आरूषि-प्रकरण में न्यायालय ने आरूषि और नौकर हेमराज की हत्या के आरोप में तलवार दंपत्ति को दोषसिद्घ करार देते हुए आजन्म कारावास का दण्ड है। तलवार-दंपत्ति ने न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देने की घोषणा करते हुए कहा है कि वह दिये गये निर्णय से न्याय से वंचित किये गये हैं, इसलिए सक्षम न्यायालय में चुनौती देंगे।
माननीय न्यायालय ने जो भी निर्णय दिया है, उसके प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए और न्यायालय की गरिमा का पूरा ध्यान रखते हुए दिये गये निर्णय पर ‘मंथन’ किया जाना आवश्यक है कि दिया गया निर्णय न्याय की श्रेणी में भी आता है कि नही? वास्तव में न्याय करना और निर्णय करना दोनों अलग-अलग हैं। न्याय में तो निर्णय भी समाहित होता है, पर आवश्यक नही कि निर्णय में न्याय भी समाहित हो। निर्णय तो किसी भी समस्या, वाद या परिस्थिति के अवलोकन के उपरांत व्यक्ति के मन में उपजी धारणा या मानसिक अवस्था से उदभूत होता है, पर न्याय के लिए ऐसा नही कहा जा सकता। निर्णय एक पक्षीय भी हो सकता है, एकांगी भी हो सकता है, पूर्वाग्रहग्रस्त भी हो सकता है और न्यायाधीश की बौद्घिक प्रतिभा से प्रभावित हो सकता है, परंतु न्याय कभी एकपक्षीय नही होता, एकांगी या पूर्वाग्रह ग्रस्त नही होता है। क्योंकि वह न्यायाधीश की बौद्घिक प्रतिभा से नही अपितु विवेकशक्ति से प्रभावित होता है।
प्रत्येक वाद में सामान्यत: दो या दो से अधिक पक्ष अपने-अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं। एक सामान्यत बुद्घि के व्यक्ति के लिए ये दो या दो से अधिक पक्ष केवल व्यक्ति विशेष या राज्य होते हैं। अंग्रेजी शासन काल में हमें ये ही पक्षकार बताये गये थे। अंग्रेजों ने दो पक्ष (वादी-प्रतिवादी) के साथ राज्य को भी कई विषयों में अनिवार्यत: जोड़ा। कुछ विषय तो इनमें ऐसे हैं, जिनमें राज्य हमारे पक्ष में खड़ा दिखायी देता है, जबकि कुछ ऐसे हैं, जिनमें राज्य केवल अंग्रेजी शासन व्यवस्था का पक्ष लेता प्रतीत होता था। राज्य का उद्देश्य कहीं भारतीय समाज की मान मर्यादा का अथवा भारतीय धर्म का सम्मान करना प्रतीत नही होता। हमारे यहां प्राचीन काल में प्रचलित रही न्यायप्रणाली में दो या दो से अधिक पक्षकारों में एक समाज और दूसरा धर्म भी निहित या समाहित होते थे। इन पर सूचना दी नही जाती थी, अपितु इनसे सूचना (दिशा-दर्शन) ली जाती थी। न्यायाधीश समाज और धर्म की मान मर्यादा का, समाज के नैतिक नियमों और नैतिक व्यवस्था का रक्षक होता था। इसलिए न्याय करते समय न्यायाधीश का हर संभव प्रयास होता था कि मेरे द्वारा दिये गये दण्ड से समाज और धर्म के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नही पडऩा चाहिए। वह प्रयास करता था कि दिये गये न्याय से समाज और धर्म की व्यवस्था अथवा उनकी मान्य नैतिक परंपराएं बलशाली हों, कहीं ऐसा ना हो कि दिये गये निर्णय से समाज और धर्म की मान्य नैतिक परंपराएं छिन्न भिन्न हो जायें।
हमारे यहां न्यायाधीश के न्यायालय को विदथ कहा जाता था, विदथ का अभिप्राय सत्य को जानना या सत्यान्वेषण करना है, पूर्ण विवेकशीलता से दिये गये न्याय से है। अत: न्यायाधीश न्याय करते समय स्वयं को सत्यान्वेषी ही सिद्घ करता था। इसीलिए वह कहीं कहीं अग्निदेव के नाम से भी पुकारा गया है। अग्नि का धर्म है मर्यादा का उल्लंघन करने वाले को जला डालना, प्रकाश देना और जहां अंधकार है-अन्याय का, वहां न्याय का उजाला फेेलाना। यज्ञ करने वाले के भी हाथ जल जाते हैं, यदि वह अपने मर्यादा पथ का उल्लंघन करता है। अग्नि मर्यादा का पाठ पढ़ाती है, इसलिए पूजनीय है। न्यायाधीश मर्यादाओं की स्थापना कराते हैं-इसलिए अग्निदेव कहे जाते थे। हमारी न्याय की देवी सूर्य से भी अधिक तेजोमयी है, उसकी आंखों पर पट्टी नही बंधी है, अपितु उसके तेज को देखकर पापी अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते थे। न्यायालय होता भी वही है, जिसके नाम स्मरण मात्र से ही पापी को पसीना आने लगे। यदि आंखों पर पट्टी बांधे न्याय की देवी खड़ी दीखेगी तो अपराधी स्वयं को अपराध मुक्त कराने के लिए उसके सामने खड़े होकर निस्संकोच तर्क वितर्क करेगा और स्वयं को बचा लाने में सफल हो जाएगा।
हर वाद या केस की भांति आरूषि हेमराज हत्याकाण्ड में भी ‘दंपत्ति तलवार’ ही पक्षकार नही थे, अपितु इसमें समाज भी पक्षकार रहा है, और धर्म भी पक्षकार रहा है। समाज दो प्रकार से पक्षकार है, एक तो समाज की मर्यादाएं टूटीं इसलिए, और दूसरे वह टूटी मर्यादाओं को जोडऩे की कामना रखता था इसलिए पक्षकार था। आरूषि-हेमराज के विषय में न्यायालय ने स्वीकार किया है कि उनके कृत्य उचित नही थे। वह आपत्तिजनक अवस्था में तलवार दंपत्ति द्वारा देखे गये। यह आपत्तिजनक अवस्था समाज की टूटी हुई मर्यादा की ओर संकेत करती है, जिस पर समाज न्यायालय से न्याय चाहता था, जो उसे मिला नही। समाज की मर्यादा नही कहती कि बेटी को मां-बाप किसी नौकर के कमरे में इसलिए सोने दें कि इससे उनकी कामलिप्सा में कोई व्यवधान नही होगा। समाज कहता है कि स्वयं पर नियंत्रण करो, तब संतान सुयोग्य बनेगी। पूरे निर्णय में समाज अपने लिए ‘न्याय’ ढूंढ़ता रह गया। कहीं भी ये नही स्पष्टï किया गया कि समाज की मर्यादाएं और धर्म की नैतिक व्यवस्था कैसे स्थापित रह सकती है?ï यद्यपि निर्णय में गीता, बाइबिल और कुरान के उद्घरण दिये गये हैँ, परंतु भारत की प्राचीन सामाजिक और न्यायव्यवस्था का कोई उद्घरण नही दिया गया, जिसमें बच्चों के निर्माण में माता-पिता के दायित्व और बच्चों का केवल अपने जीवन निर्माण के प्रति समर्पण प्रमुखता से निहित होता था। इस निर्णय के पश्चात ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी, जिसका कारण होगा बच्चों को अपनी जीवनी शक्ति (वीर्य) के संचय के प्रति जागरूक न करना। जब तक इस शक्ति को समय आने पर यूं ही बहाने की बातें की जाती रहेंगी और बालिग के नाम पर यौन अपराध किये जाने को प्रोत्साहन दिया जाता रहेगा तब तक नारी रक्षा नही हो सकेगी और हम कितनी ही आरूषियों को यूं ही मरते देखेंगे। महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं को प्रयास करना चाहिए कि समाज और धर्म जैसी संस्थाओं को प्रबल बनाया जाए। इनके प्रबल और सक्षम होते ही देश में बन रहे अल्पसंख्यक आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग आदि स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे।
वेद एक नैतिक व्यवस्था का नाम है। उसे ही धर्म की व्यवस्था भी कहा जाता है। जिन लोगों को वेद के नाम से चिढ़ है वो समाज में नैतिक व्यवस्था को लागू कराने हेतु किसी भी प्रकार से एक ऐसी सर्वस्वीकृत नैतिक व्यवस्था स्थापित करायें जो बच्चों को नैतिकता और आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाये और वो अपने जीवन निर्माण पर अधिक ध्यान दें। इसके लिए उन्हें प्रेरित कर सकें।
वैदिक व्यवस्था में विवाह का उद्देश्य संतान प्राप्ति था। राम और सीता ने वन में रहते हुए 14 वर्ष तक पूर्ण संयमित जीवन यापन किया। मैथिलशरण गुप्त ने चाहे भले ही उर्मिला (लक्ष्मण की पत्नी) के विरह का वर्णन कर उसे सीता से भी उच्च मान लिया हो, लेकिन सच ये ही है कि राम और सीता का जीवन ही आदर्श था, जो साथ रहकर भी आदर्श जीवन जीते रहे। कृष्ण जी की विवाह के समय आयु 36 वर्ष थी तो 48 वर्ष के आदित्य ब्रह्मïचारी बनकर तब संतानोत्पत्ति की। वाचस्पति मिश्र जैसे आदर्श गृहस्थी भी इस देश में अनेकों हुए हैं। जिन्होंने जीवन भर पत्नी के साथ रहकर भी संतानोत्पत्ति हेतु भी समागम नही किया। हमारा समाज जनहित में इन आदर्श स्थितियों को स्थापित रखने हेतु सजग रहता था। समाज मर्यादाओं का रक्षक था। मर्यादा का उल्लंघन शांतनु ने सत्यवती से विवाह करके किया तो महाभारत का भयंकर युद्घ हुआ। पृथ्वीराज चौहान जीवन में केवल रूपसियों के लिए लड़ता रहा तो भारत का बहुत अहित हुआ। मुहम्मदशाह रंगीला रंगरलियों में फंसा रहा तो हिंदुस्तान को बेच गया। शिवाजी जैसे चरित्रवान शासक का पुत्र शम्भा जी चरित्रहीन हो गया तो पिता की विरासत की सुरक्षा नही कर पाया।
आज हम उच्छ्रंखल, कामवासनाओं में संलिप्त और दिशाविहीन युवा का निर्माण करते जा रहे हैं। समाज को युवा के विकास में बाधक माना जा रहा है। उसे खुली छूट दी जा रही है, कि वह जैसे चाहे वैसे रहे। इसलिए युवा बड़ी सहजता से सामाजिक मान्यताओं को तोड़ रहा है। हम शांतनु, पृथ्वीराज चौहान, मौहम्मद शाह, रंगीला और शम्भाजी से कुछ सीख नही पाए हैं। इसलिए चारों ओर कामवासनाओं का बाजार गर्म है। शांतनु आदि भी निकृष्टï रूप में हमें समाज में कितने ही भेडि़ए घूमते दिखाई देते हैं।
इस स्वच्छंदता के नाम पर क्या आरूषि-हेमराज को क्षमा किया जा सकता है? नही और कदापि नही। इसलिए उनके लिए उनके अनैतिक कार्य की सजा क्या होनी चाहिए थी, यह भी इसी निर्णय में आना चाहिए था। क्योंकि विदथ (न्यायालय) का कार्य नैतिकता की रक्षा और नैतिकता की स्थापनार्थ न्याय देना है। न्याय कई तहों में छिपा होता है, उसे ढूंढना पड़ता है, उस तक पहुंचने के लिए कई आयाम तय करने पड़ते हैं। जबकि निर्णय तक तो एक साधारण बुद्घि का व्यक्ति भी सहजता से पहुंच जाता है। यदि तलवार दंपत्ति ने अपनी बेटी और नौकर को आपत्तिजनक स्थिति में देखा तो उस समय उनकी मानसिक अवस्था कैसी रही होगी? इस पर भी विचार करना आवश्यक है। इस हेतु सारा समाज न्यायाभिलाषी है। हमने शांतनु आदि से शिक्षा नही ली अपितु उन्हीं का अनुकरण करने लग गये। इसलिए समाज की मर्यादाओं को तोडऩा आरंभ कर दिया। गिरते गिरते हम ‘लिव इन रिलेशनशिप’ तक आ गये। अब न्यायालय का निर्णय आ गया है कि ‘लिव इन’ की स्थिति गलत नही है। सरकार ऐसे मिलन से उत्पन्न बच्चों की देखभाल के लिए कानून बनाये। बहुत सी विसंगतियों का परिणाम तो ‘लिव इन’ है और उस महाविसंगति से उत्पन्न बच्चों की देखभाल के लिए विसंगतियों से पूर्ण कानून का निर्देश न्यायालय सरकारों को दे रहे हैं, परिणाम क्या होगा? उस विसंगति से समाज में विवाह जैसी संस्था की अनिवार्यता और मर्यादा भंग होगी। सारे संबंध अपवित्र होंगे-पशुओं से भी गिरी हुई अवस्था को भी क्या ‘न्याय’ कहा जाएगा?
जहां आप पहुंचना नही चाहते जो आपका गंतव्य नही है या जिस अवस्था को आप अपने लिए उचित नही मानते यदि वही अवस्था पुन: आपके सामने लायी जाए तो उसे आप निर्णय तो कह सकते हैं, न्याय नहीं? हत्याओं को रोकने के लिए फांसी एक उपचार है। हत्यारा यदि बार-बार उस अपराध को कर रहा है तो इस विकल्प को न्यायालय सहजता से अपनाते हैं। इसी प्रकार अवैध संबंधों के लिए स्त्री पुरूष दोनों ही दोषी होते हैं। तब उनके लिए भी कड़ा दण्ड निश्चित किया जाना अपेक्षित है।
जो समाज पर थोपा जाए वह निर्णय होता है, आदेश होता है। परंतु जो समाज की विसंगतियों को वैसे ही साफ करे जैसे तेज अंधड़ कस्बों की गलियों की गंदी हवा को बाहर निकालकर वहां ताजा हवा भर देता है वह न्याय होता है। न्याय में थोड़ा कष्टï तो होता है पर वह रोगी के लिए होता है लाभप्रद। क्या हमें आरूषि प्रकरण में ऐसे ही न्याय की अपेक्षा नही थी?

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betwild giriş
dedebet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
maxwin giriş
süperbahis giriş
betwild giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpark giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpark giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betpas
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
cratosroyalbet giriş
cratosroyalbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
casinofast giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
superbet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
süperbet giriş
superbet
cratosroyalbet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
betnano giriş
safirbet giriş
betkanyon giriş
sonbahis giriş
betorder giriş
betorder giriş