कोरोना महाव्याधि एवं कहर के दौरान हर इंसान सुख, स्वास्थ्य, जीवन-सुरक्षा और शांति की खोज में

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ललित गर्ग

कोरोना कहर के बावजूद हम कहां बदल पाये हैं स्वयं को और अपनी दूषित सोच को। हम देख भी रहे हैं कि बुरे विचार जितना दूसरों का नुकसान करते हैं, उतना ही स्वयं अपना भी। कारण अपनी ही सुरक्षा को लेकर डरा दिमाग ढंग से नहीं सोच पाता।

कोरोना महाव्याधि एवं कहर के दौरान हर इंसान सुख, स्वास्थ्य, जीवन-सुरक्षा और शांति की खोज में है और पता लगाना चाहता है कि सुखी, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शांति है कहां? उन्हें अपनी सोच पर दृष्टिपात करना चाहिए। सोच की संतुष्टि है तो आदमी सुखी होगा। सोच की संतुष्टि नहीं होती तो आदमी रोता-कलपता रहता है, दुखी बना रहता है। हमारी कठिनाई यह है कि हम अपनी भावनाओं एवं विचारों पर ध्यान नहीं देते। उन पर हमारी पकड़ और उन पर नियंत्रण भी नहीं है। मन में कैसे-कैसे भाव उमड़-घुमड़ रहे हैं, किसी को पता नहीं। लेकिन हमारे ये भाव ही हमारी जटिल एवं विकट परिस्थितियों के कारक हैं। हमारी सबसे बड़ी सोच की त्रुटि है कि हमने सुविधा को सुख मानने की भूल कर दी। सुविधा होने पर भी आदमी सुखी नहीं हो सकता। सुविधा में अगर सुख देने का सामर्थ्य होता तो कोरोना महासंकट में दुनिया की एक बड़ी आबादी सुख भोग रही होती। फिर तो ज्यादा खर्च करके इस व्याधि के नरक से भी बचा जा सकता है।

तथाकथित पदार्थवादी एवं भौतिकवादी सोच को बदल कर ही हम समस्यामुक्त जीवन जी सकते हैं, कोरोना मुक्ति की राह पर अग्रसर हो सकते हैं। इस बात को समझ लेने की ज्यादा जरूरत है कि बाहर की दुनिया में न सुख है, न दुख है, न शांति है, न अशांति है। जो कुछ सकारात्मक और नकारात्मक है, वह हमारे भीतर है। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम किसे चुनते हैं? विचारक रूपलीन ने कहा है कि किसी भी तरह की मानसिक बाधा की स्थिति खतरनाक होती है। खुद को स्वतंत्र करिये। बाधाओं के पत्थरों को अपनी सफलता के किले की दीवारों में लगाने का काम करिए। सोच को सकारात्मक बनायें। जहां भी सोच-विचार में विकृति पनपे, वह जगह छोड़ दीजिये। ऐसा करके ही न केवल हम अपने जीवन को बल्कि राष्ट्र के जीवन को भी आत्म-निर्भर बना सकेंगे।

आदमी का स्वार्थ इतना प्रखर हो गया है कि उसे दूसरे का हित-अनहित देखने का अवकाश ही नहीं है, यही कारण है कि आज चारों ओर कोरोनारूपी विकृतियां ही विकृतियां दिखाई देती हैं। मनोविश्लेषण के जनक सिग्मंड फ्रायड ने कहा है कि यह इंसान का दिमाग ही है, बाहर का कोई बैरी नहीं, जो उसे गलत कामों की ओर ले जाता है।’ पदार्थ के मोह ने व्यक्ति के विवेक पर पर्दा डाल दिया है तो बुद्धि ने जीने के तौर-तरीकों को उलझा दिया है। बुद्धि का काम भी विचित्र है। वह एक समस्या को सुलझाती है, दूसरी को उलझाती है और तीसरी को पैदा करती है। अगर ऐसा है तो फिर हम बुद्धि पर ही क्यों ठहर जाते हैं? उसके आगे भी कुछ है, जो हमारे लिए बहुत कारगर और उपयोगी हो सकता है।

स्वयं को जानने का अर्थ है, अपनी शक्तियों से परिचित होना। स्वयं का स्वयं के द्वारा मूल्यांकन। सकारात्मक सोच का निर्माण। यह वह अवस्था है जिसमें हम जीवन को आनन्द, स्वस्थ, सुरक्षित एवं सुखमय बना सकते हैं। जीवन में असफलता को सफलता में, दुःख को सुख में, विषाद को हर्ष बदल सकते हैं। सचमुच जीवन उनका सार्थक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हैं। मेरे गुरु आचार्य तुलसी ने कहा है कि इतिहास साक्षी है कि मनुष्य के संकल्प के सम्मुख देव, दानव सभी पराजित होते हैं।

जीवन को विषाक्त बनाने वाले और अंधेरी सुरंगों में ले जाने वाले तत्व अभी भी हमारे भीतर ज्यों के त्यों कुंडली मारे बैठे हुए हैं। इनसे छुटकारे का प्रयत्न ही कोरोना से मुकाबला करने एवं नये जीवन की शुरूआत हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं होने का कारण है कि मनुष्य जीवन में अनेक छेद हो रहे हैं, जिसके कारण अनेक विसंगतियों को जीवन में घुसपैठ करने का मौका मिल रहा है। हमें उन छेदों को रोकना है। प्रयत्न अवश्य परिणाम देता है, जरूरत कदम उठाकर चलने की होती है, विश्वास की शक्ति को जागृत करने की होती है। विलियम जेम्स ने कहा भी है कि विश्वास उन शक्तियों में से एक है जो मनुष्य को जीवित रखती है, विश्वास का पूर्ण अभाव ही जीवन का अवसान है।

मनुष्य जीवन में नफरत की इतनी बड़ी-बड़ी चट्टानें पड़ी हुई हैं, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच व्यवधान पैदा कर रही हैं। विश्वास की शक्ति इतनी मजबूत है कि उन चट्टानों को हटाकर आदमी को आदमी से मिला सकता है। स्वेट मार्डेन ने कहा भी है कि मनुष्य उसी काम को ठीक तरह से कर सकता है, उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है जिसकी सिद्धि में उसका सच्चा विश्वास है। शेक्सपीयर कहते थे, हमारा शरीर एक बगीचे की तरह है और दृढ़ इच्छाशक्ति इसके लिए माली का काम करती है, जो इस बगिया को बहुत सुंदर और महकती हुई बना सकती है। एक और विचारक रूपलीन ने कहा है कि किसी भी तरह की मानसिक बाधा की स्थिति खतरनाक होती है। खुद को स्वतंत्र करिये। बाधाओं के पत्थरों को अपनी सफलता के किले की दीवारों में लगाने का काम करिये। कुछ लोग इन्हीं स्थितियों में मजबूत होते हैं और खराब समय को ही अपने जीवन को स्वर्णिम ढंग से रूपांतरित करने वाला समय बना देते हैं। रिचर्ड सील ने कहा भी है कि आत्मशक्ति इतनी दृढ़ और गतिशील है कि इससे दुनिया को टुकड़ों में तोड़कर सिंहासन गढ़े जा सकते हैं। कुछ लोग विशिष्ट अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं। वे लोग भाग्यवादी एवं सुविधावादी होते हैं, ऐसे लोग कुंठित तो होते ही हैं, जड़ भी होते हैं। कल्पना और प्रतीक्षा में वे अपना समय व्यर्थ गंवा देते हैं। किसी शायर ने कहा भी है कि तू इंकलाब की आमद का इंतजार न कर, जो हो सके तो अभी इंकलाब पैदा कर।

कोरोना कहर के बावजूद हम कहां बदल पाये हैं स्वयं को और अपनी दूषित सोच को। हम देख भी रहे हैं कि बुरे विचार जितना दूसरों का नुकसान करते हैं, उतना ही स्वयं अपना भी। कारण अपनी ही सुरक्षा को लेकर डरा दिमाग ढंग से नहीं सोच पाता। हम स्वार्थी हो उठते हैं, केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। लेखक इजरायलमोर एयवोर कहते हैं, ‘आपके विचार वहां तक ले जाते हैं, जहां आप जाना चाहते हैं। पर कमजोर विचारों में दूर तक ले जाने की ताकत नहीं होती।’

गलतियों को गलत मानने पर भी गलतियां निरस्त नहीं हो रही हैं, यह भी एक आश्चर्य है। ‘पानी में मीन पियासी’ वाली कहावत किसी ऐसे ही परिप्रेक्ष्य में प्रचलित हुई होगी। त्रुटियों एवं गलतियों की धुलाई का काम भगवान महावीर का अनेकांतवाद बखूबी कर सकता है। मनुष्य गलत आदतों, सोच एवं व्यवहार से आक्रान्त है, पीड़ित है। पीड़ा का दंश उसकी सुख और नींद तक छीन रहा है, किन्तु वह आग्रह नहीं छोड़ रहा है। अनेकांत का राजपथ उसके सामने है, पर उसके पैर डगमगा रहे हैं। वह चल नहीं पा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार गलतियों का परिमार्जन इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे आप सामाजिक बने रहते हैं और लोगों के साथ जुड़े रहने पर आपको तनाव या अवसाद जैसी समस्या नहीं सताती है। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा है कि हमारी खुशी का स्रोत हमारे ही भीतर है, यह स्रोत दूसरों के प्रति संवेदना से पनपता है।

कोरोना महामारी के बढ़ते संक्रमण के दौर में हम जी रहे हैं, उसके समाधान के सशक्त माध्यमों को अनदेखा कैसे कर सकते हैं? लेकिन हम बार-बार गलतियों पर गलतियां करते हुए कोरोना मुक्ति के मार्ग को बाधित कर रहे हैं। कोरोना महासंकट से जुड़ी समस्याओं के अनेक कोण हैं। समाधान भी अनेक कोणों से खोजे जा सकते हैं। जिन-जिन कोणों से हम इस जटिल समस्या को देख रहे हैं, उन्हीं के आधार पर समाधान भी खोजने होंगे। जितने स्रोतों से समाधान मिल सके, उन सबको जोड़कर भी कोई रास्ता निकाल लिया जाए तो युग-चेतना को नयी दिशा मिल सकती है।

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