या होगा। देश का लक्ष्य, गंतव्य, भवितव्य और शिक्षा का लक्ष्य, गंतव्य, भवितव्य अलग-अलग नहीं हो सकते। ऐसा संपूर्णानंद जी ने लिखा।
हमारे देश के युवक तमाम डिग्रियां हासिल करते हैं, लेकिन उनको नहीं पता कि जाना कहां है, लक्ष्य क्या है। मैं डॉक्टर तो बन गया, मरीजों की सेवा करना मेरा कर्तव्य है, लेकिन मेरा अंतिम लक्ष्य क्या है। संपूर्णानंद जी ने उस रिपोर्ट में लिखा कि विद्यार्थियों के सामने अंतिम लक्ष्य स्पष्ट नहीं है कि मैं मेरी मातृभूमि की सेवा करूंगा, उसके दुख दूर करने का प्रयास करूंगा। और उसके वर्तमान स्वरूप में परिवर्तन लाने का प्रयास करूंगा। शिक्षा के क्षेत्रा में बदलाव और सुधार के लिए तमाम आयोग बने, सारे आयेाग कहते थे कि विद्यार्थियों के सामने कोई लक्ष्य तो रखो, कोई दर्शन तो रखो। लेकिन फिर कुछ नेता मिलकर तय करते थे कि शिक्षा को सेक्युलर रखना है। और आज हम देश को यहां ले लाए।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों के सामने कोई लक्ष्य तय नहीं है। बस मुझे इंजीनियर बनना है, डॉक्टर बनना है, पर क्यों बनना है। वो करियर चुनता है सिर्फ सेलरी के लिए, पैकेज के लिए। ये दुर्भाग्य है देश का जो प्रचलन में है। देश के सबसे श्रेष्ठ विद्यार्थी आईआईटी में चयनित होते है। देश की आवश्यकता थी कि ये श्रेष्ठ बच्चे डीआरडीओ में जाएं, रेलवे में जाएं, भेल में सेवा करें, सेल में जाएं, आईआईटी में फैकल्टी बनें। इनमें से 10 परसेंट विद्यार्थी भी इन सेवाओं को नहीं चुनते। आईआईटी का विद्यार्थी वहां फैकल्टी बनने में हीनता महसूस करता है। जिन विद्यार्थियों को हमने सबसे श्रेष्ठ बाना उनके सामने हमने आदर्श क्या रखा, लक्ष्य क्या रखा। उनके सामने करोड़ों का पैकेज था, जिसकी कोई लिमिट नहीं। देश की जिस दमित आत्मा की बात जवाहारलाल नेहरू ने की वह उसके सामने थी ही नहीं। ये श्रेष्ठ बच्चे जो विलक्षण क्षमतावान थे, जो इस देश का दृश्य बदल सकते थे, उनके सामने कोई लक्ष्य और आदर्श थे ही नहीं। क्या ये भाव हम उनके अंदर जगा सकते हैं। क्या उन बच्चों के जीवन मे।इस मातृभूमि का स्वरूप को बदलने का संकल्प दिला सकते है। ये बच्चे सचमुच विलक्षण हैं, सिर्फ अध्यात्म से दूर हो गए हैं।
ऐसे अनेक उदाहरण हमारे समाने है जिनको सुनकर हमें लगता है कि इस देश की दमित आत्मा को जाग्रत करने के प्रयास किए जरूर गए, लेकिन आजादी के बाद ये प्रयास क्षीण पड़ गए, जो आग जल रही थी ठंडी हो गई, क्यांेंकि लोगों को लगा कि सरकार सबकुछ ठीक करेगी। पैसा बहुत कुछ होता है ये सब मानते हैं, लेकिन पैसा ही सबकुछ होता इस पर कोई स्वीकृति इस देश में नहीं मिलेगी। इसलिए कैसे इस प्रकार के व्यक्तित्व खड़े किए जाएं जो धन को ही सबकुछ न मानते हों?
आज भी ऐसी बहुत सी विलक्षण प्रतिभाएं इस देश में विद्यमान हैं। नई पीढ़ी के मन में भाव जगाना हमारा काम है। अच्छी बातें ऊपर से नीचे की ओर जाती हैं। उनको प्रोत्साहित करना चाहिए और नई पीढ़ी के सामने रखना चाहिए। वर्तमान लौकिक शिक्षा सिर्फ जानकारियों का पुलिंदा है। जबकि विद्या वास्तव में वही है जो अध्यात्म जगाती हो, विद्या वही है जो एकात्म बोध कराती हो, संवेदनाओं को जगाती हो, दूसरों के हित में समर्पण करने की प्रेरणा दे।

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