धर्म अध्यात्म और मानवता के रक्षक-गुरु नानक देव जी

विनोद बंसल

पंद्रहवीं शताब्दी में मुगलों के अत्याचारों के चलते पूरे भारत में फ़ैली अराजकता व लूट-खसोट के कारण जन जीवन पूरी तरह असुरक्षित था।हिन्दू धर्म कर्म काण्ड व कुप्रथाओं की जटिलताओं में उलझ गया था। भयाक्रान्त हिन्दू अपना धर्म त्याग मुस्लिम बनने को मजबूर थे और धर्म और मानवता से लोगों की आस्था पूरी तरह डगमगा रही थी। बाबर के आक्रमण के समय मुगलों ने गुरु नानक देव व मरदाना को बन्दी बनाकर उन पर अनेक अत्याचार किए। किन्तु, बाद में नानक देव की सूझ बूझ के चलते बाबर ने स्वयं उनसे क्षमा याचना की और सभी बन्दी मुक्त कर दिए। लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित तलवंडी नामक स्थान पर संवत् 1526 (ईस्वी सन 1469) की कार्तिक पूर्णिमा के दिन उदित हुए एक सूर्य ने अपनी ऐसी किरणें बिखेरीं कि वह भारत ही नहीं विश्व भर में धर्म अध्यात्म, मानवता और स्वाभिमान का अग्रदूत बन गया। तलवंडी नगर (वर्तमान में इसे ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है) के प्रधान पटवारी कल्याण दास मेहता (कालू खत्री) के यहां जब गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ उस समय मुगल बादशाह बाबर का शासन था। मुगल शासक हिंदू प्रजा पर घोर अत्याचार करते थे। धार्मिक आस्थाओं को जबरन खंडित कर हिंदुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनने के लिए विवश किया जाता था। उनकी माता का नाम तृप्ता देवी तथा बडी बहिन का नाम नानकी था। अत: नानकी के छोटे भाई होने के कारण नवजात बालक का नाम नानक रखा गया।
बचपन से ही बालक नानक साधु संतों, गरीब व असहायों की सेवा व सहायता के लिए तत्पर रहते थे। यूं तो गुरु नानक देव जी का सम्पूर्ण जीवन और उनकी शिक्षाएं विश्व के लिए एक अमूल्य निधि और जीवन जीने का मूल मंत्र हैं, जिन सभी का वर्णन करना शायद ही किसी के लिए सम्भव होगा किन्तु, उनमें से कतिपय दृष्टांतों का संक्षिप्त विवेचन नीचे दिया जा रहा है-
एक दिन पण्डित गोपालदास जी ने बालक नानक जी से ? (ओ3म्) शब्द का उच्चारण करने के लिए कहा। नानक जी ने ? शब्द का उच्चारण तो किया साथ ही पंडित जी से इस शब्द का अर्थ भी पूछा। उन्हें हैरानी इस बात से हुई कि इस छोटे से बालक के मन में यह जिज्ञासा कैसे उत्पन्न हुई? पण्डित जी ने तत्काल बालक की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा, ”नानक ! ? सर्वरक्षक परमात्मा का नाम है।”
उन दिनों हिंदू घरों में बालक के यज्ञोपवीत संस्कार अर्थात शरीर पर जनेऊ धारण करने का प्रचलन बहुत अधिक था। नानक देव जी का कहना था कि मन को पवित्र करने के लिए अच्छे आचरणों की जरूरत होती है। उन्हें तो ऐसा यज्ञोपवीत चाहिए, जो दया की कपास, संतोष के सूत, संयम की गांठ और सत्य के लक्ष्य से बांटा गया हो। उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर एक है, जो सत करतार है। वह सभी को समान भाव से देखता है और सभी का भला करता है। मनुष्य अपने दुष्कर्मों के कारण ही दुख भोगता है। उन्होंने लंगर की परंपरा चलाई, जहां अछूत लोग, जिनके सामिप्य से उच्च जाति के लोग बचने की कोशिश करते थे, के साथ बैठकर एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे। इसके अलावा लंगर में बिना किसी भेदभाव के संगत सेवा करती है। जातिगत वैमनस्य को खत्म करने के लिए गुरू जी ने संगत परंपरा शुरू की जहां, हर जाति के लोग साथ-साथ जुट कर प्रभु आराधना किया करते थे। कथित निम्न जाति के समझे जाने वाले मरदाना जी को उन्होंने एक अभिन्न अंश की तरह हमेशा अपने साथ रखा और उसे भाई कहकर संबोधित किया। गुरु नानक साहिब जात-पात का विरोध करते हैं। उन्होंने समस्त हिन्दू समाज को बताया कि मानव जाति तो एक ही है, फिर जाति के कारण यह ऊंच-नीच क्यों? जब व्यक्ति ईश्वर के दरबार में जाएगा तो वहां जाति नहीं पूछी जाएगी। सिर्फ उसके कर्म देखे जाएंगे। इसलिए आप सभी जाति की तरफ ध्यान न देकर अपने कर्मों को दूसरों की भलाई में लगाओ।
ईश्वर तो सब तरफ है:नानक धर्म प्रचार के लिए तिब्बत मान सरोबर तथा चीन तक गए। चीन में उनके नाम पर एक शहर का नाम नानकिंग रखा गया।

वे सऊदी अरब, फ़िलिस्तीन, ईराक़, अफ़्रीका व बगदाद भी गए जहां उन्होंने बगदाद में मुस्लिम धर्म गुरु खलीफ़ा को भी उपदेश दिए। ये उपदेश “नसीहत नामा” में संग्रहित हैं। एक दिन नानक मक्का में काबा की ओर पैर पसार कर सो गए। इसका वहां के काजियों द्वारा विरोध करने पर नानक जी ने कहा, “आप मेरे पैर उस ओर कर दीजिए जिस ओर परमात्मा का निवास नहीं है।” काजी चारों तरफ झांकने लगे। ईश्वर तो सब तरफ है।

पत्थर गिरवी रखे:

उस समय बगदाद का शासक बड़ा अत्याचारी था। जनता को कष्ट दे संपत्ति लूटकर वह अपना खजाना भरता रहता था। उसे पता चला कि हिंदुस्तान से कोई महात्मा आए हैं। वह उनसे मिलने के लिए गया। कुशल क्षेम पूछने के उपरांत नानक जी ने उससे सौ पत्थर गिरवी रखने की विनती की। शासक बोला, इन पत्थरों को गिरवी रखने में कोई आपत्ति नहीं है, किंतु आप इसे कब लेकर जाएंगे? नानक बोले, आपके पहले मेरी मृत्यु होगी। मेरे बाद जब आप भी इस संसार में अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर ऊपर मुझसे मिलेंगे, तब इन पत्थरों को दे दीजिएगा। बादशाह बोला, महाराज! भला इन पत्थरों को मैं वहां कैसे ले जा सकता हूं। नानक बोले, आखिर आप जनता से इक_ा किया हुआ अपना खजाना भी तो लेकर जाओगे? बस, तभी साथ में मेरे इन पत्थरों को भी लेते आइए। यह सुन कर बादशाह की आंखें खुल गईं। उसने नानक के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और फिर किसी को कष्ट न पहुंचाने का वचन दिया।

शुद्ध जल लाओ

प्यास लगने पर एक बार उन्होंने कहा कि ”शुद्ध जल लाओ।” एक पैसे वाला भक्त चांदी के गिलास में पानी ले आया। गिलास लेते समय नानक की निगाह उसके हाथ पर गई। बड़ा कोमल हाथ था। नानक ने उसका कारण पूछा तो वह बोला, ”महाराज, बात यह है कि मैं अपने हाथ से कोई काम नहीं करता। घर में नौकर-चाकर सारा काम करते है।” नानक ने गंभीर होकर कहा, ”जिस हाथ पर कड़ी मेहनत से एकाध चक्का नही पड़ा, वह हाथ शुद्ध कैसे हो सकता है? मैं तुम्हारे इस हाथ का पानी नहीं ले सकता।” इतना कहकर नानक ने पानी का गिलास लौटा दिया।

यह गांव उजड़ जाय

गुरू नानक घूमते हुए एक गांव में ठहरे। वहां के लोगों ने उनकी खूब खातिर की। जब वह वहां से चलने लगे तो गांव वालो को आशीर्वाद देते हुए उन्होने कहा, ”यह गांव उजड़ जाय।” गांव वाले यह आशीर्वाद सुनकर हैरान रह गये। सोचने लगे, लगता है उनकी सेवा में हमारी ओर से कोई कमी रह गई। गांव के कुछ लोग उनके साथ हो लिए। नानक दूसरे गांव में पहुंचे, वहां रुके, लेकिन वहां के लोगों ने उनकी और ध्यान ही नहीं दिया। खातिरदारी तो बात दूर, खाने-पीने के लिए भी नहीं पूछा। वहां से विदा होते समय नानक ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ”यह गांव बस जाए।” पिछले गांव के लोगों से अब नहीं रहा गया। उन्होने पूछा, ”गुरूजी, यह क्या बात है। जिन्होंने आप की खूब सेवा की, उन्हें आपने उजड़ जाने का आशीर्वाद दिया और जिन्होंने आपको पूछा तक नहीं, उन्हें बस जाने का आशीर्वाद दिया !” नानक जी ने जबाब दिया, ”जहां हमारी खूब मेहमान-नवाजी हुई, वह गॉँव फूलों की बस्ती है। वह उजड़ जाय तो इसका मतलब था कि वहां के लोग बिखर जाएं। वे जहां जाएंगे, अपने साथ अपनी मोहब्बत की व अपनी सेवा की, महक लेकर जाएंगे। लेकिन जिस गांव के लोगों ने हमारी पूछताछ नहीं की, वहां कांटों का ढेर था। हमने कहा, वह बस जाए, अर्थात् कांटे एक ही जगह रहें। चारों ओर फैल कर लोगों को दुखी न करें।”

सच्चा सौदा

बचपन से ही नानक साधु-संतो के साथ रहना पसंद करते थे। अपने गांव तलवंड़ी से कुछ दूर जंगल में घूमते थे। एक बार उनके पिता ने काम-धंधा करने के लिए उन्हें कुछ रुपये दिये। संयोग से नानक को कुछ साधु मिल गये। ये साधु कई दिन से भूखे थे। नानक के पास जो कुछ था, उनके खाने-पीने पर खर्च कर दिया। सोचा, भूखों को भोजन कराने से बढ़कर ज्यादा फायदे की बात भला और क्या हो सकती है। “यह सौदा ही सच्चा सौदा है।”

ऐसी शराब पी रक्खी है, जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं

गुरु नानक देव जी बगदाद होकर जब काबुल गये तो वहां बाबर ने उन्हें बुलाया और उनके आगे शराब का प्याला रख दिया। नानक ने कहा, ”हमने तो ऐसी शराब पी रक्खी है, जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं है। वह शराब हमारे किस काम की, जिसका नशा कुछ देर बाद उतर जायगा!”

चन्द्रलोक की यात्रा:

गुरू नानक जी का एक साथी था भाई बाला। वह जहां जाते थे, भाई बाला को अपने साथ जाने से नहीं रोकते। न ही कभी मरदाना को साथ रखने मे उन्हें हिच-किचाहट होती थी। एक बार नानक ने चंद्रलोक जाने की इच्छा की। उन्होने दोनों साथियों से कहा, ”आप लोग यहीं रहो। मैं अकेला ही चन्द्रलोक होकर आता हूं।” साथियों को बड़ा बुरा लगा। वे नहीं जानते थे कि वे लोग ऐसी यात्रा से वंचित रहें। उन्होने कहा, ”आप हमें साथ-साथ जाने से क्यों रोक रहे है ?” नानक मुस्कुरा कर बोले, ”अरे भाई, यह यात्रा न तो पैदल चलकर करनी है, न किसी सवारी में बैठकर। यह तो ध्यान या योग विद्या के सहारे करनी है। उस विद्या का आप लोगों को कोई अनुभव नहीं है।”

मैं तुम्हें तुम्हारी चीज सौंपने आया हूं

नानक सच्चे दिल के थे। बारह वर्ष की आयु में ही उनका विवाह सुलक्षिणी देवी से करा दिया गया जिनसे श्रीचन्द और लक्खी दास नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए किन्तु सांसारिक बंधन उन्हें बाध न सके। उन्होने गुरू की गद्दी पर अपने किसी परिजन को न बिठा कर उसके योग्य अपने एक साथी लहणा को बिठाया था जिसके संस्कार बड़े ऊंचे थे। ये लहणा भाई जी ही आगे चलकर गुरू अंगद देव जी के नाम से सिखों के दूसरे गुरू कहलाए।

गुरुनानक देव जी की दस शिक्षाएं
1. ईश्वर एक है।
2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।
3. ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है।
4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।
5. ईमानदारी और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।
6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं।
7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए।
8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।
9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।
10. भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।

पता : 329, संत नगर, पूर्वी कैलाश, नई दिल्ली-110065

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मैं तुम्हें तुम्हारी चीज सौंपने आया हूं

नानक सच्चे दिल के थे। बारह वर्ष की आयु में ही उनका विवाह सुलक्षिणी देवी से करा दिया गया जिनसे श्रीचन्द और लक्खी दास नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए किन्तु सांसारिक बंधन उन्हें बाध न सके। उन्होने गुरू की गद्दी पर अपने किसी परिजन को न बिठा कर उसके योग्य अपने एक साथी लहणा को बिठाया था जिसके संस्कार बड़े ऊंचे थे। ये लहणा भाई जी ही आगे चलकर गुरू अंगद देव जी के नाम से सिखों के दूसरे गुरू कहलाए।

गुरुनानक देव जी की दस शिक्षाएं
1. ईश्वर एक है।
2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो।
3. ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है।
4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।
5. ईमानदारी और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए।
6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं।
7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए।
8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए।
9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं।
10. भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।

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