वैक्सीन आगई…वैक्सीन आगई…..वैक्सीन आगई…सुनते सुनते थक चुका है देश

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ललित गर्ग

प्रारंभिक दौर में सरकार एवं शासकों ने जिस तरह की सक्रियता, कोरोना पर विजय पाने का संकल्प एवं अपेक्षित प्रयत्नों का कर्म एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखने को मिला, अब वैसा वातावरण न बनना लोगों को अधिक निराश कर रहा है।

कोरोना महामारी के प्रकोप से निपटने की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं हर दिन संक्रमण और संक्रमण से होने वाली मौतों के आंकड़े नई ऊंचाई छू रहे हैं। भारत में कोरोना मामलों का रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ना जारी है। दुनिया में सबसे तेजी से कोरोना संक्रमण अपने देश में ही बढ़ रहा है। देश में बुधवार को रिकॉर्ड 95,735 नये संक्रमण के एवं 1172 मौत के मामले सामने आए हैं। इस सप्ताह में संक्रमण के लगभग हर दिन नब्बे हजार मामले एवं हर दिन एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या 44 लाख पार पहुंच गई है। दुनिया में अभी संक्रमण के सबसे ज्यादा मामले अमेरिका में हैं। लेकिन हम अमेरिका, ब्राजील जैसे उन देशों को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ गए हैं, जहां दुनिया में अभी तक सबसे अधिक मामले दर्ज हो रहे थे। यह निस्संदेह केंद्र और राज्य सरकारों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

कहा जा रहा है कि जांच में तेजी आने के कारण संक्रमितों की पहचान भी तेजी से हो रही है, इसलिए आंकड़े कुछ बढ़े हुए दर्ज हो रहे हैं। पर कुछ लोगों को शिकायत है कि जांच में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है। पुख्ता जांच एवं वैक्सीन का आश्वासन, उजाले का भरोसा सुनते-सुनते लोग थक गए हैं। अब तो कोरोना मुक्ति का उजाला एवं उपचार हमारे सामने होना चाहिए। इस अभूतपूर्व संकट के लिए अभूतपूर्व समाधान खोजना ही होगा। प्रारंभिक दौर में सरकार एवं शासकों ने जिस तरह की सक्रियता, कोरोना पर विजय पाने का संकल्प एवं अपेक्षित प्रयत्नों का कर्म एवं मनोवैज्ञानिक प्रभाव देखने को मिला, अब वैसा वातावरण न बनना लोगों को अधिक निराश कर रहा है।

भारतीय जीवन में कोरोना महामारी इतनी तेजी से फैल रही है कि उसे थामकर रोक पाना किसी एक व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है। अभी अनिश्चितताएं एवं आशंकाएं बनी हुई हैं कि अगर सामान्य जनजीवन पर लगी बंदिशें इसी तरह कम की जाती रहीं तो कोरोना के बेकाबू होकर घर-घर पहुंच जाने का खतरा बढ़ने की संभावनाएं अधिक हैं। कोरोना संक्रमण के वास्तविक तथ्यों की बात करें तो हालात पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण एवं जटिल हुए हैं, अभी अंधेरा घना है। खुद केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने भी असंतोष व्यक्त किया है कि कुछ राज्यों ने जांच के मामले में मुस्तैदी नहीं दिखाई, जिसके चलते वहां संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े। जब जांच में तेजी नहीं आ पा रही तब कोरोना के मामले दुनिया के अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां चिंताजनक रफ्तार से बढ़ रहे हैं, तो इसमें और तेजी आने पर क्या स्थिति सामने आएगी, अंदाजा लगाया जा सकता है।

कोरोना महामारी को नियंत्रित करने के लिये लॉकडाउन, बंदी और सामाजिक दूरी के पालन को लेकर सख्ती आदि उपाय आजमाए जा चुकने के बाद भी संक्रमण तेजी से फैल रहा है, तो इस पर काबू पाने के लिए कोई नई, प्रभावी और व्यावहारिक रणनीति बनाने पर विचार होना चाहिए। यह सही है कि जांच में तेजी आएगी तो संक्रमितों की पहचान भी जल्दी हो सकेगी और उन्हें समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। मगर जांच के मामले में राज्य सरकारों का रवैया कुछ ढीला-ढाला एवं उदासीनताभरा ही नजर आ रहा है। दिल्ली सरकार ने जरूर इजाजत दे दी है कि अब बिना डॉक्टर की पर्ची के भी लोग खुद जांच करा सकते हैं। दिल्ली में जांच एवं उपचार की सुविधाएं दूरदराज के गांवों से अधिक हैं, उन गांवों के लोगों की परेशानियों का अंदाज लगाया जा सकता है, जो इस वक्त बाढ़ की विभीषिका झेल रहे हैं या फिर जिन गांवों तक सड़क भी नहीं पहुंची है और लोगों को मरीज को चारपाई पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ता है। वे तो इसी उजाले की बाट जोह रहे हैं कि सरकारी सहायता मिले और उनकी मुफ्त जांच हो सके। राज्यों के पास ऐसा नेतृत्व नहीं है, जो कोरोना महाव्याधि का सर्वमान्य हल दे सके एवं सब कसौटियों पर खरा उतरता हो, तो क्या नेतृत्व उदासीन हो जाये? ऐसा दवा या वैक्सीन नहीं, जो कोरोना के घाव भर सके, तो क्या उपचार के प्रयास ही न हों?

दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में संक्रमितों के स्वस्थ होने की रफ्तार अधिक और मौतों का आंकड़ा बेशक हमारे यहां कम हों, पर इस आधार पर लापरवाही बरतने का मौका नहीं मिल सकता। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि आरटीपीसीआर जांच सबसे बेहतर है। आरटीपीसीआर जांच करना जरूरी है। मगर राज्य सरकारें इसे गंभीरता से नहीं ले रहीं हैं। देश में बेहतर जांच की सुविधाएं तक हम नहीं जुटा पा रहे हैं, कई राज्य सरकारें इस महामारी से पार पाने के लिए आर्थिक संसाधनों पर्याप्त न होने का रोना रो रही हैं। ऐसे में यह ठीक है कि स्वास्थ्य के मोर्चे पर राज्य सरकारों को ही अगली कतार में लड़ना है, पर उन्हें जरूरी संसाधन और सहयोग उपलब्ध कराने के मामले में केंद्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

भारत सहित समूची दुनिया को कोरोना के उपचार की वैक्सीन का सबसे ज्यादा इंतजार है, लेकिन उसके मार्ग में नई-नई बाधाएं आना अफसोस की बात है, बहुराष्ट्रीय एस्ट्राजेनेका कंपनी से संसार भर के लोग खुशखबरी की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन कंपनी ने अपने अंतिम चरण के वैक्सीन परीक्षण को इसलिये रोक दिया है कि परीक्षण में शामिल एक व्यक्ति बीमार पड़ गया। संभव है यदि परीक्षण में शामिल उस व्यक्ति के बीमार पड़ने का कोई अन्य कारण सामने आया, तो फिर वैक्सीन के प्रयोग को आगे बढ़ाया जाएगा। दुनिया भर में अभी 100 ज्यादा जगह कोरोना के वैक्सीन या दवा की तलाश जारी है। कहीं भी कोई कामयाबी या नाकामी सामने आए, तो उसे कम से कम वैज्ञानिकों के बीच साझा करना न केवल यथोचित, बल्कि मानवीयता भी है। आज दुनिया जिस निर्णायक मोड़ पर है, वहां हर देश चीन की तरह गोपनीय एवं मतलबी नहीं हो सकता। चीन वुहान में कोरोना को नियंत्रित करने के बाद स्वयं को महिमामंडित करने में जुटा है, लेकिन उसने दुनिया को यह नहीं बताया कि उसके यहां कोरोना की वास्तविक स्थिति क्या है? आखिर वुहान में सामान्य जन-जीवन की वापसी कैसे हुई? वह दुनिया को बीमारी देने के बाद खुद को कोरोना चिंता से मुक्त और मस्त दिखाने के अमानवीय कृत्य करने में जुटा है, जबकि विशेष रूप से अमेरिका, यूरोप, भारत, ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन बनाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। अभी तक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर दवा विकसित करने में जुटी एस्ट्राजेनेका को सबसे आगे माना जा रहा था, लेकिन अब इंतजार का समय और लंबा हो गया है, लेकिन निराश कतई नहीं होना चाहिए।

भारत में भी कोरोना मुक्ति की दवा पर प्रयत्न हो रहे हैं, यहां प्लाज्मा थेरेपी को रामबाण माना जा रहा था, दिल्ली, मुंबई और कुछ अन्य शहरों में प्लाज्मा बैंक भी बन गए थे, लेकिन आईसीएमआर ने इस थेरेपी को बहुत कारगर नहीं माना है। देश के 39 अस्पतालों में किए गए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि यह थेरेपी सभी में समान रूप से काम नहीं कर रही है। यह थेरेपी करीब 13.6 प्रतिशत लोगों की जान नहीं बचा पाई है, इसलिए इसे पुख्ता नहीं माना जा सकता। इन नतीजों को भी नाकामी नहीं कहा जा सकता, हो सकता है, प्लाज्मा थेरेपी पर भी अलग ढंग से काम करने की जरूरत हो। बहरहाल, वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के साथ-साथ सरकारों एवं आम जनता को कतई निराश नहीं होना चाहिए। हम कठिन समय को भी खुशनुमा बना सकते हैं। हम जमीन पर धूल में सने होने के बाद भी खड़े हो सकते हैं। हम वास्तव में जो चाहते हैं, उसे प्राप्त कर खुद को हैरान कर सकते हैं। ये कल्पनाएं सुखद तभी हैं जब हम कोविड-19 के साथ जीते हुए सभी एहतियात का पालन करें, सोशल डिस्टेंसिंग का कड़ाई से पालन करने और सार्वजनिक स्थानों के लिये जब भी निकलें मास्क का प्रयोग जरूरी करें एवं अपना चेहरा ढंके रखें। कुल मिलाकर सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल की स्थिति एवं अधिक से अधिक लंबा खींचने के उपाय से ही हम कोरोना से युद्ध को कम से कम नुकसानदायी बना सकते हैं। आज देश ही नहीं समूची दुनिया पंजों के बल खड़ा कोरोना मुक्ति की प्रतीक्षा कर रहा है। कब होगा वह सूर्योदय जिस दिन घर के दरवाजों पर कोरोना संक्रमण को रोकने के लिये बंदिशें नहीं लगाने पड़ेंगी?

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